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क्रिकेट की पिच पर जीते पर सिस्टम हार गए यूपी पैरा क्रिकेट टीम के कप्तान राजाबाबू, गाजियाबाद में चला रहे ई-रिक्शा

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, गाजियाबाद Published by: गाजियाबाद ब्यूरो Updated Tue, 24 Nov 2020 01:32 AM IST
राजाबाबू
राजाबाबू - फोटो : amar ujala
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सात साल की उम्र में ट्रेन हादसे के दौरान एक पैर गंवाने वाले राजाबाबू ने हौसले के बूते बोर्ड ऑफ डिसेबल्ड क्रिकेट एसोसिएशन (बीडीसीए) से मान्यता प्राप्त यूपी टीम का कप्तान बनकर खेल का मैदान तो जीत लिया पर सिस्टम से हार गए। आजीविका के लिए राजा बाबू ने पहले जूते बनाए और फिर लॉकडाउन में ई रिक्शा भी चलाया। बैटरी खराब होने से उनका ई रिक्शा भी अब ठप हो गया। अब उनके सामने आजीविका का संकट पैदा हो गया है।



मूलरूप से जालौन के रहने वाले राजाबाबू के पिता रेलवे में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी थे। सन 1997 में सात साल की उम्र में ट्रेन की चपेट में आने से राजाबाबू का बांया पैर कट गया। अपने दोस्तों के साथ उन्होंने भी एक पैर से क्रिकेट खेलना शुरू किया। धीरे-धीरे क्रिकेट के प्रति उनका जुनून बढ़ता गया। हालांकि परिजनों और दूसरे लोगों ने उनकी पैर को देखते हुए न खेलने की सलाह दी, लेकिन अपने जोश और जज्बे के दम पर राजाबाबू ने खुद को एक पैर से खेलने में सक्षम बनाया। 2013 तक वह क्लब स्तर पर सामान्य क्रिकेट ही खेलते रहे। दिव्यांग होने के बावजूद उन्होंने अपने बेहतर खेल से लगातार क्रिकेट में अपनी छाप छोड़ी।


कानपुर क्रिकेट एसोसिएशन की ओर से उनको दिव्यांग होने के बावजूद सामान्य टूर्नामेंट में खेलने के लिए सम्मानित भी किया गया। 2013 में बिजनौर में एक टूर्नामेंट के दौरान उनकी मुलाकात यूपी दिव्यांग स्पोर्ट्स एसोसिएशन के अध्यक्ष अमित कुमार शर्मा से हुई। जिन्होंने उन्हें दिव्यांग श्रेणी में खेलने के लिए कहा। इसके बाद उन्होंने सामान्य क्रिकेट को छोड़कर दिव्यांग क्रिकेट पर फोकस किया। अमित जो खुद दिव्यांग हैं, उन्होंने राजा को काफी प्रोत्साहित किया। इसके बाद लगातार दिव्यांग क्रिकेट में उन्होंने बेहतर खेल दिखाया। वर्तमान में यूपी टीम के कप्तान हैं। इंडियन डिसेबल्ड प्रीमियर लीग में भी खेल चुके हैं।

खेलने के लिए जूता भी बनाया
क्रिकेट खेलने के लिए राजाबाबू लगातार संघर्ष करते रहे। शुरुआती दिनों में कानपुर में अखबार बेचा। उसके बाद नोएडा की एक कंपनी में 200 रुपये दैनिक भत्ते पर जूता बनाने का काम किया। रोजगार व खेल के लिहाज़ से बेहतर सुविधा के लिए वह कानपुर से गाजियाबाद आये, मगर हालात नहीं बदले। क्रिकेट ने उनको पहचान तो दे दी, लेकिन परिवार चलाने के लिए आज भी उनको दर ठोकरें खानी पड़ रही हैं।

कई राज्यों और संस्थाओं से हो चुके हैं सम्मानित
राजाबाबू अपने बेहतर खेल के लिए राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर कई बार सम्मानित हो चुके हैं। उनको उत्तरप्रदेश सरकार की ओर से विश्व दिव्यांग दिवस पर सम्मानित किया गया। बिहार सरकार की ओर से अज़ातशत्रु पुरस्कार दिया गया। उस समय के मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी ने उन्हें सम्मानित किया। राजाबाबू ने बताया कि अभी तक सिर्फ सर्टिफिकेट और मेडल ही दिया गया। कहीं से भी कोई बड़ी आर्थिक मदद नहीं मिली। वह अपना खर्चा कर समारोह में शामिल होते हैं और प्रमाणपत्र लेकर वापस आ जाते हैं। वह चाहते हैं कि दिव्यांग क्रिकेट को बढ़ाव मिले। सरकार स्पॉन्सर करें। जिससे दिव्यांग क्रिकेटरों को इतनी फीस मिल सके की। वह अपने परिवार की जिम्मेदारी उठा सकें।

बीसीसीआई से मान्यता प्राप्त एसोसिएशन नहीं होने से परेशानी
मेरठ निवासी उत्तरप्रदेश दिव्यांग स्पोर्ट्स एसोसिएशन के अध्यक्ष अमित कुमार शर्मा ने बताया कि देश में अभी तक क्रिकेट की अधिकारिक संस्था बीसीसीआई के अंतर्गत कोई भी दिव्यांग क्रिकेट एसोसिएशन नहीं है। जिसके चलते खिलाड़ियों को खेल सुविधाएं और मैच फीस नहीं मिल पाती हैं। इसके लिए दिव्यांग क्रिकेट से जुड़े लोग लगातार मांग कर रहे हैं। बीसीसीआई से मान्यता मिलने के बाद ही दिव्यांग क्रिकेट को सही मुकाम मिल पायेगा।

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