अधिकारों के लिए समलैंगिकों ने किया मार्च

New Delhi Updated Mon, 26 Nov 2012 12:00 PM IST
नई दिल्ली। इंद्रधनुषी रंग बिखेरते हुए सैकड़ों समलैंगिक रविवार को जश्न में सरोबर होकर झूमते दिखे। मौका था क्वियर प्राइड डे का। इस दौरान समलैंगिकों ने अपने अधिकारों के लिए बाराखंभा रोड से जंतर-मंतर तक मार्च किया। उनकी हौसला-आफजाई के लिए उनके माता-पिता भी शरीक हुए।
मार्च में गे, लेस्बियन, ट्रांसजेंडर, बाइसेक्सुअल और इंटरसेक्स, एंडरोगायनस, हैट्रोसेक्सुअल शामिल हुए। इनमें युवा, बच्चे, बुजुर्ग महिला-पुरुष के साथ ही विदेशी समलैंगिक भी दिखे। उनके जुबान पर एक ही बात थी कि मुझे मेरा हक दो। मार्च के अलावा जंतर-मंतर पर एक कार्यक्रम का भी आयोजन किया गया, जहां इस वर्ग के लोग नाचते-गाते और झूमते दिखे। समलैंगिकों का कहना था कि जल्द ही वह दिन आएगा जब उन्हें चेहरा छिपाकर मार्च में शामिल होने की जरूरत नहीं पड़ेगी।
क्या कहते है समलैंगिक
इस समुदाय के लोगों का मानना है कि जिस रूप में उन्हें बनाया गया है, उसे समाज और कानून को स्वीकार करना चाहिए। भगवान के बनाए रूप को समाज से बहिष्कृत क्यों किया जाता है। मार्च में शामिल एक समलैंगिक का कहना था कि उनका मजाक उड़ाया जाता है, पुलिस ब्लैकमेल करती है। यह वर्ग समाज का एक हिस्सा है। लिहाजा इसे अधिकार मिलना ही चाहिए। एक समलैंगिक युवती का कहना था कि अगर मुझे एक लड़की के साथ रहना अच्छा लगता है तो इसमें बुराई ही क्या है। समाज इसकी इजाजत क्यों नहीं देता।
उच्च वर्ग की तादाद सबसे अधिक
जंतर मंतर पर जुटी भीड़ में उच्च वर्ग के लोग सबसे अधिक दिखे। वे बड़ी-बड़ी गाड़ियों से वहां पहुंचे थे। समलैंगिक फैशनेबल कपड़ों में दिखे। उन्हें सिगरेट का छल्ला उड़ाने, दम मारने और शराब आदि का खुलेआम सेवन करने से कोई परहेज नहीं है।

जब मिली थी पहली सफलता
2 जुलाई 2009 को कानूनी लड़ाई में समलैंगिकों को पहली सफलता हाथ लगी। कोर्ट ने अपने ऐतिहासिक फैसले में कहा था कि अगर निजी दायरे में, रजामंदी के आधार पर व्यस्क लोग समलैंगिक यौन संबंध बनाते हैं तो इसे अपराध और गैरकानूनी नहीं माना जाएगा। समलैंगिकों के लिए कानूनी लड़ाई लड़ने वाली नाज फाउंडेशन की अध्यक्ष अंजलि गोपालन थीं। इस जीत पर मशहूर फैशन डिजायनर रोहित बल भी जंतर-मंतर पहुंचे थे।

क्या है क्वियर
क्वियर का मतलब अजीब या आसमान्य होता है। हलांकि अब समलैंगिकों की नजर में इसके मायने बदल गए हैं। वे अब इसे प्राइड के रूप में देखते हैं। उन्हें इस शब्द पर गर्व है। यही वजह है कि वे इसे सेलीब्रेट करते हैं। वे इसका मतलब सशक्तीकरण, जश्न और एकजुटता से लगाते हैं। हर वर्ष इस तरह का उत्सव मनाया जाता है, जिसमें बड़ी संख्या में समलैंगिक जुटते हैं।

समलैंगिकों की मुख्य मांग
-पुलिस के अत्याचार को बंद करना।
-जेंडर के आधार पर भेदभाव व उत्पीड़न से बचाना।
-सम्मान और स्वतंत्रता केसाथ समाज में जीने का अधिकार।
- समलैंगिकों के जबरन किसी अन्य के साथ विवाह पर रोक।

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