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छत्रसाल स्टेडियम में तैयार होते हैं पदक विजेता

New Delhi Updated Tue, 14 Aug 2012 12:00 PM IST
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नई दिल्ली। छत्रसाल स्टेडियम में अभ्यास करने वाले पहलवान क्यों अंतरराष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं में निरंतर पदक जीत रहे हैं। यहां के पहलवान पदकों का ढेर कैसे लगा रहे हैं। उसके ही पहलवानों को अधिक संख्या में देश का प्रतिनिधितत्व करने का अवसर क्यों मिल रह रहा है। ये बातें लंदन ओलंपिक खत्म होने के बाद हर किसी की जुबान पर है। मगर स्टेडियम के बारे में जानने वाले लोगों को ही मालूम है कि यहां के पहलवान एक के बाद एक कामयाबी का झंडा कैसे गाड़ रहे हैं।
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छत्रसाल स्टेडियम में वे सभी सुविधाएं मौजूद हैं, जो कि विदेशों के कुश्ती स्टेडियमों में होती है। संभवत: देश का यह पहला ऐसा कुश्ती स्टेडियम है जिसमें पहलवानों के रहने के कमरों में ही नहीं, बल्कि अभ्यास के लिए बनाया गया हॉल भी वातानुकूलित है। इसके अलावा स्टेडियम में आधुनिक मशीनों और अन्य उपकरणों से युक्त जिम भी है। यहां अभ्यास करने वाले पहलवानों को अंतरराष्ट्रीय स्तर का खिलाड़ी बनाने के लिए कुश्ती के दांव पेच ही नहीं, अन्य खेल भी खिलाए जाते हैं। यहां अधिक से अधिक और ज्यादा समय तक दमखम बनाए रखने के लिए पहलवान फुटबॉल, बास्केटबॉल और हैंडबॉल भी खेलते हैं। साथ ही उन्हें पीटी भी कराई जाती है। छत्रसाल स्टेडियम में ऐेसे कोच पहलवानों को कुश्ती के दांव पेच सिखाते हैं, जिनका देश में ही नहीं, बल्कि विदेशों में भी लोहा माना जाता है। वर्ष 1982 में दिल्ली एशियाड में कुश्ती की सौ किलाग्राम स्पर्धा में स्वर्ण पदक जीतने वाले महाबलि सतपाल पहलवान पहलवानों को गुर सिखाने के लिए सुबह ही स्टेडियम पहुंच जाते हैं। वह शिक्षा विभाग के अतिरिक्त निदेशक भी हैं। उनके साथ द्रोणाचार्य अवार्ड से सम्मानित रामफल मान और विश्व के सर्वश्रेष्ठ कोच का अवार्ड प्राप्त करने वाले यशवीर सिंह डबास भी सुबह से लेकर शाम तक पहलवानों को कोचिंग देते हैं।
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चार साल में ही चर्चा में आ गया था स्टेडियम
छत्रसाल स्टेडियम में वर्ष 1988 में स्कूली बच्चों को कुश्ती के गुर सिखाने की शुरुआत हुई थी। चार वर्ष में ही इस स्टेडियम का नाम भारत में ही नहीं, बल्कि पूरे विश्व में चमक गया था। वर्ष 1992 में विश्व कैडेट कुश्ती में यहां कोचिंग लेने वाले पहलवान राकेश ने स्वर्ण पदक जीतकर सबको अचंभित कर दिया था। इसके बाद तो स्टेडियम में कोचिंग लेने के लिए स्कूली छात्रों की भीड़ लगनी शुरू हो गई। पिछले दो दशक में स्टेडियम में कोचिंग लेने वाले पहलवान अंतरराष्ट्रीय पर जूनियर और सीनियर स्तर पर हुई एशियाई चैंपियनशिप से लेकर विश्व चैंपियनशिप और एशियाड से लेकर ओलंपिक में सौ से अधिक पदक जीत चुके हैं। इन पदकों में 20 से अधिक पदक अकेले सुशील कुमार और योगेश्वर दत्त के नाम है।

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250 पहलवान सीखते हैं कुश्ती के दांव पेच
छत्रसाल स्टेडियम में फिलहाल 250 पहलवान कुश्ती के दांव पेच सीख रहे है, इनमें से 165 पहलवान स्टेडियम में ही रहते हैं। इन पहलवानों में सुशील कुमार समेत एक दर्जन पहलवान रेलवे में नौकरी करते हैं। इसी तरह दो पहलवान हरियाणा पुलिस में अधिकारी हैं। चार पहलवान बीएसएफ, पांच पहलवान एयरफोर्स, जबकि छह पहलवान नेवी में कार्यरत हैं। ये पहलवान स्कूल टाइम से यहां पर कोचिंग ले रहे हैं और नौकरी मिलने बाद भी उन्होंने अपने पुराने कोचों की देखरेख में ही दांव पेच सीखने का निर्णय लिया है।
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दूसरी पंक्ति में भी हैं नामी पहलवान
छत्रसाल स्टेडियम में सुशील कुमार और योगेश्वर दत्त के अलावा दूसरी पंक्ति के भी पहलवान अच्छे हैं। यहां अभ्यास करने वाले अमित कुमार इस बार लंदन ओलंपिक में गए थे। इसके अलावा बजरंग, राहुल मान, रजनीश दलाल, प्रदीप मान, प्रवीन राणा, दीपक, पवन, सुमित, नरेंद्र, हितेंद्र, देवी सिंह, अभिषेक मान आदि भी अंतरर्राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में पदक जीत चुके हैं। ये पहलवान भी सुशील और योगेश्वर दत्त की तरह कामयाबी पाना चाहते हैं। वे उनके साथ रोजाना अभ्यास करते हैं और एक दूसरे से बड़ी प्रतियोगितों का अनुभव बांटते हैं।

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