घोटाले का दबाने के लिए खेला गया गंदा खेल

Ghaziabad Bureau Updated Fri, 06 Oct 2017 01:27 AM IST
घोटाले के खेल में खिलाड़ियों ने रचा बड़ा षड्यंत्र
दिल्ली-मेरठ और ईस्टर्न पेरिफेरल एक्सप्रेस-वे से जुड़े घोटाला के पीछे सरकारी सिस्टम और दलालों के संगठित षड्यंत्र का सबसे बड़ा उदाहरण देखने को मिली हैं। मंडलायुक्त डॉ. प्रभात कुमार की जांच आख्या बताती है कि सरकारी धन का बंदरबांट करने के लिए तत्कालीन अधिकारी, कर्मचारी और दलाल एक ही लाइन पर काम कर रहे थे, जिन्होंने सभी शिकायतों को झूठा ठहराने के लिए सुनियोजित तरीके से एक तरह का षड्यंत्र रचा और ग्रामीणों से शपथ पत्र व बयान लिए। बैंक खातों के आधार पर घोटाला स्पष्ट प्रतीत हो रहा था लेकिन हर स्तर पर क्लीनचिट दे दी गई।
तत्कालीन मुख्य विकास अधिकारी गाजियाबाद व वर्तमान में हापुड़ के डीएम कृष्णा करूणेश ने अपनी जांच रिपोर्ट में संयुक्त बैंक खाते पकड़े थे, जिनमें से मुआवजे का पैसा बाद में पर्सनल खातों में ट्रांसफर किया गया, लेकिन तत्कालीन सीडीओ ने बैंक खाते पकड़ने के बाद कोई अनियमितता नहीं पाई। उधर, तत्कालीन मसूरी थानाध्यक्ष ने भी अपनी जांच आख्या में कहा कि मुआवजे का पैसा नियमानुसार दिया गया है। इसके बाद तत्कालीन एसएसपी ने सारी शिकायतों को निराधार पाया और फिर तत्कालीन डीएम निधि केसरवानी ने शिकायतों को आधारहीन बताते हुए उन्हें खारिज करने की संस्तुति कर दी।

जांच को दबाने का गंदा प्रयास
मंडलायुक्त ने जांच में साफ लिखा है कि दलाल और षड्यंत्र में शामिल अन्य लोग इतने बलवान थे कि उन्होंने शिकायतों को दबाया। तत्कालीन डीएम निधि केसरवानी और उसके द्वारा गठित जांच समिति की आख्या पूरी तरह से सच्चाई के विपरीत है तथा संपूर्ण घोटाले को दबाने का एक गंदा प्रयास किया गया। जांच के दौरान आठ संयुक्त बैंक खाते पकड़े जाने के बाद से मामले को बड़ी सफाई के साथ दबाया गया, जिसके पीछे दलालों से लेकर सरकारी मिशनरी की सक्रिय भूमिका रही।

संयुक्त बैंक खातों से दिया घोटाले का अंजाम
जांच के दौरान जिन आठ बैंक खातों को पकड़ा गया, उनमें दो खाते सिंडिकेट बैंक और बाकी के सभी यूनियन बैंक ऑफ इंडिया के थे। दलालों ने पर्दे के पीछे किसानों से 10 गुना तक मुआवजा दिलाने की सेटिंग की, जिसमें अपना हिस्सा भी पहले से तय कर लिया गया। इन खातों में 5 करोड़ 85 लाख 40 हजार 926 रुपया मुआवजे के तौर पर जारी किया गया। सीडीओ ने जांच में इदरीस पुत्र यूसुफ का तीन संयुक्त खातों में नाम पकड़ा। मामला आसानी से पकड़ में न आ सके, इसके लिए शातिर तरीके से इदरीस के नाम की स्पेलिंग भी हर खाते में अलग-अलग दर्शाई गई। पैसा संयुक्त बैंक खातों से पर्सनल बैंक खातों में ट्रांसफर किया गया था। इसका किसानों के पर्सनल बैंक खातों में लेनदेन का स्टेटमेंट पकड़ा गया। दिलचस्प बात यह है कि जिन लोगों के साथ संयुक्त खाता खोला गया, उनका किसानों के साथ न जमीन में कोई हिस्सा था और ना ही उनका कोई खून का रिश्ता था। 2 नवंबर 2016 की जांच आख्या में स्पष्ट होने के बाद भी जिला प्रशासन ने कोई कार्रवाई नहीं की। क्योंकि सीडीओ ने भी अपनी रिपोर्ट के आखिर में लिख दिया था कि मामले में कोई अनियमितता नहीं है। इससे साफ है कि तत्कालीन प्रशासनिक सिस्टम सारे बंदरबांट को पनाह दे रहा था।

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