..तो प्रवासी ही बनाएंगे नई सरकार

अभिषेक सक्सेना/अमर उजाला, दिल्ली Updated Sat, 23 Nov 2013 08:50 PM IST
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Migrant decided who ruled in delhi

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राहुल गांधी ने एक चुनावी सभा में दिल्ली को प्रवासियों का शहर बताया था। दिल्ली की यह एक सच्चाई भी है। दरअसल दिल्ली के तकरीबन 60 फीसदी लोग प्रवासी ही हैं।
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ये ऐसे लोग हैं, जो विभिन्न राज्यों से रोजगार या शिक्षा की तलाश में दिल्ली आए और फिर यहीं बस गए और अब यही लोग दिल्ली की नई सरकार का फैसला भी करेंगे।
दिल्ली के निर्वाचन अधिकारी शूरबीर सिंह के मुताबिक दिल्ली में तकरीबन 1.19 करोड़ से ज्यादा मतदाता हैं। इनमें उत्तर प्रदेश, बिहार, उत्तराखंड, पंजाब, पश्चिम बंगाल और ओडिशा जैसे दूसरे राज्यों के लोगों की भी बहुत बड़ी तादाद है।
साथ ही हाल के वर्षों में दक्षिण के लोग भी अच्छी खासी संख्या में आए हैं। गौरतलब है कि देसीय मुरपोक्कु द्रविड़ कझगम (डीएमडीके) दिल्ली विधानसभा चुनाव में हिस्सा लेने वाली तमिलनाडु की पहली पार्टी बनने जा रही है।

दिल्ली तमिल संगम के महासचिव आर. मुकुदन के मुताबिक दिल्ली में रहने वाले 12 लाख तमिलों में  चार लाख पंजीकृत मतदाता हैं।

दिल्ली में रह रहे प्रवासी, राजनीति में भी बड़े पदों पर काबिज हैं। खुद दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित उन्नाव (उत्तर प्रदेश) से ताल्लुक रखती हैं। वह स्वतंत्रता सेनानी और पश्चिम बंगाल के पूर्व राज्यपाल उमा शंकर दीक्षित की बहू हैं।

इसके अलावा दिल्ली विधानसभा के स्पीकर और डिप्टी स्पीकर क्रमश­: हरियाणा और उत्तर प्रदेश से हैं। दिल्ली में बस चुके पश्चिमी दिल्ली से कांग्रेस सांसद महाबल मिश्र भी मूल रूप से बिहार के हैं।

राजधानी की सियासत में प्रवासियों की हिस्सेदारी इस हद तक है कि दिल्ली विधानसभा के 20  से ज्यादा विधायक प्रवासी ही हैं। इनमें उत्तराखंड और बिहार के तो केवल एक­-एक ही विधायक हैं।

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने बिहार राज्य के सौ वर्ष पूरे होने पर आयोजित समारोह में यह ब्योरा दिया था कि देश की राजधानी में 20 फीसदी बिहारी हैं।

वहीं सामाजिक कार्यकर्ता डॉ. विनोद बछेती बताते हैं, "दिल्ली में तकरीबन 35 लाख उत्तराखंड से आए लोग हैं , जो दिल्ली के 20 से 25 विधानसभा क्षेत्रों को सीधे प्रभावित करते हैं।"

दिल्ली विधानसभा में बिहार के लोगों को उचित प्रतिनिधित्व नहीं मिलने पर बुरारी से ' आप ' के प्रत्याशी संजीव झा का कहना हैं , '' दिल्ली की राजनीति में बिहारियों के साथ दोयम दर्जे का बरताव कोई नई बात नहीं है।

यहां ' बिहारी ' संबोधन किसी गाली से कम नहीं माना जाता। बिहारियों का प्रतिनिधित्व बढ़ना ही चाहिए। इसीलिए ' आप ' पार्टी ने पूर्वांचल के 11 प्रत्याशियों को टिकट देने का फैसला किया है।

'' उत्तराखंड के सामाजिक संगठन तो अपनी उपेक्षा की बात लगातार उठाते रहे हैं। दिल्ली में बसे उत्तराखंड के प्रवासियों की मुश्किलों पर   वरिष्ठ साहित्यकार मंगलेश डबराल का कहना है , '' उत्तराखंड के लोग अपनी पहचान खो रहे हैं।

पर्वतीय समाज में एकता नहीं है और न ही कोई योग्य नेता। इसी वजह से इन लोगों की आवाज अनसुनी रह जाती है।" वैसे तो शीला दीक्षित खुद कहती आई हैं कि इन प्रवासियों की वजह से दिल्ली में कानून और व्यवस्था संबंधी समस्याएं बढ़ी हैं।

लेकिन बकौल सांसद महाबल मिश्र , "दिल्ली के राजनीतिक , आर्थिक और सामाजिक विकास में प्रवासियों के योगदान को नकारा नहीं जा सकता।

दिल्ली सर्वांचल है , जो सबको अपनाती है।" राहुल गांधी की टिप्पणी ऐन चुनाव से पहले इसी बात को रेखांकित कर रही है कि चुनाव में प्रवासियों के वोटों का खासा दारोमदार रहेगा।

ऐसे में देखना दिलचस्प होगा कि 4 दिसंबर को होने वाले विधानसभा चुनाव में ये ' प्रवासी ' दिल्ली की राजनीतिक बिसात पर कैसा रंग जमाते हैं।
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