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उम्रकैद में तब्दील हुई फांसी की सजा

New Delhi Updated Sun, 24 Feb 2013 05:30 AM IST
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नई दिल्ली। ‘भारत में अंधविश्वास के कारण बलि की परंपरा चल रही है। किसी न किसी कारण से परेशान व्यक्ति बिना किसी धार्मिक आधार के अंधविश्वास में आकर बिना विचार किए बलि को उपयुक्त मानते हैं।’ हाईकोर्ट की दो सदस्यीय खंडपीठ ने यह टिप्पणी पिता की बलि देने के दोषी को मिली फांसी की सजा को आजीवन कारावास में तब्दील करते हुए की। अदालत ने कहा, ‘ऐसा आरोपी मानसिक व विकृत रूप से प्रताड़ित होता है और उसे उचित चिकित्सा की जरूरत है।’ न्यायमूर्ति एस. रविंद्र भट्ट और न्यायमूर्ति प्रतिभा रानी की खंडपीठ ने अपने फैसले में आरोपी जितेंद्र की अपील को स्वीकार करते हुए कहा कि उसकी मानसिक स्थिति की विस्तृत जांच की जानी जरूरी थी। गरीबी, निरक्षता व मानसिक रूप से गंभीर बीमारी में लिप्त अभियुक्त ही ऐसे अपराध में लिप्त रहता है।’ खंडपीठ ने कहा हिंसक अनुष्ठान व पूजा प्रतिबंधित है। बावजूद इसके, कर्मकांड व आध्यात्मिकता में हमारा गहरा विश्वास है। पशु की बलि आमतौर पर सामने आती है। कुछ क्षेत्रों में काला जादू (टोना, काला जादू, वशीकरण) का प्रचलन है। लोग अपनी समस्याओं के समाधान के लिए ऐसा करते है और यह मूर्खतापूर्ण है।’
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अदालत ने कहा कि इस मामले में भी आरोपी को उसकी पत्नी, भाई व मां ने छोड़ दिया था। आरोपी इसी कारण अपराध में लिप्त हो गया। वह स्वयं एक मंदिर में सेवादार था। यही कारण है कि उसने अपने ही पिता की बलि दी, लेकिन उसने पिता को नहीं मारा, बल्कि मानसिक विकृति से ऐसा किया। अदालत ने कहा इसमें कोई दो राय नहीं है कि आरोपी ने अपने 70 वर्षीय वृद्ध व निसहाय पिता की हत्या की और अंग भंग कर दिया, लेकिन आरोपी की मनोदशा को देखने के बाद वे महसूस करते हैं कि उसे मृत्युदंड नहीं दिया जा सकता। अत: वे उसकी सजा आजीवन कारावास में तब्दील करते है। अदालत ने सभी जिला जजों को इस फैसले की प्रति भेजने का निर्देश देते हुए कहा कि ऐसे मानसिक रूप से विकृत व्यक्ति के समान मामले आने पर उसे गहराई से समझें। ऐसा आरोपी मानसिक इलाज का हकदार है और उसे इस प्रकार की चिकित्सा प्रदान की जाए।

यह था मामला
अभियोजन पक्ष के अनुसार, नबीकरीम थाना क्षेत्र निवासी जितेन्द्र ने 13 मार्च 2008 को अपने 70 वर्षीय पिता की गला घोंट कर हत्या कर दी थी। उसने हत्या के बाद धड़ के साथ ही कुछ अन्य अंगों को भी अलग कर दिया था। इसके बाद सिर को पास के मंदिर में रखी अलमारी में रख दिया था। बेरोजगार होने और परिवार में झगड़ा रहने के कारण वह परेशान रहता था। उसने दावा किया था कि उसमें देवी की शक्ति आई है। निचली अदालत ने उसे दोषी ठहराते हुए 10 जनवरी 2010 को मृत्यु दंड की सजा सुनाई थी।
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