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प्रधानमंत्री जी, इस गांव के किसान खुद के पैसे से बना रहे हैं सड़क

Updated Fri, 03 Jun 2016 10:35 AM IST
बिना सरकारी मदद बदल रही है इस गांव की तस्वीर
बिना सरकारी मदद बदल रही है इस गांव की तस्वीर
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ये सड़क सरकार ने नहीं बनाई है, न ही किसी एनजीओ ने। करीब आधा किलोमीटर लंबी सड़क रेत-मिट्टी के गारे से बनी भले ही लगे, लेकिन हकीकत में ये सड़क 'अन्नदाता' की खुद की रकम, खून-पसीने और हाड़-तोड़ मेहनत से बनी है। डेढ़ किलोमीटर का काम अब भी बाकी है, इसलिए माटी के लाल जी जान से इस सड़क को पूरा करने में लगे हैं। 



ये दरअसल, एक सड़क नहीं, बल्कि एक 'सबक' है करोड़ों लोगों के लिए, 29 सूबों में फैली सियासत के लिए और उस सियासत को चला रहीं सरकारों के लिए। 


अब ये सड़क खेतों के अलावा 5000 हजार दिलों को भी जोड़ती है। अब ये अन्नदाता की गरिमा, मर्यादा, आत्मसम्मान की सड़क है। जो पैगाम देती है... 'ग्रो इन इंडिया का।'

'ग्रो इन इंडिया' किसी नेता के भाषण से निकला सियासी जुमला लगता है। लेकिन है नहीं। ये किसानों के पुरुषार्थ से निकला भरोसे का वाक्य है कि अगर मेक इन इंडिया की तरह कारखानों को दी जाने वाली मोहलत और संसाधन किसानों को, उनके खेतों को मिलें तो देश की तस्वीर बदलते देर नहीं लगेगी। 

ये महाराष्ट्र की सीमा से सटे मध्य प्रदेश के एक गांव के उन 100 किसानों की आवाज है, जिनमें पांच साल के बच्चे लेकर कांपते हाथों से लाठी थामने वाले उम्रदराज किसान भी शामिल हैं। लेकिन तारीफ करनी होगी 21 वर्षीय गणेश ढोके, और कलाकार/मूर्तिकार श्वेता भत्तड़ की। दोनों इसी गांव में पले-बढ़ें हैं। आज निस्वार्थ रूप से समाजसेवी के तौर पर खेती-किसानी के हालातों को उबारने में पूरी निष्ठा से लगे हैं।

लेकिन ये कहानी महज इन दो की सफलता बयां नहीं करती है। ये कहानी पूरे गांव की कामयाबी की कहानी है। जो किसानों की कर्मठता, आत्मविश्वास और जज्बे को बयां करती है। हालांकी जिस सफलता की दरकार है, उसकी शुरुआत भर हुई है। इनके प्रयास इतने सराहनीय और करोड़ो लोगों को प्रेरणा देने लायक है कि हमने इन्हें कुछ शब्दों के माध्यम से सहेजने की कोशिश की है। ताकि प्रधानमंत्री तक इनकी पुकार पहुंच सके। एक सार्थक मुहिम की पूरी सक्सेस स्टोरी, देखें अगली स्लाइड में।

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रंग ला रही है गांव के युवाओं की पहल

किसान भी दे रहे हैं पूरा साथ
किसान भी दे रहे हैं पूरा साथ
बरसात के दिनों में उन खेतों में जाने का मतलब मौत को दावत देना था। घुटनों तक पानी में घुसकर जाना पड़ता था। सांप-बिच्छु का डर हमेशा बना रहता था। कब पैर के तलवे को कोई कांटा या नुकीला ईंट घायल कर दें, कुछ पता नहीं। इन हालातों से उबरने और ढेरों समस्याओं से निपटने के लिए चलाई जा रही मुहिम से हमें रू-ब-रू कराया गणेश और श्वेता ने। 

खेत-खलिहानों और किसानों की किस्मत बदलने कि मुहिम में जोर-शोर से लगे गणेश और श्वेता से हमारी तफ्शील से बात हुई। दोनों के काम में मामूली फर्क है लेकिन दोनों एक ही मुहिम के हिस्सा हैं। उद्देश्य एक है और लक्ष्य भी एक। अब ये लक्ष्य करीब 100 लोगों का हो चला है। साथी बढ़ते जा रहे हैं। 

खेतों में जाने के लिए सड़क नहीं थी। इसलिए सरकारी मुलाजिमों और गांव के सरपंच से मदद की गुहार लगाई। नतीजा सिफर रहा। किसी ने एक न सुनी। वर्षों तक खेतों और किसानों की बदहाली में कोई फर्क नहीं आया। आखिरकार बीए की पढ़ाई कर रहे गणेश के मन में विचार कौंधा कि क्यों न थोड़ा-थोड़ा चंदा जुटाकर सड़क बनाई जाए। 

शुरू में तो किसानों ने इस विचार पर यकीन नहीं किया। कुछ एक ने विरोध भी जताया। लेकिन भारी जद्दोजहद के बाद करीब पचास किसान आगे आए और सड़क बनाने का काम शुरू किया गया।

आखिरकार किसानों की जमीन पर, किसानों के पैसे से ही, किसानों की बनाई हुई करीब आधा किलोमीटर सड़क बनकर तैयार हुई। सड़क मिट्टी, रेत और पत्थर की है। काम के लिए मजदूर नहीं बुलाए गए बल्कि गांव के किसानों ने ही शारीरिक श्रमदान किया।

'ग्रो इन इंडिया' है इनकी मांग

घास-पौधों से बनाई पीएम की तस्वीर
घास-पौधों से बनाई पीएम की तस्वीर
इधर श्वेता ने एक बड़े भू-भाग में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का चेहरा और 'ग्रो इंन इंडिया' का संदेश घास-पौंधों से उगाया। तस्वीर को देखकर ही अंदाजा लग जाता है कि इसे बनाने में कितनी मेहनत लगी है। तस्वीर बनाने का मकसद है कि कैसे भी पीएम तक किसानों की गुहार पहुंचे। मोदी की प्राकृतिक तस्वीर बनाने में देसी बीजों और खाद का इस्तेमाल किया गया। 

हालांकि शुरू में ये क्रिएटिव काम भी गांववालों की समझ में नहीं आया और उन्होंने विरोध जताया। लेकिन पीएम तक बात पहुंचाने का ये तरीका शायद उन्हें देर से ही सही, समझ आ ही गया। सबने समाजसेवी और कलाकार श्वेता का इस काम में बखूबी साथ दिया। 

गांव वालों ने अपनी मांगों और देश के कृषि हालातों पर प्रधानमंत्री का ध्यान खींचने के लिए साझा पत्र भी लिखा। करीब महीना भर होने को है। अब तक कोई जवाब नहीं मिला है, लेकिन उम्मीदें अभी बाकी हैं।

करीब पांच हजार की आबादी वाले पारडसिंगा के लोगों के प्रयास अपने आप में हिम्मत, हौसले और जज्बे की मिसाल हैं। 

'मजबूरन किसान को बनना पड़ता है कारखानों में मजदूर'

कंपनियों के जितनी कृषि क्षेत्र को सरकारी मदद की जरूरत
कंपनियों के जितनी कृषि क्षेत्र को सरकारी मदद की जरूरत
शिवराज के सूबे में करीब 400 एकड़ में फैले 50 खेतों में फसल के तौर पर देसी कपास होता है। तरोई बेल होती है। किसान बाकी फसलें और फल-फ्रूट भी उगाना चाहते हैं। लेकिन संसाधनों के अभाव में मायूसी हाथ लगती है। श्वेता बताती हैं कि गांव के हालात ऐसे हैं कि ग्राउंड वॉटर बहुत नीचे जा चुका है। तीन साल से गांव के लोग खेतों तक जाने वाली सड़क को बनाने की मांग कर रहे हैं। लेकिन सरकारी मुलाजिमों के कानों में जूं तक नहीं रेंगती। हालांकि शुरुआती उदासीनता के बाद गांव की सरपंच ने मदद का भरोसा दिया है। 

श्वेता बताती हैं कि बहुत समझाने पर गांववाले खुद के ही प्रयास से एक तालाब बनाने पर राजी हुए। इस तालाब में बरसात का पानी भर जाता है जो खेतों में सिंचाई के काम आता है। श्वेता की चिंता ये भी है कि पास के गांव सतनूर की तरह पारडसिंगा के लोग भी कहीं खेती-किसानी से तौबा न कर लें। सतनूर में 100 किसानों में 20 ही बचे हैं जो खेती करना चाहते हैं। बाकी लोग कारखानों में काम करने लगे हैं। 

वो बताती हैं कि पारडसिंगा के पास का एक बहुत बड़ा इलाका सरकार ने सेज (स्पेशल इकोनॉमिक जोन) को दे दिया। जहां खेत मिट रहे हैं और कारखाने खुल रहे हैं। 

गणेश भी बताते हैं कि गांव के आस-पास छोटी-बड़ी मिलाकर करीब 200 कंपनियों के कारखाने हैं। इनमें बारूद के कारखाने भी शामिल हैं। खेतों में पर्याप्त संसाधन और पैदावार न होने की वजह से गांव के ज्यातर किसान कारखानों में मजदूरी करने को मजबूर हैं।

युवाओं में खेती-किसानी को लेकर क्रेज बरकरार

पीएम से फुल सपोर्ट की मांग
पीएम से फुल सपोर्ट की मांग
सरकार की स्पेशल इकोनॉमिक जोन वाली योजना कारोबारियों को भले ही सहूलियत देती हैं, लेकिन किसानों को इससे सरोकार नजर नहीं आता। पारडसिंगा के किसान कहते हैं कि सरकार अगर किसानों के लिए कारोबारियों जितनी मददगार हो जाए तो देश अपने बलबूते मजबूती से खड़ा होगा और सब विषमुक्त देसी भोजन कर रहे होंगे। सरकार जिस तरह कारखानों के बनने पर सड़क, पानी, बिजली मुहैया कराती है, वैसे ही खेतों तक सुविधाएं दे तो आज एक बहुत बड़ा युवा वर्ग खेती करने को तैयार है। सरकार मेक इन इंडिया विजन लेकर चल रही हैं, विदेशी कंपनियों से देश में कारखाने लगाने की डील की जा रही है। लेकिन किसान हमेशा से देश के लिए बफादार हैं और देसी में विश्वास रखते हैं। इनका मानना है कि अगर सरकार मेक इन इंडिया की जगह ग्रो इन इंडिया की मुहिम पर जोर दे तो देश के किसान सरकार को किसी भी बाहरी के आगे याचक नहीं बनने देंगे। खुद ही ताकतवर देश बनकर दिखा देंगे।

इस उद्देश्य की एक झलक पारडसिंगा में बीते दिनों आयोजित किए एक फेस्टिवल में दिखी। इस मौके पर देसी बीज और जैविक खेती करने के फायदे बताए गए। श्वेता की टीम दर्जनभर गांवों के करीब 200 किसानों को बुलाने में कामयाब रही। किसानों को रासायनिक खादों और कीटनाशकों से फसलों में घुल रहे जहर के बारे में अवगत कराया गया। इस फेस्टिवल में प्रधानमंत्री मोदी को भी बुलाया गया था।

पारडसिंगा की तरह देश के हर गांव को खुद की बेहतरी के लिए आगे आने और साझा प्रयासों से उनके हालातों को बदलने जरूरत है। उम्मीद है मान्नीय प्रधानमंत्री इस दिशा में जरूर सार्थक कदम बढ़ाएंगे और किसानों के दुर्दिन दूर करेंगे।

पारडसिंगा के वासियों के प्रयासों की हम सराहना करते हैं और शुभकामनाएं देते हैं।

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