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मंजिलें और भी हैं : जल संरक्षण के लिए मां के संघर्ष ने किया प्रेरित

रामबाबू तिवारी Updated Thu, 26 Sep 2019 01:11 AM IST
रामबाबू तिवारी
रामबाबू तिवारी
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पानी की कीमत को समझना है, तो बुंदेलखंड के गांवों की ओर रुख करें। आज भी वहां के तमाम गांवों की महिलाएं अपने घर से दो-दो किलोमीटर दूर से पानी लाती दिखाई दे जाएंगी। बचपन में मैंने देखा है, मेरी मां घर से कुछ किलोमीटर दूर से पीने के लिए पानी भरकर लाती थीं। पानी की कीमत को मैं बखूबी समझता हूं। 
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मैं उत्तर प्रदेश के बांदा जिले का रहने वाला हूं। गांव की महिलाओं और मां को पीने के पानी के लिए संघर्ष करते देख मैंने बचपन में ही सोच लिया था कि पानी के प्राकृतिक स्रोत बचाने के लिए कुछ न कुछ जरूर करूंगा। इंटरमीडिएट तक की पढ़ाई पूरी करने के बाद आगे की पढ़ाई के लिए मैंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय में दाखिला ले लिया। 

वहां मैंने हॉस्टल में पानी की बेतहाशा बर्बादी देखी। हॉस्टल की टोंटियां टूटी हुई थीं, जिनसे पानी बहता रहता था, अधिकतर बच्चे नहाने के लिए शावर का उपयोग करते थे। एक तरफ पानी के लिए गांव के लोग जहां तरसते थे, वहीं विवि में उसको बचाने पर किसी का ध्यान नहीं था। 

इसी दौरान मैं मध्यप्रदेश के पन्ना में स्थित मेरी भाभी के मायके में एक दाह-संस्कार में शामिल होने गया। वह मई का महीना था, वहां दाह-संस्कार के बाद स्नान के लिए हमें तकरीबन दो किलोमीटर तक चलकर जाना पड़ा, तब नहाने का पानी मिला। इन्हीं सब के चलते मेरे जीवन का लक्ष्य बदल गया, मैंने सोच लिया कि मुझे अब जल संरक्षण की दिशा में ही काम करना है। 

विश्वविद्यालय में वापस आने के बाद मैंने कुछ वरिष्ठ छात्रों को इकट्ठा किया और जल की बर्बादी रोकने के लिए हॉस्टल में टोंटियां सही करवाने और शावर की जगह मग व बाल्टी से नहाने का संकल्प लिया। शुरुआत में तकरीबन दस बच्चों ने मेरा साथ दिया। इससे मैं प्रोत्साहित हुआ तो नियमित तौर पर विवि में जल साक्षरता अभियान चलाने लगा। 

तब तक अन्य छात्रों को इसके बारे में पता चल चुका था, वे भी साथ देने को तैयार हो गए। इसके बाद हमने इलाहाबाद जिले के शंकरगढ़ इलाके के पिछड़े गांवों में सूख चुके तालाबों के जीर्णोद्धार पर विचार किया। इसके लिए हमने गांववालों के बीच जागरूकता अभियान चलाया, साथ ही प्रशासन से आर्थिक मदद ली। 

वहां एक बात पता चली कि तालाब तो हर जगह सरकारी मद से बनवाए जाते हैं, लेकिन उनकी डिजाइन सही न होने के कारण वह एक बड़े गढ्ढे में बदल जाते हैं। वहां हमें लोगों ने बताया कि भूजल रिचार्ज वाले तालाब सही करवाइए। वहां पर तालाब के आसपास मौजूद चारागाह पर लोगों ने अवैध कब्जे कर लिए या फिर ग्राम पंचायत ने उन्हें पट्टे पर दे दिए। 

गांव के लोगों ने कहा कि तालाब बचाना है, तो पहले चारागाहों पर से कब्जे हटवाने होंगे। प्रशासिनिक अधिकारियों ने मदद की, तो इलाहाबाद में तकरीबन सोलह तालाबों का जीर्णोद्धार सफलतापूर्वक हुआ। जल साक्षरता के लिए हमने तालाब, भूदान, चारागाह मुक्ति अभियान चलाया। 

जिन जिलों में यात्रा निकाली गई, वहां जल मित्र व जल सहेली बनाए, जिनका काम गांव में खराब हैंडपंप को सही कराना, तालाबों की अवैध कब्जे से रक्षा करना है। हम किसी एनजीओ के तौर पर नहीं, बल्कि गांव के लोगों के बीच रहकर जल साक्षरता का काम करते हैं। ऐसे में हमें इस काम के लिए किसी तरह की आर्थिक मदद की जरूरत नहीं पड़ती है। 

हमारे साथ काम करने वाले सभी विद्यार्थी हैं, जो अपनी पढ़ाई के बीच समय निकालकर अपने खर्च पर सहयोग करते हैं। अब मैं सूख चुके कुओं को पुनर्जीवित करने के बारे में विचार कर रहा हूं। हमें इस पर ध्यान देना होगा कि तालाब आखिरकार सूखते क्यों हैं। जब हम जल स्रोतों को अपने दैनिक जीवन में महत्व देने लगेंगे, तो यकीन मानिए जल संरक्षण की जरूरत हमें महसूस नहीं होगी।
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