आंखों से आंखें चार करने दो...

Dehradun Updated Fri, 02 Nov 2012 12:00 PM IST
मसूरी (देहरादून)। वुडस्टॉक स्कूल का पार्कर हाल बृहस्पतिवार को एक ऐसी सुरमई शाम का साक्षी बना जिसकी याद लोगों को लंबे समय तक रुमानी बनाए रखेगी। गीत-संगीत को जानने वाले उस माहौल का अंदाजा लगा सकते हैं जिसमें मंच से रेखा भारद्वाज की मखमली आवाज गूंज रही हो और दाद देने वालों में मौजूद हों शब्दों के जादूगर गुलजार। रेखा ने जब पति विशाल भारद्वाज की फिल्म ‘सात खून माफ’ का गीत ‘आंखो से आंखे चार करने दो, रोको न रोको न मुझे प्यार करने दो’ शुरू किया तो महफिल अपने शबाब पर पहुंच गई। उनकी आवाज तालियों की तेज गड़गड़ाहट में कहीं डूब सी गई।
यह मौका था विंटरलाइन फांउडेशन और वुडस्टॉक के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित होने वाले पांचवे मांउटेन राइटर्स फेस्टिवल की पूर्व संध्या पर आयोजित रेखा के लाइव कंसर्ट का। उन्होंने शाम का आगाज सूफी गीत से किया और अंत, ‘आंखो से आंखे चार करने दो...’ से। रेखा का गीत सुनने के लिए वुडस्टॉक स्कूल में अध्ययनरत देश-विदेश के छात्रों के साथ ही नगर के कई गणमान्य लोग और फिल्मकार भी मौजूद थे। उन्हें सुनने वालों में प्रख्यात गीतकार गुलजार, फिल्म अभिनेता विक्टर बनर्जी के साथ ही उनके पति और फिल्म निर्माता-निर्देशक विशाल भारद्वाज भी शामिल थे।
रेखा ने डा. बशीर बद्र की कई गजलें भी सुनाईं। साथ ही पहाड़ की सुंदरता पर विशाल द्वारा कंपोज गीत फिल्मी गीत, ससुराल गेंदा फूल, पलकें खोलो, देखो जरा, लाए हैं हम ख्वाबों के तकिए, सुना कर भी भरपूर तालियां बटोरीं। रेखा की आवाज साथ वाद्ययंत्रों पर संगत भीमलाल मोहतो, अतुल और मयूख सरकार ने की।
इससे पहले मांउटेन राइटर्स फेस्टिवल के संयोजक और विख्यात लेखक स्टीफन आल्टर ने स्टेज पर रेखा का स्वागत किया। कार्यक्रम में लेखक बिल एटकिन, सिद्ध संस्था के निदेशक पवन गुप्ता, पालिकाध्यक्ष ओपी उनियाल भी मौजूद रहे।


फिल्मों के लिए फिट है मसूरी : विशाल भारद्वाज
मसूरी। वुडस्टॉक स्कूल में पढ़े-बढ़े फिल्म निर्देशक विशाल भारद्वाज ने विख्यात लेखक रस्किन बांड के उपन्यास पर कई फिल्में बनाई हैं। इनमें सात खून माफ और ब्लू अंब्रेला सबसे चर्चित फिल्में रही हैं। विशाल का मानना है कि मसूरी फिल्मों की शूटिंग के लिहाज से सबसे बेहतर जगह है। माउंटेन राइटर्स फेस्टिवल बाहर के लोगों को इसके साक्षात्कार का मौका देता है। विशाल ने कहा कि वे रस्किन बांड के उपन्यासों पर और भी फिल्में बनाना चाहते हैं। इनमें से कुछ पाइपलाइन में हैं। 11 जनवरी को उनकी निर्देशित फिल्म ‘मटरू की बिजली का मनडोला’ रिलीज होगी। इस फिल्म के गाने रेखा भारद्वाज ने ही गाए हैं।
रेखा भारद्वाज ने कहा कि मसूरी में रहकर उन्होंने कई कविताएं लिखी हैं। उनका कहना है कि पहाड़ रचनाधर्मिता के लिए स्वर्ग है। यहां पर रहकर साहित्य की गद्य और पद्य दोनों ही विधाएं मजबूत होती हैं। कल्पनाशीलता कई गुना बढ़ जाती है।

इंसेट
फिल्म अभिनेता विक्टर बेनर्जी ने कहा कि दुनिया भर के पहाड़ी क्षेत्रों की भौगोलिक परिस्थितियां एक जैसी हैं। कठिन जीवन के कारण आगे बढ़ने का कम मौका मिलता है। मांउटेन स्टेट दुनिया को पर्यावरण संरक्षण का पाठ पढ़ाते हैं।

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फोटो प्रदर्शनी ने लुभाया
मसूरी
फेस्टिवल की पूर्व संध्या पर लगी फोटोग्राफर शंकर श्रीधर की प्रदर्शनी आकर्षण का केंद्र रही। चार हजार मीटर से अधिक ऊंचाई पर खींची गई फोटो हर किसी को अपनी और आकर्षित कर रही थी। लेह-लद्दाख दर्रे से लेकर हिमालय की उच्च श्रृखंलाओं की मनमोहक फोटो देखने बड़ी संख्या में लोग जुटे। शंकर श्रीधर ने इन तस्वीरों के पीछे छिपे जोखिम और रोमांच के बारे में भी बताया।

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