सौंग सूखी, जन प्रतिनिधियों की अनदेखी

Dehradun Updated Sun, 02 Dec 2012 05:30 AM IST
देहरादून। धनोल्टी के समीप से निकलने वाली सौंग नदी बरसात के वक्त उफनाई रहती थी, लेकिन सहायक नदी-नालों के सूखने के चलते यह अब लगभग सूख चुकी है। बरसात के वक्त इसमें पानी की धाराएं भर आती हैं। रायपुर के पास यह अवैध खनन के दुष्प्रभाव झेल रही है, वहीं डोईवाला के आस-पास नदी अतिक्रमण की शिकार हो गई है। इसके किनारों पर झोपड़-पट्टी की बसावट हो गई है। आस-पास के नाले नदी में गिरकर इसके किनारों को जहरीला बना रहे हैं। इसके हालात पर किसी भी जन प्रतिनिधि ने आवाज उठाने की भी जरूरत नहीं समझी। यहां भी वोट बैंक का सवाल जो ठहरा।
सरकार नदियों की दुर्दशा को देखते हुए सदन में विधेयक लाने की तैयारी कर रही है। यह विधेयक पास हुआ तो नदियों की चौड़ाई बाढ़ के दिनों में होने वाले उसके फैलाव के आधार पर मानी जाएगी। मतलब साफ कि किनारों के इस फैलाव का चिन्हीकरण करके उसे अवैध कब्जों और अतिक्रमणों से पूरी तरह से मुक्त करा लिया जाएगा। अब तो यही उम्मीद की जा सकती है कि यह विधेयक जल्द से जल्द पास हो और सौंग नदी सिर्फ बरसात नहीं बल्कि पहले की तरह बारहो महीने कल-कल, छल-छल करती रहे।

सौंग से ही निकली थी काली गाड
सौंग से ही काली गाड निकली थी, जो सहस्त्रधारा में तमाम पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र बनी रहती है। हालांकि धीरे-धीरे इसमें भी पानी कम हो गया है। लेकिन बरसात के दिनों में इतना पानी होता है कि आस-पास बसने वालों की मुसीबत तय है।
अक्सर बहते थे लोग, वाहन
भानियावाला से निकल हरिद्वार जाते वक्त इस नदी में कभी रपटा पड़ा करता था, जहां लोगों, वाहनों के बहने की घटनाएं अक्सर सामने आती थीं। 80 के दशक में पुल बनने के बाद हालात में तब्दीली आई। कहा जाता है कि 1960 के आस-पास इसमें बरसात में इतना पानी आता था कि दूर तक लोगों के घर इससे प्रभावित होते थे।
मिलती है गंदगी के गढ़ में
सौंग आगे जाकर सुसवा नदी में मिल जाती है। सुसवा खुद अपनी स्थिति पर आंसू बहा रही है। आलम यह है कि सुसवा में तो अब मछलियां तक नहीं बची हैं। गंदा पानी ही इसकी वजह है।
काश! कोई तो आगे आए.....
नदी के किनारों को अतिक्रमण मुक्त कराने की चाहना स्थानीय जनता को है तो, लेकिन वह इसके लिए सरकार का मुंह तक रही है। उनके अनुसार सख्ती ही अतिक्रमणकारियों को सबक सिखा सकती है--
स्थानीय स्तर पर प्रयास न के बराबर हैं। अतिक्रमण सौंग पुल के पास बहुत है। इससे निजात पाने केलिए प्रशासन को पहल करनी होगी।
--रेखा, शिक्षिका
यहां किसी को किसी के हालात देखने की फुर्सत नहीं। नदी के किनारों पर झोपड़-पट्टे पड़ते जाने का यही कारण रहा। लोग क्या करें, सरकार को करना चाहिए।
--विमल कोठियाल, व्यवसायी

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