बापड़ौला में तीन माह पहले ही मनी दिवाली

New Delhi Updated Mon, 13 Aug 2012 12:00 PM IST
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नई दिल्ली। लंदन ओलंपिक में पहलवान सुशील कुमार ने रजत पदक जीतकर इतिहास रचा तो उनके गांव बापड़ौला में दीपावली जैसा माहौल हो गया। उनके प्रशिक्षण स्थल छत्रसाल स्टेडियम में भी खास जश्न का माहौल रहा। सभी जगह ढोल बजने शुरू हो गए और आतिशबाजी होने लगी। इस दौरान लोगों ने एक-दूसरे को मिठाई खिलाई। बापड़ौला गांव व छत्रसाल स्टेडियम का नजारा शादी जैसा था। ग्रामीण और पहलवान जमकर नाचे और दोनों जगह यह सिलसिला देर रात तक जारी रहा। सुशील जैसे-जैसे एक के बाद एक कुश्ती जीतने लगे बापड़ौला गांव के साथ-साथ आसपास के गांवों के लोगों का हुजूम उमड़ पड़ा। 66 किलोग्राम की स्पर्धा में सुशील कुमार जैसे ही कजाकिस्तान के पहलवान को हराकर फाइनल खेलने उतरे तो बापड़ौला और छत्रसाल स्टेडियम में नतीजे का इंतजार कर रहे सुशील के माता-पिता, पारिवारिक सदस्य, रिश्तेदार व उसके साथी सांसे रोके इंतजार करते रहे। जैसे ही नतीजा आया उनके बीच एक-दूसरे को बधांइयां देने का सिलसिला शुरू हो गया। सुशील के घर पर बधाई देने वालों का तांता लग गया और कुछ ही देर में उनके घर के बाहर ढोल की थाप पर ग्रामीण युवक एवं महिलाएं नाचने लगीं। इस बीच युवकों ने आतिशबाजी शुरू कर दी और सभी का मुंह मीठा करने की होड़ लग गई। इस तरह तीन माह पहले ही बापड़ौला गांव में दीपावली मन गई। उधर छत्रसाल स्टेडियम में भी सेमी फाइनल के बाद जश्न शुरू हो गया। सुशील के साथी पहलवान यहां ढोल की थाप पर अपने साथी की जीत पर घंटों नाचे। वे इस कदर खुश थे कि उन्होंने रविवार को नियमित अभ्यास भी नहीं किया।
ओलंपिक में दूसरी बार पदक जीतने पर गर्व
ओलंपिक में लगातार दूसरी बार पदक जीतने और इस बार पदक का रंग बदलने पर सुशील के पिता एवं मां काफी खुश हैं। मगर लंदन ओलंपिक के फाइनल में पहुंचने के बाद सुशील के सोना न जीत पाने का रंज उसके माता-पिता को काफी सता रहा है। खैर वे इस बात से खुश हैं कि उनके लाडले के कारण देश का नाम हुआ और पूरे देश में खुशी का माहौल है। बेटे के पदक जीतने पर खुशी व्यक्त करते हुए सुशील कुमार के पिता दीवान सिंह एवं उनकी माता कमला देवी ने मीडिया के साथ अपनी खुशी बांटी। दीवान सिंह ने कहा कि उन्हें अपने लाडले के हुनर को देखते हुए स्वर्ण पदक जीतने की उम्मीद थी। वह पिछले चार वर्ष से ओलंपिक की तैयारी भी कर रहे थे। लेकिन मालूम नहीं ऐसा क्या कारण रहा कि उनका बेटा स्वर्ण पदक नहीं जीत सका।
मां कमला देवी ने कहा कि उसे अपने लाडले के स्वर्ण पदक नहीं जीतने पर अफसोस है। उन्होंने कहा कि उनका बेटा फाइनल में पूरी रंगत में नहीं दिख रहा था। अगर पहली तीनों कुश्तियों की भांति खेला होता तो अवश्य स्वर्ण पदक जीतता। लगता है फाइनल से पहले उसकी तबीयत बिगड़ गई।


छह वर्ष पहले नाम रोशन करने का किया था वादा
अब लंदन ओलंपिक में रजत और चार वर्ष पहले बीजिंग ओलंपिक में कांस्य पदक जीतने वाले सुशील कुमार ने छह वर्ष पहले राष्ट्रपति से अर्जुन अवार्ड ग्रहण करने से पूर्व वादा किया था कि देश ने उन्हें जो सम्मान दिया है वह उसका एक दिन अवश्य कर्ज चुकाएंगे। उन्हें मालूम है देश को क्या चाहिए वह देश को अवश्य देंगे। उन्होंने रविवार को वह कारनामा कर दिया जो देश के किसी भी खिलाड़ी ने ओलंपिक में नहीं किया है। इस तरह उन्हें अपना वायदा पूरा कर दिया। अगस्त 2006 को सुशील कुमार ने अर्जुन अवार्ड ग्रहण करने से पहले ‘अमर उजाला’ को दिए साक्षात्कार में कहा था कि उनका प्रयास है ओलंपिक में पदकों के सूखे को समाप्त करें। क्योंकि कुश्ती में अभी तक देश को एक ही पदक मिला है। वह ओलंपिक में पदक जीतने के प्रयास में कोई कोर कसर नहीं छोड़ेंगे। इस तरह उन्होंने एक बार नहीं, बल्कि दो बार ओलंपिक में पदक जीतकर अपना वायदा पूरा कर दिया। इसके अलावा वह दो वर्ष पहले विश्व चैम्पियन बनकर इतिहास रच चुके हैं। अभी तक उनके अलावा देश का कोई भी पहलवान विश्व चैम्पियन नहीं बना है। मगर सुशील अपनी मां एवं पिता की वह उम्मीद पूरी नहीं कर सके जो उन्होंने चार साल पहले बीजिंग ओलंपिक में उनकी सफलता के बाद की थी। उस दौरान उन्होंने उम्मीद जताई थी कि उनका बेटा बीजिंग की कसक लंदन ओलंपिक में स्वर्ण पदक जीतकर पूरी करेगा।


परिजनों से छुपकर कुश्ती लड़नी की थी शुरू
सुशील कुमार की जीत पर आज उसके परिजन फूले नहीं समा रहे हैं, जबकि सुशील ने कुश्ती लड़ना अपने परिजनों से छुपकर शुरू किया था। क्योंकि कुश्ती में उसके पिता को सफलता नहीं मिलने पर वे नहीं चाहते थे कि उनका बेटा कुश्ती लड़े। सुशील ने छठी कक्षा में पढ़ने के दौरान 30 किलोग्राम में स्पर्धा में हिस्सा लिया था और वह जोनल स्तर पर प्रथम रहा था। उसकी इस सफलता के बाद उसके परिजनों को उसके कुश्ती लड़ने के बारे में मालूम हुआ था। इसी बीच सुशील छत्रसाल स्टेडियम में राज्य स्तर की स्पर्धा में हिस्सा लेने पहुंचा। वहां उसका हुनर देखकर महाबली सतपाल ने अपना शिष्य बना लिया। इसके बाद सुशील ने मुड़कर नहीं देखा और उसने एक के बाद एक सफलता अर्जित की। कुश्ती में सफलता मिलने के चलते सुशील को रेलवे में नौकरी भी मिल गई।


लाडले की भिड़ंत देखने का हरेक को था इंतजार
लंदन ओलंपिक में रविवार को सुशील कुमार का मुकाबला होने के चलते दोपहर एक बजे से पहले उसके परिजन एवं सहयोगी पहलवान टीवी से चिपक गए थे। कुछ ऐसी ही स्थिति बापड़ौला गांव के साथ-साथ अन्य गांवों में थी। सुशील की अंतिम कुश्ती खत्म नहीं होने तक सभी टीवी देखते रहे।
लंदन ओलंपिक में सुशील का एक के बाद एक मुकाबले में जीत का सिलसिला शुरू होते ही उसके घर आसपास के लोगों के आने का तांता लगना शुरू हो गया। लगातार दो मुकाबले जीतने के बाद सेमीफाइनल मुकाबले के दौरान सभी की धड़कनें तेज हो गई थी। सभी सुशील की इस मुकाबले में हर हाल में जीत की कामना कर रहे थे। सुशील ने उनके विश्वास को कम नहीं होने दिया और फाइनल में पहुंचकर पदक पक्का कर दिया। इस दौरान उनकी खुशी का कोई ठिकाना नहीं था, क्योंकि सुशील ने इस जीत के साथ ओलंपिक पदक का रंग भी बदल दिया। सुशील को चार वर्ष पहले बीजिंग ओलंपिक में कांस्य पदक मिला था।


30 वर्ष पुरानी यादें हुईं ताजा
कुश्ती के इतिहास में रविवार को 30 वर्ष पुरानी दो यादें ताजा हो गईं। एक ओर सुशील कुमार की कुश्ती के दौरान स्टेडियम में नौवें एशियाड खेलों के 100 किलोग्राम के फाइनल मुकाबले जैसी स्थिति थी, वहीं दूसरी ओर दिल्ली के किसी गांव में खुशी का माहौल देखने को मिला। इस तरह रविवार को टीवी पर देशवासियों को 30 वर्ष पहले की भांति कुश्ती स्टेडियम का दृश्य देखने को मिला। उस दौरान टीवी क्रांति न होने के चलते देशवासी बापड़ौला गांव की तरह बवाना गांव का दृश्य नहीं देख सके थे। दिल्ली में हुए नौवें एशियाड खेलों के दौरान जब कुश्ती की 100 किलोग्राम स्पर्धा के फाइनल में महाबली सतपाल मंगोलिया के पहलवान के साथ लोहा ले रहे थे तो गुरु हनुमान दर्शक दीर्घा में बैठकर अपने प्रिय शिष्य का हौंसला बढ़ा रहे थे। ऐसा कुछ दृश्य 30 वर्ष बाद ओलंपिक में देखने को मिला। इस बार गुरु हनुमान की जगह दर्शक दीर्घा में उनके शिष्य महाबली सतपाल पहलवान बैठे थे और अपने प्रिय शिष्य का हौंसला बढ़ा रहे थे। दूसरी ओर सुशील कुमार की जीत के बाद बापड़ौला गांव जैसा खुशी का माहौल दिल्ली के किसी गांव में 30 वर्ष बाद देखने को मिला। 30 वर्ष पहले उनके गुरु महाबली सतपाल द्वारा नौवें एशियाड खेलों में 100 किलोग्राम में स्वर्ण पदक जीतने के बाद बवाना गांव में इसी तरह खुशी एवं उत्साह का माहौल था। यह इत्तफाक की बात है कि इस दोहरी यादों में दोनों बार महाबली सतपाल पहलवान की भूमिका रही। पहली बार वह शिष्य थे तो दूसरी बार वह गुरु की भूमिका में थे।


छत्रसाल स्टेडियम ने भी रचा इतिहास
नई दिल्ली। एक ओलंपिक में भारत की ओर से किसी खेल में दो पदक जीतने का लंदन में पहला अवसर देखने को मिला। इस मामले में छत्रसाल स्टेडियम ने भी इतिहास रच दिया। वह देश का पहला ऐसा कोचिंग सेंटर बन गया है, जिनके दो खिलाड़ियों ने एक ओलंपिक में पदक जीते हैं। इसके अलावा एक खिलाड़ी ने लगातार दो ओलंपिक में पदक जीता। लंदन ओलंपिक में भारत के चार पुरुष पहलवान प्रवेश पा सके, इनमें तीन पहलवान वह हैं जो वर्षों से छत्रसाल स्टेडियम में कोचिंग ले रहे हैं। पहलवान अमित कुमार के शुक्रवार को पदक से दूर रहने के बाद छत्रसाल स्टेडियम में कोचिंग लेने वाले अन्य पहलवान मायूस हो गए थे, लेकिन उनकी उम्मीद टूटी नहीं थी। उन्हें पिछले ओलंपिक में पदक जीतने वाले सुशील कुमार और पदक के पास पहुंचे योगेश्वर दत्त से पूरी उम्मीद थी। दोनों पहलवानों ने उनकी इच्छा पूरी करते हुए ओलंपिक में झंडा गाड़ दिया।
छत्रसाल स्टेडियम के पहलवानों का इतिहास रचने का का यह कोई पहला अवसर नहीं है। विश्व कैडेट कुश्ती, एशियाड, एशियन चैम्पियनशिप, कॉमनवेल्थ गेम्स आदि अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में छत्रसाल स्टेडियम में कोचिंग लेने वाले कई पहलवान एक साथ विभिन्न पदक जीत चुके हैं। दिल्ली सरकार के छत्रसाल स्टेडियम में करीब ढाई दशक पहले कुश्ती की कोचिंग शुरू हुई थी। यहां वर्ष 1982 में दिल्ली एशियाड में कुश्ती की सौ किलोग्राम स्पर्धा में स्वर्ण पदक जीतने वाले महाबली सतपाल पहलवान ने शिक्षा विभाग में सहायक शिक्षा निदेशक बनते ही स्कूली बच्चों को पहलवानी के गुर सिखाने शुरू किए। कुछ दिन बाद उन्होंने अपनी सहायता के लिए दिल्ली सरकार के स्कूलों में शारीरिक शिक्षा शिक्षकों की नियुक्ति कराने का फैसला किया। इस दौरान उन्होंने कुश्ती में बेहद रुचि रखने वाले और अपने जमाने के अच्छे पहलवान रहे शारीरिक शिक्षा शिक्षक रामफल मान एवं यशवीर सिंह डबास को चुना। ये दोनों तभी से पहलवानों को कोचिंग दे रहे हैं।

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