घंटाघर स्थित पीपल के पेड़ को ट्रांसप्लांट करने की पहल

Dehradun Updated Sat, 22 Dec 2012 05:30 AM IST
देहरादून। घंटाघर को न सिर्फ दून की शान के तौर पर जाना जाता है, बल्कि छह कोण वाला घंटाघर होने से इसे विरासत के तौर पर भी देखा जाता है। लेकिन, राजधानी की इस विरासत को यहां स्थित एक पीपल का पेड़ नुकसान पहुंचा रहा है। पेड़ की जड़ों से इमारत लगातार कमजोर हो रही है। ऐसे में शहर के नीति नियंताओं को इसकी चिंता सताने लगी है। वर्ष 2007 में तत्कालीन डीएम डा. राकेश कुमार और बाद में मेयर विनोद चमोली ने इस पेड़ को शिफ्ट करने की पहल की थी, लेकिन कुछ लोगों के विरोध के कारण मामला लटक गया। तत्कालीन सीएम रमेश पोखरियाल निशंक ने भी पेड़ शिफ्ट करने से मना कर दिया था। लेकिन, अब नगर निगम एक बार फिर पहल करने जा रहा है। कोशिश की जा रही है कि पेड़ को जल्द से जल्द ट्रांसप्लांट कर लिया जाए।

जमीन देने वाले भी तैयार
घंटाघर का निर्माण 1952 में पूरा हुआ था। इसका निर्माण राजा बलबीर सिंह ने कराया था। जमीन तत्कालीन नगर पालिका उपाध्यक्ष महाराज प्रसाद जैन ने दी थी। यह नजूल की भूमि उनके नाम पर थी। उन्होंने ही घंटाघर के किनारे फेंसिंग कराई थी। उनके भतीजे अमित जैन का कहना है कि पीपल के पेड़ से घंटाघर की नींव कमजोर हो रही है। जैन बताते हैं कि घंटाघर के कागजों को देखें तो तब वहां पेड़ नहीं था। ऐसे में इसे शिफ्ट करने में किसी को परेशानी नहीं होनी चाहिए।

बढ़ रही विकास की सोच
राजधानी में विकास कार्यों को लेकर आम जनता की सोच में भी बदलाव नजर आने लगा है। वे समझने लगे हैं कि बढ़ती आबादी के लिहाज से सुविधाओं के लिए पर्याप्त जगह देना उनकी भी जिम्मेदारी है। शायद यही वजह रही कि कुछ दिन पूर्व चकराता रोड पर मजार और हरिद्वार बाईपास पर शिव मंदिर को शिफ्ट करने के प्रस्ताव बिना विरोध मंजूर कर लिए गए।

घंटाघर से शहर की सुंदरता बढ़ती है, लेकिन पेड़ से इसे नुकसान हो रहा है। दर्शनलाल चौक की तरफ से इसकी इमारत नजर भी नहीं आती। पहले बोर्ड में इसे शिफ्ट करने पर स्वीकृति मिली, लेकिन विरोध के बाद काम नहीं हो सका। अब फिर से पेड़ शिफ्ट करने के बारे में सोचा जाना चाहिए, ताकि शहर की धड़कन को जिंदा रखा जा सके।
-विनोद चमोली, मेयर

पेड़ को शिफ्ट करना बेहद मुश्किल कार्य है। इसमें घंटाघर भी गिर सकता है, क्योंकि पेड़ की जड़ें कहां तक फैली होंगी इसका अंदाजा लगाना मुश्किल है। 25 से 30 लाख रुपये लगाकर पेड़ शिफ्ट किया तो भी गारंटी नहीं है कि यह बचा रहे। घंटाघर बचाने के लिए जड़े ही काटनी होंगी।
-डा. सुभाष नौटियाल, वैज्ञानिक एफआरआई

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