कभी कल-कल करती थी यह नदी

Dehradun Updated Fri, 30 Nov 2012 12:00 PM IST
देहरादून। कल-कल करती रिस्पना का दृश्य कब का अदृश्य हो चुका। रिस्पना पुल के ठीक नीचे जीप, ट्रैक्स वालों ने अपना अड्डा बना लिया है। नदी नाले में तब्दील हो चुकी है। गारबेज, डंपिंग ग्राउंड के तौर पर इसका ‘इस्तेमाल’ हो रहा है। नदी के किनारे अवैध अतिक्रमण की भेंट चढ़ चुके हैं। 1977-80 के बीच इन किनारों पर अतिक्रमण शुरू हुआ था। ऊबड़-खाबड़ भूमि को समतल कर लोगों ने यहां अपने झोपड़-पट्टे डालने शुरू किए, जो कच्चे निर्माण से होते हुए ईंटों के मकानों-दुकानों में तब्दील हो गए। इन्हें बसाने में स्थानीय नेताओं का योगदान तो रहा ही, चुनावी बेला में इन अतिक्रमणकारियोंपर सरकारों की भी खूब कृपा बरसी। सड़कें बनीं, हाउस टैक्स लग गया। रिस्पना किनारे की 65 बस्तियां रजिस्टर्ड का दर्जा पा गईं, लेकिन अवैध अतिक्रमण की बात करें तो वह संख्या 10 हजार से ज्यादा है। यह आंकड़ा खुद इन्हें बसाने वाले नेताओं अपने मुंह से बयां करते हैं। ‘वोट बैंक’ के फेर में इन्हें हटाने और नदी तक सांस पहुंचाने की रुचि अलबत्ता इनमें नहीं। अब सवाल यह कि कौन बनेगा रिस्पना का रखवाला। कौन इसे इसकी मुसीबतों से मुक्ति दिलाएगा........।
रिस-रिसकर आता था पानी, बनी रिस्पना
पहाड़ाें की रानी मसूरी से आने वाली इस बरसाती नदी में पानी पत्थरों से रिस-रिसकर पहुंचता था, इसलिए कालांतर में लोग इसे रिस्पना पुकारने लगे। पहले यह रपटा था। बरसात के दिनों में इसमें लबा-लब पानी भरा जाता। इसे पार करने के फेर में कई लोग बह जाते। बाद में इस पर कच्चा पुल बनाया गया। यह मुख्य जरिया था जो शहर को बाहर के अन्य स्थानों से जोड़ता था। सन् 1989 में इस नदी पर पक्का पुल बना तो लोगों को आवागमन का सुविधा हो गई।
पाकिस्तानी शरणार्थियों ने शुरू किए चूने के भट्टे
1947 में भारत की आजादी के बाद कई पाकिस्तानी शरणार्थियों ने यहां शरण ली। चुगान का काम शुरू कर दिया। इसके लिए पूर्वी उत्तर प्रदेश के मजदूरों की मदद ली गई। इन्होंने नदी किनारे अपनी झोपड़ियां डाल लीं। इतिहासकार देवकी नंदन पांडे बताते हैं कि जाड़े के दिनों आग जलाते हुए कुछ मजदूरों ने देखा कि आग से कुछ पत्थर फूट रहे हैं। इसी से पता चला कि अगर पत्थरों को कुछ अधिक ऊष्मा दी जाए तो चूना निकाला जा सकता है, बस तभी से चूने के भट्टे लगने की शुरुआत हो गई।
इनका है कहना :
सरकारों ने क्यों कराए करोड़ों के काम
अगर नदी किनारे बनी बस्तियों को अवैध मानकर हटा दिया जाता तो दिक्कत किसे थी। जो सरकारें रहीं, उन्होंने यहां सड़कें बनवाईं, लाइटें लगवाईं, करोड़ों के काम कराए। उन्होंने ऐसा क्यों कराया? दोष तो उनका है। हम पर इन्हें बसाने का आरोप लगाया जाता है, जबकि हमने तो खाली उनके अधिकारों की बात उठाई। यह कहां गलत है?
-राजकुमार, विधायक (राजपुर)
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नदी की परिभाषा स्पष्ट किए जाने की जरूरत है। जितने भी पट्टे नदी किनारे थे वह सब 1986-87 में नियमित कर दिए गए थे। बड़े नेता, उनके परिवार जमीन ‘चर’ जाते हैं। ‘डकार’ तक नहीं लेते। यहां गरीब को एक टुकड़े पर हो-हल्ला मच जाता है। इन्हें मालिकाना हक दिलाने की लड़ाई हमारी है। इसकी तो सराहना की जानी चाहिए। गारबेज से इसकी मुक्ति जरूरी है।
--उमेश शर्मा ‘काऊ’, विधायक (रायपुर)
यूं संभव रिस्पना को सांस.......
हम सामाजिक कार्यकर्ता हैं। पदयात्रा के जरिए लोगों को पानी के हक के लिए जागरूक करते रहे हैं। यहां मामला अवैध अतिक्रमणकारियों का है, जिस पर सरकार ही किसी आदेश, निर्देश, सख्ती के जरिए नियंत्रण कर सकती है। उसे ऐसा करना चाहिए।
--कमला पंत, सामाजिक कार्यकर्ता
स्थानीय नदियों की दशा सुधारने के लिए कुमाऊं स्थित कोसी नदी के हालात से सीखने की जरूरत है। जागरूकता केजरिए इस नदी की स्थिति में बहुत परिवर्तन आया है। यहां गारबेज डंप न किया जाए। इसे एनजीओ देखें। अवैध निर्माण पर सरकार सख्ती करे।
--शमशेर बिष्ट, सामाजिक कार्यकर्ता

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