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खेल बजट पर कंजूसी बढ़ती जा रही सरकार की

Dehradun Updated Wed, 29 Aug 2012 12:00 PM IST
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आज (29 अगस्त) हाकी के जादूगर मेजर ध्यान चंद की जयंती है। उन्हें प्यार से दद्दा भी कहा जाता था। उनकी जयंती राष्ट्रीय खेल दिवस के तौर पर मनाई जाती है। दद्दा के जन्मदिन के मौके पर हम उत्तराखंड में खेलों की स्थिति का जायजा ले रहे हैं। साल-दर साल इस नवोदित राज्य के खेल बजट में कमी की जा रही है। वैसे भी राज्य का पूरा बजट हरियाणा जैसे राज्य द्वारा एक खिलाड़ी के ओलंपिक में स्वर्ण पदक जीतने पर मिलने वाली इनामी राशि से थोड़ा ही ज्यादा है। इसी से राज्य में खेल की स्थिति का अंदाजा लगाया जा सकता है। न खेलों के विकास के लिए ढंग का कोई सिस्टम है, न ही उसे प्रोत्साहित करने की योजना। ऐसे में राज्य में अंतरराष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ी कैसे विकसित होंगे समझा जा सकता है। आलम यह है कि राज्य में खेल सुविधाओं की कमी के चलते कई खिलाड़ी दूसरे राज्यों से खेलने को मजबूर हो रहे हैं।
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देहरादून। प्रदेश में खेलों को दूसरे दर्जे पर रखा जा रहा है। जहां हरियाणा जैसे राज्य रियो (ब्राजील में होने वाले अगले) ओलंपिक के लिए अभी से पुरस्कारों की घोषणा कर रहे हैं, वहीं उत्तराखंड में खेलों का बजट कम कर दिया जा रहा है। इससे खेलों पर ही असर पड़ रहा है।
हरियाणा के मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने ब्राजील में 2016 में होने वाले ओलंपिक में पदक विजेताओं के लिए भारीभरकम नगद पुरस्कारों की घोषणा कर दी है। इसमें स्वर्ण पदक जीतने वाले को 20 करोड़ का नगद पुरस्कार घोषित किया गया। लेकिन इसमें उत्तराखंड को तौलें तो स्वर्ण पदक की इनामी राशि से कुछ ही अधिक हमारे राज्य में पूरे खेल विभाग का बजट है। आखिर यही सोचने का विषय है कि कैसे इस राज्य में खिलाड़ी निकलेंगे और कैसे राज्य राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चमक सकता है।
वर्ष 2011-12 में राज्य के खेल विभाग का बजट करीब 39 करोड़ रुपये था। इसमें 27 करोड़ रुपये प्लान में और 11 करोड़ रुपये नॉन प्लान के थे। लेकिन इस वर्ष 2012-13 के लिए सरकार ने खेल विभाग को केवल 34 करोड़ का बजट ही दिया। इसमें 22 करोड़ प्लान में और 12 करोड़ नॉन प्लान में दिए। जबकि खेल विभाग की तरफ से करीब 45 करोड़ के आसपास के प्रस्ताव शासन को भेजे थे। साफ है कि राज्य में खेलों को गंभीरता से नहीं लिया जा रहा है। बजट कम कर देने से खेल सुविधाओं पर ही असर पड़ेगा। खेल निदेशक यूसी कबड़वाल का कहना है कि विभाग से तो ठीकठाक बजट भेजा गया था। अब यह वित्त विभाग ही जाने कि कटौती किसलिए की गई। अब एसपीए से कुछ बजट मांगा गया है, देखें कितना मिलता है।

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