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Updated Sun, 04 Jun 2017 11:31 PM IST
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संसाधनों के अभाव में मर जाते हैं 50 प्रतिशत पौधे
पलवल। बड़े-बड़े भवन, सड़कें तथा पुल बनाने के नाम पर कटवाए जा रहे पेड़ों के कारण वन क्षेत्र लगातार घटता जा रहा है। एक समय था जब दिल्ली-आगरा राजमार्ग पर ही दोनों तरफ बड़े-बड़े पेड़ ही दिखाई देते थे, लेकिन आज हालात यह हैं कि कई-कई किलोमीटर की दूरी तक भी एक पेड़ दिखाई नहीं देता। इसका मुख्य कारण है, पिछले कुछ सालों में सड़कों के चौड़ीकरण करने के नाम पर और बनाए जा रहे पुलों के नाम पर लाखों पेड़ों का कटवाया जाना। यही कारण है कि आज प्रदेश पर राजमार्गों पर केवल बड़े-बड़े भवन व पुल दिखाई देते हैं, पेड़ नहीं।
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हर वर्ष लगाए जाते हैं लाखों की संख्या में पेड़
जिले में देखा जाए तो वन विभाग द्वारा हर वर्ष लाखों की संख्या में पौधे रोपे जाते हैं। पिछले 10 सालों का रिकार्ड उठाकर देखा जाए तो जिले में विभाग द्वारा करीब 15 लाख पौधे रोपे जा चुके हैं, लेकिन उनमें से मात्र 25 प्रतिशत ही बचे हैं। पिछले साल ही करीब एक लाख पौधे जिले में रोपे गए थे। उन पौधों में से लघु सचिवालय, राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय के अलावा एक-दो स्थानों पर तो यह पौधे दिखाई देते हैं, उसके अलावा कहीं नहीं। कई जगहों पर देखरेख के अभाव में पौधे सूख गए, या फिर सड़कों पर घूमते आवारा पशु उन्हें खा गए। इस बार भी करीब डेढ़ लाख पौधे लगाने का लक्ष्य है। इसके लिए जिले की पलवल, मंडकौला, होडल व भिडूकी नर्सरी में करीब चार लाख छोटे-बड़े पौधे तैयार हैं।

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एक रुपये प्रति पौधा दिया जाता है
वन विभाग द्वारा अब एक रुपये प्रति पौध के हिसाब से दिया जाता है। कुछ किस्म के पौधे फ्री भी वितरित किए जाते हैं। सामाजिक संस्थाओं द्वारा लगाए जाने वाले पौधों को भी फ्री में ही दिया जाता है। वन विभाग की माने तो एक रुपये पौध की कीमत इसलिए रखी गई है, ताकि लोग पौधे खरीदने के बाद उन्हें लगाकर उनकी देखभाल करें। कई बार फ्री में लोग अधिक पौधे ले जाते हैं, कुछ तो लगाने के बाद बाकी को फेंक देते हैं। विभाग की मानें तो एक छोटी पौध बनाने पर 9 रुपये के करीब खर्चा आता है, जबकि बड़ी पौध तैयार करने पर करीब 75 रुपये का खर्चा आता है। अधिक गर्मी पड़ना व बरसात बहुत होने पर भी पौधों के मरने का डर रहता है। पिछले दो तीन सालों से जिले में बरसात बहुत ही कम हुई है। पौधों के जिंदा रखने के लिए दिए जाने वाले पानी के अलावा बरसात का पानी भी बेहद आवश्यक है, लेकिन बारिश न होने के कारण पर्याप्त मात्रा में पानी नहीं मिल पा रहा है।
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संसाधनों का है अभाव
जिला पलवल में वन विभाग के पास संसाधनों का भी अभाव है। यदि देखा जाए तो विभिन्न बीट पर करीब 22 वन रक्षक होने चाहिए, लेकिन यहां मात्र 8 वन रक्षक ही कार्यरत हैं। इसके कारण जिले में रोपे जाने वाले पौधों की सही से देखरेख नहीं हो पाती है। जिससे पौधे लगाने के बाद मर जाते हैं।
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हमारा प्रयास रहता है कि ज्यादा से ज्यादा पौधे रोपे जाएं। विभाग द्वारा जो लक्ष्य रखा जाता है, उसे हर वर्ष पूरा किया जाता है। जितने पौधे रोपे जाते हैं, उनमें से पहले साल में 20 प्रतिशत मी जाते हैं। स्टाफ की कमी होते हुए भी हम पौधों को पूरा बचाने का प्रयास करते हैं। पिछले साल लगाए गए पौधों में से आज भी 70 से 80 प्रतिशत पौधे जीवित हैं तथा समय-समय पर उनकी देखभाल की जा रही है। इस वर्ष भी लक्ष्य के मुताबिक पौधे रोपे जाएंगे। शहरी क्षेत्रों में पशुओं से पौधों को बचाने के लिए तीन हजार ट्री-गार्ड भी बनवाए गए हैं।
- विनोद कुमार, वन रक्षक व पलवल नर्सरी इंचार्ज
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