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अमर उजाला अभियान: पचास साल में तीन बार बदला गया अरावली का कानून

Noida Bureauनोएडा ब्यूरो Updated Sun, 17 Mar 2019 06:30 PM IST
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अमर उजाला अभियान: पचास साल में तीन बार बदला गया अरावली का कानून
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फरीदाबाद। 1960 के दशक में सबकी सम्मिलित जागीर घोषित अरावली सरकारी लापरवाही और कानून के लचर पालन के कारण बंटते-बंटते वर्तमान मेें बिल्डर और भूमाफिया के हाथ चली गई। ब्रिटिश शासन से संरक्षित चली आ रही अरावली स्वशासन की सरकारों में समाप्ति की ओर पहुंच चुकी है। यह कहना है सेव फरीदाबाद के सदस्य पवन शर्मा शून्य का।
पवन शर्मा दस्तावेज का हवाला देते हुए बताते हैं कि 1960 के दशक में मांगर गांव की अरावली पहाड़ियों की जमीन राजस्व रिकॉर्ड में पंचायत देह के रूप में दर्ज थी। राजस्व रिकॉर्ड में इसे गैर मुमकिन पहाड़ यानी खेती के अयोग्य जमीन दर्ज किया गया था। पंचायत देह की यह जमीन गांव की सार्वजनिक भूमि चरागाह के रूप में इस्तेमाल की जाती थी, इस जमीन की बिक्री प्रतिबंधित थी। 1970 के दशक में कानूनी प्रक्रिया के तहत इस जमीन की मल्कियत पंचायत से समुदाय को हस्तांतरित कर दी गई। बताते हैं कि पर्यावरण प्रेमियों ने इस प्रक्रिया को संदिग्ध करार देते हुए विरोध भी किया था लेकिन इसे वापस नहीं लिया गया। अब पंचायत देह को राजस्व रिकॉर्ड में देह शामलात यानी समुदाय की भूमि के रूप में दर्ज किया गया, हालांकि इस जमीन की बिक्री भी प्रतिबंधित थी।

जमीन की होने लगी खरीद-फरोख्त
1970 के दशक के अंतिम वर्षों में देह शामलात जमीन का हस्तांतरण जमीन मालिकों को कर दिया गया। गांव के जिस व्यक्ति की मैदान में जितनी कृषि योग्य जमीन थी उसे देह शामलात मेें उतनी ही जमीन का मालिक बना दिया गया। वह बताते हैं कि लोगों को जमीन का मालिक तो बना दिया गया था लेकिन इसे सार्वजनिक ही रखा गया यानी बंटवारा नहीं किया गया, इस कारण इसकी बिक्री पर प्रतिबंध लगा रहा। बावजूद इसके ग्रामीणों ने अपने हिस्से की जमीन की बिक्री शुरू कर दी। दिल्ली-एनसीआर के बिल्डरों ने खुद या छद्म नाम पर यहां ग्रामीणों से जमीन खरीद ली।
1986 मे चकबंदी शुरू हुई और सार्वजनिक भूमि के टुकड़े कर उन्हें प्लॉट नंबर दे दिए गए। पवन शर्मा का आरोप है कि चकबंदी सिर्फ कृषि योग्य भूमि की ही की जानी थी लेकिन अधिकारियों की मिलीभगत से पहाड़ की जमीन भी टुकड़े कर प्लॉटों में तब्दील कर दी गई।

चकबंदी की भेंट चढ़ी भूमि
दुर्भाग्यवर्ष मांगरबनी का घना वन क्षेत्र भी चकबंदी की भेंट चढ़ टुकड़ों में बंट गया और इस जमीन की खरीद-फरोख्त होने लगी। सेव फरीदाबाद के वीर प्रताप शर्मा कहते हैं कि पहले सरकारों ने गलत कानून बनाए उसके बाद अधिकारियों ने निजी हित के लिए कानून की मनमानी व्याख्या कर बिल्डर-भूमाफिया को लाभ पहुंचाया। अन्य सदस्य विष्णु गोयल कहते हैं कि इसका नतीजा यह है कि अरावली संरक्षित वन क्षेत्र में अनैतिक ढंग से पांच लेटर ऑफ इंटेंट जारी किए। इनकी आड़ में अरावली में 140 से अधिक अवैध फार्म हाउस, मैरिज लॉन बन गए। उनका आरोप है कि अधिकारियों की मिलीभगत से ही प्रतिबंध के बावजूद अनखीर पीएलपीए क्षेत्र में एक पांच सितारा होटल का काम धड़ल्ले से जारी है।

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