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उत्तराखंड में कुटीर उद्योग: मिलता रहे कच्चा माल तो रिंगाल कारीगर हो जाएं मालामाल

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, देहरादून Updated Fri, 22 Nov 2019 03:51 PM IST
रिंगाल से बनी वस्तुओं को देखते लोग
रिंगाल से बनी वस्तुओं को देखते लोग - फोटो : फाइल फोटो
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खास बातें

  • बाजार में मांग तो बढ़ी, हस्तशिल्पियों को नहीं मिला रिंगाल
  • पलायन रोकने को रोजगार का बड़ा साधन बनता है रिंगाल कारोबार
  • पहाड़ों में व्यवसायिक तौर पर नहीं होती है रिंगाल की खेती
उत्तराखंड के पहाड़ों में किसी जमाने में रिंगाल से विभिन्न प्रकार के वस्तुएं बनना रोजगार का एक बड़ा साधन था। वर्तमान में कच्चा माल उपलब्ध न होने से रिंगाल कारोबार सीमित रह गया है। बाजार में इन उत्पादों की डिमांड तो बढ़ रही है। लेकिन कच्चा माल न होने से हस्तशिल्पी वस्तुएं तैयार नहीं कर पा रहे हैं।
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यहां तक की प्रदेश में किसान अपने ही खेत में रिंगाल की व्यवसायिक खेती नहीं कर सकते हैं। इसके लिए वन विभाग ने परमिट लेना पड़ता है। वहीं, आरक्षित वन क्षेत्र में प्राकृतिक रूप से उगने वाला रिंगाल को निकालना प्रतिबंधित है।

प्रदेश के उत्तरकाशी, चमोली, रुद्रप्रयाग, बागेश्वर जिला के कई गांवों में लोगों की आजीविका मुख्य साधन रिंगाल है। इससे विभिन्न प्रकार के वस्तुएं बनाकर करीब सात सौ से अधिक परिवार जुड़े हैं। रुद्रप्रयाग जनपद में देव रिंगाल का उत्पादन सीमित रह गया है। आसानी से कच्चा माल न मिलने के कारण हस्तशिल्पी धीरे-धीरे इस व्यवसाय को छोड़ रहे हैं। जबकि बाजार में इन उत्पादों की मांग बढ़ रही है।

यदि किसी विदेशी बायर ने रिंगाल से बने सजावटी वस्तुओं का बड़ा आर्डर दे दिया तो इसकी सप्लाई करना संभव नहीं है। रुद्रप्रयाग जनपद के उच्छाडुंगी, भुनालगांव, मनसूना, राउलेंक, मोहनखाल, चंद्रनगर समेत केदारघाटी के बडासू आदि गांव में कई लोग रिंगाल हस्तशिल्प से जुड़े हुए हैं। रिंगाल से तरह-तरह की टोकरियां, सूप्पे, लैंप शेड, फ्लावर पॉट, चंगरे समेत अन्य वस्तुएं तैयार करने में हस्तशिल्पियों को काफी समय लगता है।
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त्पादों की बाजार डिमांड बढ़ी

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