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अपने ही घर में संकट में हिमालय स्नो ट्राउट, 2050 तक 21 प्रतिशत घट जाएगा क्षेत्र 

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, देहरादून Updated Thu, 22 Aug 2019 03:39 PM IST
himalayan snow trout fish is in danger
- फोटो : अमर उजाला फाइल फोटो
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भारतीय वन्यजीव संस्थान में आयोजित सेमीनार में यह साफ जाहिर हुआ कि  हिमालय नाजुक दौर से गुजर रहा है। 2050 तक हिमालय की नदियों में पाई जाने वाली स्नो ट्राउट मछली अपनी रिहायश का 21 प्रतिशत हिस्सा गंवा चुकी होगी। हिमालयन पिट वाइपर का आवास क्षेत्र भी प्रभावित हो रहा है। मौसम में बदलाव के साथ ही विकास के लिए हो रहा अनियोजित निर्माण वन्य जीवों के साथ ही मानव के लिए खतरा बन रहा है।
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बुधवार को आयोजित सेमीनार में अलग-अलग विषयों पर शोधार्थियों ने कुल 30 शोधपत्र प्रस्तुत किए। हिमालय की नदियों में ठंडे पानी में रहने वाली मछली स्नो ट्राउट पर किए गए शोध में आशना शर्मा ने स्पष्ट किया कि अगर हालात में कोई बदलाव नहीं हुआ तो नदियों के ऊपरी हिस्से की ओर जाने वाली यह मछली 2050 तक  करीब 4000 वर्ग किलोमीटर या अपने रिहायशी क्षेत्र का करीब 21 प्रतिशत हिस्सा खो देगी।

आशना के मुताबिक नदियों पर बन रहे बांधों का इन मछली पर विपरीत असर पड़ रहा है। इस शोध के जरिये आशना ने उन क्षेत्रों को भी स्पष्ट किया, जहां इस मछली को बचाने के लिए संरक्षित क्षेत्र घोषित किए जा सकते हैं। 

हिमालय का पारिस्थितीकीय तंत्र खतरे में 
निधि सिंह और शिव नारायण यादव ने हिमाचल में लाहौल और पांगी में किए गए शोध के आधार पर बताया कि हिमालय का पारिस्थितीकीय तंत्र खतरे में है। यह जैव विविधता का भंडार है और इसको नुकसान से बचाने के लिए सिक्योर हिमालय जैसी परियोजनाओं में पर्यावरण से तालमेल की बेस्ट प्रेक्टिस को शामिल किया जाना चाहिए।

देहरादून में भारतीय वन्य जीव संस्थान के समीप चंद्रबनी में लंगूरों पर किए गए अध्ययन में एस सुरेश सावंत ने बताया कि जंगल के आसपास कचरा डंप करने से लंगूरों के दल मानव बस्तियों की ओर रुख कर रहे हैं। सिपु कुमार, कालझंग टी और धारानी एम ने हिमाचल में स्पिती घाटी में किए गए शोध के आधार पर बताया कि उच्च हिमालयी क्षेत्र के गांवों में आजीविका का संकट निचले क्षेत्र के गांवों की तुलना में अधिक है।

रुपाली शर्मा, मोनिका शर्मा, मनीषा और हिमांशु बरगाली के शोध से जाहिर हुआ कि हिमाचल के लाहौल पांगी के  जड़ी बूटी एवं सगंध पादप उत्पादन क्षेत्र में अवैध व्यापार, अत्यधिक दोहन जैसी समस्याएं हिमालयी क्षेत्र में उभर कर सामने आ रही हैं। नैतिक पटेल ने हिमालय पिट वाइपर के आवासीय क्षेत्र से संबंधित शोध प्रस्तुत किया। नैतिक के मुताबिक मौसम बदलाव और अन्य कारणों से हिमालय पिट वाइपर का क्षेत्र कम हो रहा है। डॉ.नवीन चंद्र जोशी ने पिथौरागढ़ की बरपतिया समुदाय के लोगों पर किए गए शोध के आधार पर बताया कि औषधि संबंधित पारंपरिक ज्ञान तेजी से लुप्त हो रहा है। 13 गांवों में इस तरह की जानकारी रखने वाले केवल तीन ही लोग बचे हैं।
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