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पलटे घंटाघर के इतिहास के पन्ने

Dehradun Updated Thu, 27 Dec 2012 05:30 AM IST
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देहरादून घंटाघर परिसर से पीपल के पेड़ को हटाने के लिए अब वह परिवार भी सामने आ गया है जिसने देहरादून को यह सौगात दी। उनका कहना है कि पीपल का पेड़ घंटाघर की सुंदरता के लिए नहीं लगाया गया, बल्कि पीपल के पेड़ का उगना घंटाघर की देखरेख के प्रति बरती गई लापरवाही का नतीजा है।
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दून घंटाघर का शिलान्यास 24 जुलाई 1948 को सुबह नौ बजकर दस मिनट पर रिमझिम बारिश के बीच हुआ था। इसका निर्माण कराने वाले स्वर्गीय लाला शेर सिंह के पुत्र विजय सिंह का कहना है कि पीपल का पेड़ दुर्लभ स्मारक के लिए खतरा बन चुका है। इसके बावजूद पर्यावरण के नाम पर उसे बचाने की कोशिश की जा रही है। उन्होंने बताया कि मेरे पिता स्व. लाला शेर सिंह और उनके भाइयों ने घंटाघर का निर्माण कराया था। उन्होंने कहा कि यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि इतिहास के तथ्यों को गलत ढंग से पेश किया जा रहा है। कुछ लोगों का कहना है कि तात्कालिक राज्यपाल सरोजनी नायडू ने पीपल का पौधा रौपा था, जो गलत और भ्रामक तथ्य है। उन्होंने कहा कि घंटाघर को पेड़ की जड़े नुकसान पहुंचा रही हैं, इसलिए पेड़ को शिफ्ट किया जाना जरूरी है।



लाल बहादुर शास्त्री ने किया था उद्घाटन
देहरादून। घंटाघर को बनवाने वाले लाला शेर सिंह की पत्नी श्यामलता कहती हैं कि राज्यपाल सरोजनी नायडू ने उस समय कोई पीपल का पेड़ नहीं रोपा था। 1952 में जब घंटाघर बन कर तैयार हुआ तो तत्कालीन रक्षा मंत्री लालबहादुर शास्त्री ने इसका उद्घाटन किया था। उन्होंने भी कोई पीपल का पेड़ नहीं रोपा थ। मैं उस समय भी वहां मौजूद थी। उन्होंने बताया कि घंटाघर को उनके पति स्व. लाला शेर सिंह और उनके भाई आनंद सिंह, हरि सिंह और अमर सिंह ने अपने पिता स्व. लाला बलबीर सिंह की याद में बनवाया था। उस समय घंटाघर के निर्माण में सवा लाख रुपये खर्च हुए थे। इसके लिए छह घड़ियां स्विट्जरलैंड से मंगाई गई थी। उन्होंने कहा कि यह स्मारक इस लिहाज से भी अनूठा है कि अंग्रेजों ने जो घंटाघर बनाए वे दो या चार घड़ियों वाले हैं, जबकि दून का घंटाघर छह घड़ियों वाला है।


मैने वन विभाग को रिमांइडर भेजने के निर्देश दिए हैं, ताकि इस संबंध में पूरी रिपोर्ट हासिल की जा सके। इसमें यह भी शामिल करने को कहा गया है कि पेड़ को शिफ्ट करने से घंटाघर को क्या नुकसान और फायदा होगा---विनोद चमोली, मेयर

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