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जब केजरीवाल ने पूर्व नेवी चीफ रामदास को पार्टी से निकाला, तो 80 वर्षीय एडमिरल का गला भर आया

जितेंद्र भारद्वाज, अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Wed, 22 Jan 2020 01:57 PM IST
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पूर्व नौसेना अध्यक्ष एडमिरल लक्ष्मीनारायण रामदास
पूर्व नौसेना अध्यक्ष एडमिरल लक्ष्मीनारायण रामदास - फोटो : PTI (File)
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अन्ना आंदोलन के बाद अरविंद केजरीवाल ने जब आम आदमी पार्टी का गठन किया, तो उनका समर्थन करने के लिए देश-विदेश की कई शख्सियत आगे आईं। इनमें एक नाम पूर्व चीफ ऑफ नेवल स्टाफ एडमिरल एल. रामदास का भी था। वे एकमात्र ऐसे व्यक्ति थे, जिन्हें अरविंद केजरीवाल 2013 में अपनी कार में बैठाकर निर्वाचन अधिकारी के दफ्तर पहुंचे। रामदास को पार्टी के तीन सदस्यीय आंतरिक लोकपाल समूह का कामकाज सौंप दिया गया।
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2015 में मिले प्रचंड बहुमत के बाद केजरीवाल सीएम बन गए। पार्टी के कई संस्थापक सदस्यों को बाहर का रास्ता दिखाया जाने लगा। इस पर एडमिरल ने सवाल उठाया, केजरीवाल को पत्र लिखकर उन्हें समझाने का प्रयास किया। 80 वर्षीय रामदास का फोन तक नहीं उठाया। उन्हें बिना बताए एक झटके में लोकपाल समूह से बाहर कर दिया। एडमिरल का गला भर आया था, मगर किसी ने उनसे बात करना भी उचित नहीं समझा।

एडमिरल रामदास को मिला था रमन मैग्सेसे पुरस्कार

दिसंबर 1990 से सितंबर 1993 तक नेवल चीफ रहे एल. रामदास को सक्रिय तरीके से मानवाधिकारों की पैरवी करने, भारत-पाक संबंधों पर खास नजर और नि:शस्त्रीकरण जैसे मुद्दों पर आवाज उठाने के चलते उन्हें 2004 में रमन मैग्सेसे सरीखे प्रतिष्ठित पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।

जब 'आप' का गठन हुआ तो अरविंद केजरीवाल ने उनसे आग्रह किया कि वे पार्टी के लिए काम करें। उस वक्त केजरीवाल एडमिरल का बहुत सम्मान करते थे। जब केजरीवाल ने नई दिल्ली सीट से जीवन का पहला चुनाव लड़ा, तो नामांकन दाखिल करते वक्त केजरीवाल ने केवल रामदास को अपने साथ कार में बिठाया था।

स्वास्थ्य ठीक न होने के बावजूद 80 वर्षीय रामदास मुंबई से केजरीवाल की मदद करने के लिए दिल्ली आ गए थे। केजरीवाल ने भी अपने चुनाव प्रचार में जमकर एडमिरल का नाम भुनाया।

शुरू में आप के बारे में ये कहना था रामदास

फौज-पुलिस या स्थानीय प्रशासन, आज इनमें भ्रष्टाचार से अछूता कोई नहीं है। जरा सोचिए रोजमर्रा के उपभोग की वस्तुएं हों या स्कूल-कालेज की फीस, सब आसमान छू रही हैं। व्यवस्था में क्या हो रहा है, उसकी दिशा क्या है, इस बाबत कोई नहीं सोचता। मेरे राजनीति में आने का इरादा कतई नहीं है। मैं तो केवल वर्तमान व्यवस्था को साफ करना चाहता हूं।

आम आदमी पार्टी भी इसी के लिए प्रयासरत है। एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि लोगों ने आप को जो बीस करोड़ रुपये का चंदा दिया है, वह चुनाव लड़ने के लिए काफी है। जब ईमानदारी से लोगों के लिए चुनाव लड़ना है, तो फिर ज्यादा रुपयों की जरूरत नहीं पड़ेगी।

दिल्ली में आप की लहर है। चूंकि सभी वर्गों के लोग भ्रष्टाचार मुक्त प्रशासन का सपना देख रहे हैं, इसलिए उनके सामने आप एक बेहतर विकल्प है। जनता को पता है उसे क्या चाहिए। दिल्ली की जनता अब परंपरागत ढर्रे पर मतदान नहीं करेगी।

जब पता चला कि लोकपाल तो एक धोखा है

2015 में केजरीवाल सीएम बन गए। एडमिरल रामदास को आम आदमी पार्टी के तीन सदस्यीय इंटरनल लोकपाल समूह का कामकाज दिया गया। इंटरनल लोकपाल का मतलब था कि आप की राष्ट्रीय कार्यकारी परिषद के सदस्यों पर नजर रखना। उनकी जरा सी गलती पर सख्त कार्रवाई करने का प्रावधान था।

कुछ समय बाद प्रशांत भूषण और योगेंद्र यादव सहित पार्टी के संस्थापक सदस्यों को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। इससे पार्टी में भूचाल सा गया। उसी वक्त एडमिरल रामदास ने केजरीवाल की इस कार्रवाई पर सवाल उठाया। पार्टी के आंतरिक लोकपाल समूह को कुछ नहीं मालूम और उधर पार्टी के संस्थापकों को मनमाने तरीके से बाहर कर दिया गया।

एडमिरल ने केजरीवाल से बात करनी चाही, लेकिन उनका फोन नहीं उठाया। नतीजा, रामदास को एक पत्र सार्वजनिक करना पड़ा। उन्होंने लिखा, मुझे फोन का इंतजार है। ताज्जुब है, तकलीफ भी है। मुझे हटा दिया गया, बताया तक नहीं। मेरे पत्र का कोई जवाब नहीं। कम से कम मुझसे बात तो करते।

आतंरिक लोकपाल के लिए पार्टी को अब मेरी सेवा की जरूरत नहीं है। ये पत्र मार्च 2015 में लिखा गया था। एक बातचीत में रामदास ने कहा था, मैं बहुत दुखी हूं। मेरे साथ भी ऐसा व्यवहार। इसके बाद उनका गला भर आया था।
 
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