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मंजिलें और भी हैं: माता-पिता के लिए घर खरीदने पर गर्व हुआ, कभी साथ ढाबे पर काम किया करती थीं

कविता ठाकुर Updated Fri, 06 Sep 2019 02:41 AM IST
कविता ठाकुर
कविता ठाकुर - फोटो : Amar Ujala
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मेरा बचपन बेहद गरीबी और मुश्किलों में बीता है। मैं हिमाचल प्रदेश के मनाली की रहने वाली हूं। मेरे माता-पिता मनाली में ही एक ढाबा चलाते थे। मेरे बचपन का ज्यादातर हिस्सा ढाबे में काम करके ही बीता। हालांकि, उस दौरान मेरी पढ़ाई नहीं छूटी। मैं स्कूल से आने के बाद अपने माता-पिता के साथ ढाबे में काम किया करती थी। 
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ठंड के दिनों में हालात और खतरनाक हो जातेहैं, मनाली में ठंड के दौरान तापमान काफी नीचे चला जाता है। कड़ाके की ठंड में हम काम करते रहते, क्योंकि हमें अपनी आर्थिक जरूरतें पूरी करनी होती थीं। कई बार तो हमें रात को ढाबे के अंदर ही परिवार के साथ फर्श पर सोना पड़ता था। स्कूल में पढ़ाई के दौरान हमें अपनी इच्छानुसार स्पोर्ट्स में भाग लेना होता था। 

आर्थिक समस्याओं के चलते मैं अक्सर कबड्डी के लिए अपना नाम लिखाती थी। इसकी वजह यह थी कि इस खेल में न तो अलग से ड्रेस खरीदने की जरूरत होती थी न ही जूते। ऐसे में कबड्डी पर ज्यादा कुछ खर्चा नहीं था। यहां बस शारीरिक मजबूती और तेज दिमाग के साथ फुर्ती चाहिए होती थी। स्कूल में दाखिला लेते ही मैंने ठान लिया था कि कबड्डी में करियर बनाना है। 

स्कूल में खेलते-खेलते कबड्डी में मेरी अच्छी खासी पहचान बन गई। मेरी बहन कल्पना भी कबड्डी की अच्छी खिलाड़ी थी। लेकिन ढाबे पर माता-पिता की मदद करने के लिए उसको अपना खेल छोड़ना पड़ा। लेकिन स्कूल से शुरू हुआ मेरा सफर आगे तक जारी रहा। धीरे-धीरे मेरी मेहनत ने असर दिखाया और वर्ष 2009 में मेरा चयन धर्मशाला स्थित स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया के प्रशिक्षण केंद्र में हो गया। 

वहां कुछ माह प्रशिक्षण लेने के बाद मेरा ट्रायल हुआ और मैं राष्ट्रीय टीम का हिस्सा बन गई। इसके बाद मुझे प्रोफेशनल कबड्डी खिलाड़ी के तौर पर प्रशिक्षण दिया गया। धर्मशाला में मेरे प्रशिक्षण और रहन-सहन का सारा जिम्मा सरकार ने उठाया। उसके बाद मैं अपनी मंजिल की तरबढ़ती चली गई। कुछ साल राष्ट्रीय स्तर पर खेलने के बाद जल्द ही मेरा चयन अंतराष्ट्रीय टीम में हो गया। लेकिन दुर्भाग्य ने मेरा साथ अब भी नहीं छोड़ा था।
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