तुझको खुदा कहूं या खुदा को खुदा कहूं...

Dehradun Updated Wed, 07 Nov 2012 12:00 PM IST
देहरादून। खचाखच भरे ओएनजीसी स्टेडियम में वडाली बंधुओं की गायकी का अंदाज सुनने वालों के सिर चढ़कर बोला। मंगलवार को विरासत के मेहमान बनकर दून पहुंचे पूरन चंद, प्यारे लाल वडाली भाईयों ने सूफियाना सुर छेड़े तो हर कोई इस जादू में बंधा नजर आया। वक्त गुजरने के साथ-साथ यह महफिल और खूबसूरत होती चली गई। और फिर जब ‘सूरत एक सी है, किसको जुदा कहूं, तुझको खुदा कहूं या खुदा को खुदा कहूं...’ अल्फाज के साथ भाईयों की इस जोड़ी ने अपना मशहूर कलाम ‘तू माने या न माने दिलदारा...’ शुरू किया तो सुनने वाले बस खोकर रह गए। ‘हिना’ के मशहूर गीत ‘आजा वे माही तेरा रस्ता उड़ीक दियां...’ ने कार्यक्रम में और चांद लगा दिए। वडाली बंधुओं ने इससे पहले मंच से ही दून और अपने रिश्ते को कुछ यूं जाहिर किया-‘हम फिर तेरे शहर में हैं...’। इस पर उन्हें जबरदस्त तालियां मिलीं। सबको बधाई दी-कहा, ‘सयोनी गाओ बधाई...’.। इसके बाद ‘मेरा पिया घर आया हो लालनी...’ से तो उन्होंने हर किसी को मदमस्त कर दिया। लोग कुर्सिंयों पर खड़े थे, स्टेडियम की सीढ़ियों पर पैर रखने को जगह नहीं थी, स्टेडियम का स्टैंड तक श्रोताओं से भरा था।

गाना है क्रिकेट नहीं
अपनी पेशकश के दौरान कुछ श्रोताओं के डिस्टर्ब करने पर पहले वडाली बंधुओं ने तंग आकर कार्यक्रम बंद करने की चेतावनी तक दे डाली। फिर बोले-प्रेम से बुलाया है तो प्रेम से सुनो। इस पर भी नहीं लोग नहीं माने तो बोले यह गाना है क्रिकेट नहीं। दाद दें, सीटी न बजाएं।
कुर्सी के लिए गुत्थम-गुत्था
पंडाल में सबसे पीछे वडाली बंधुओं को ठीक से सुनने के लिए कुर्सी ही सबके निशाने पर रही। इसके लिए दो बार तो कई श्रोताओं में गुत्थम-गुत्था होने की नौबत आ गई। इन श्रोताओं के साथ आए लोगों ने बीच-बचाव कर मामले को आगे बढ़ने से रोका।

महासू देवता की डोली निकली
विरासत में सुबह के वक्त जौनसार-भाबर के कलाकारों की प्रस्तुति हुई। इसमें महासू देवता की डोली निकाली गई। हर कोई इस प्रस्तुति पर झूम उठा।

वडाली बंधुओं का सम्मान :
पद्मश्री (2005)
पंजाब संगीत नाटक एकेडमी अवार्ड (2003)
तुलसी अवार्ड (1998)
संगीत नाटक एकेडमी अवार्ड (1991)

इन फिल्मों में बिखरे सुर :
तनु वेड्स मनु (2011)
मौसम (2011)
पिंजर (2003)
धूप (2003)
चिक्कू-बिक्कू (तमिल)
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विरासत में आज :
जौनसार-भाबर के कलाकारों की प्रस्तुति--शाम साढ़े छह बजे
गुलाब बाई की नौटंकी ‘राजा हरिश्चंद्र’---रात आठ बजे

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