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कार्बेट के बाघ तेजी से बदल रहे ‘इलाका’

Dehradun Updated Mon, 11 Feb 2013 05:31 AM IST
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देहरादून। कार्बेट टाइगर रिजर्व (सीटीआर) के टाइगर तेजी से अपनी टेरेटरी बदल रहे हैं। 2006 से 2012 के बीच में भारतीय वन्यजीव संस्थान की ओर से बाघों की गणना को लेकर किए गए अध्ययन में यह तथ्य सामने आया है। केवल चार ही ऐसे टाइगर थे, जो इस अवधि में अपने क्षेत्र में नजर आए। रविवार को भारतीय वन्यजीव संस्थान के वैज्ञानिक विभाष पांडव ने कार्बेट में बाघों की गणना पर मीडिया को प्रजेंटेशन दिया।
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कार्बेट टाइगर रिजर्व के फुलई चौड़ इलाके को बाघों की नर्सरी कहा जाता है। इस क्षेत्र में सबसे अधिक बाघ पैदा होते थे। कार्बेट टाइगर रिजर्व के निदेशक आरके मिश्रा ने बताया कि 2010 और 2011 में हुई जबर्दस्त बारिश से यहां नदी जैसा नजारा हो गया था। इससे बाघ विस्थापित हो गए, लेकिन अब वे फिर लौटने लगे हैं। प्रजेंटेशन के दौरान पांडव ने बताया कि 2006, 2010 और 2012 में कार्बेट में बाघों की गणना की र्गई। इस दौरान चार को छोड़कर सभी बाघों ने अपनी टेरेटरी बदली। इसका कारण यह है कि जवान बाघ, बूढ़े बाघों को कार्बेट टाइगर रिजर्व से बाहर खदेड़ रहे हैं। इसमें तराई वेस्ट, तराई ईस्ट, रामनगर, लैंसडोन वन प्रभाग और राजाजी पार्क तक शामिल है। भारतीय वन्यजीव संस्थान और कार्बेट टाइगर रिजर्व की ओर से फेज-4 के तहत की गई गणना में लगभग ढाई सौ बाघों का औसत अनुमान लगाया गया है।


बाघों की गणना देश भर में 2014 में होगी। इसके तहत उत्तराखंड में बाघों की गणना का और विस्तार दिया जाएगा। इस बार आसपास के वन प्रभागों में भी कैमरे लगाए जाएंगे। इसको लेकर तैयारी शुरू कर दी गई है। -विभाष पांडव, वैज्ञानिक, भारतीय वन्यजीव संस्थान

कार्बेट बाघों के लिए सबसे मुफीद स्थान है। बाघों के लिहाज से देश में यह सबसे अधिक घनत्व वाला क्षेत्र भी है। ऐसे में जो बाघ मजबूत और जवान होता है, वह कमजोर और बूढ़े बाघों को क्षेत्र से बाहर कर देता है। इसके कारण हर बाघ को अपना क्षेत्र बदलने के लिए मजबूर होना पड़ता है। - एएस नेगी, पूर्व मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक उत्तराखंड

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