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दिल्ली चुनावः बीजेपी ने जिसे ताकत समझा, वही उसकी सबसे बड़ी कमजोरी बन गई

अमित शर्मा, नई दिल्ली Updated Fri, 14 Feb 2020 10:43 PM IST
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दिल्ली विधानसभा चुनाव 2020: भाजपा चुनाव प्रचार
दिल्ली विधानसभा चुनाव 2020: भाजपा चुनाव प्रचार - फोटो : अमर उजाला
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सार

-भाजपा ने प्रचार में अपने सभी प्रमुख मुख्यमंत्रियों, 240 सांसदों और सैकड़ों प्रचारकों को मैदान में उतार दिया
-कार्यकर्ताओं का कहना है कि यही विशाल फौज भाजपा की हार का सबसे बड़ा कारण बनी
-चुनाव के अंतिम क्षणों तक मनोज तिवारी बनाम दिल्ली के स्थानीय नेताओं के बीच की रस्साकसी खत्म नहीं हो पाई

विस्तार

दिल्ली विधानसभा चुनाव में चुनाव प्रचार के लिए भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने अपनी विशाल फौज जमीन पर उतार दी। चुनाव प्रचार में उसने अपने सभी प्रमुख मुख्यमंत्रियों, 240 सांसदों, सैकड़ों प्रचारकों और बाहर से आए हजारों स्वयं सेवकों की भारी-भरकम सेना उतार दी। पार्टी को उम्मीद थी कि यह फौज छोटी सी दिल्ली में उसकी जीत का मन्त्र पहुंचाने के लिए पर्याप्त होगी। लेकिन भाजपा कार्यकर्ताओं का कहना है कि यही विशाल फौज भाजपा की हार का सबसे बड़ा कारण बन गई। उम्मीदवार से लेकर कार्यकर्ता तक केवल इन स्टार नेताओं के कार्यक्रम आयोजित कराते रह गए और भाजपा की बात लोगों तक नहीं पहुंचाई जा सकी। इसका परिणाम उसे करारी हार के रूप में चुकाना पड़ा।
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शुक्रवार को पार्टी कार्यालय पर हुई मैराथन बैठक में पार्टी ने दिल्ली भाजपा के नेताओं, वरिष्ठ प्रचारकों, संयोजकों और अन्य नेताओं से उनकी राय मांगी थी। इन नेताओं ने ही भाजपा के शीर्ष नेतृत्व को बताया है कि बड़े नेताओं के कार्यक्रम को आयोजित कराने में ही पार्टी की बड़ी ऊर्जा खत्म हो गई, जबकि इसी बीच गरीब लड़कियों को स्कूटी-साइकिल देने की योजना हो या दो रुपये किलो आटा देने की योजना, इनका अपेक्षित प्रचार ही नहीं किया गया। इतने महत्त्वपूर्ण चुनाव में इस बड़ी कमी का भाजपा को भारी नुक्सान हुआ और दिल्ली उसके हाथ से फिसल गई।

बैठक में शामिल एक शीर्ष नेता के मुताबिक, कई नेताओं ने पार्टी नेतृत्व को स्पष्ट जानकारी दी है कि स्पष्ट नेतृत्व का अभाव, केन्द्रीय इकाई और प्रदेश की इकाई के बीच तालमेल की कमी और उम्मीदवारों के चयन में अंतिम समय तक उहापोह और इसको लेकर हुई राजनीति ने पार्टी को भारी नुक्सान पहुंचाया है। चुनाव के अंतिम क्षणों तक मनोज तिवारी बनाम दिल्ली के स्थानीय नेताओं के बीच की रस्साकसी खत्म नहीं हो पाई। दोनों गुटों की आपसी राजनीति में भाजपा को मुंह की खानी पड़ी।

पूर्वांचल से जुड़े एक नेता के मुताबिक उत्तर प्रदेश और बिहार से जुड़े कुछ नेताओं ने पार्टी नेतृत्व को जानकारी दी है कि मनोज तिवारी को पूर्वांचली चेहरे के नाम पर ही अध्यक्ष पद सौंपा गया था, लेकिन अंत तक वे दिल्ली के सभी पूर्वांचली नेताओं को एक साथ लाने में नाकाम रहे। उनके साथ किसी भी बड़े कार्यक्रम में पूर्वांचली नेताओं की बजाय दूसरे समुदाय के नेता दिखते रहे। पूर्वांचली नेताओं में इसको लेकर अंत तक नाराजगी बनी रही।

बिजली-पानी की काट नहीं
एक राय जिस पर सभी भाजपा नेता एकमत हैं, वह यह है कि अरविंद केजरीवाल सरकार की 200 यूनिट फ्री बिजली की योजना पार्टी के हर प्रचार अभियान पर भारी पड़ गई। पार्टी अंत तक उसकी काट नहीं खोज पाई। इसके आलावा पार्टी के पास मध्यम वर्ग को पेश करने के लिए कुछ विशेष नहीं था। स्कूटी-साइकिल की योजना, दो रूपये किलो आटे की योजना का भी अपेक्षित तरीके से प्रचार नहीं किया गया।

गंदी जुबान से खोया मध्यम वर्ग का सपोर्ट
भाजपा नेताओं का मानना है कि बेवजह आक्रामक बयानबाजी ने जनता में उसके लिए गलतफहमी पैदा की। लोगों में यह संदेश गया कि सिर्फ चुनाव जीतने के लिए भाजपा आक्रामक होकर वातावरण खराब कर रही है। यही कारण है कि उसके मुख्य जनाधार माने जाने वाले मध्यम वर्ग ने भी उसका साथ छोड़ दिया। पार्टी को इसका सबसे ज्यादा नुक्सान हुआ। स्वयं पार्टी के शीर्ष नेता अमित शाह भी एक कार्यक्रम के दौरान यह बात मान चुके हैं कि बेवजह की बयानबाजी ने बीजेपी को चुनाव में नुकसान पहुंचाया।
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