पर्वतीय मार्गों पर नहीं चढ़ पा रही हैं रोडवेज बसें

Dehradun Updated Sat, 11 Aug 2012 12:00 PM IST
देहरादून। संभागीय परिवहन अधिकारी कार्यालय की ओर से 2009 में चकराता और आसपास के क्षेत्रों के लोगों को बेहतर परिवहन सुविधाएं मुहैया कराने के लिए 13 परमिट जारी किए गए थे। परमिट जारी करने के बाद से लेकर त्यूनी हादसे तक परिवहन विभाग की ओर से किसी प्रकार की जांच पड़ताल करने की जहमत नहीं उठाई गई। जबकि त्यूनी हादसे के तत्काल बाद ही रोडवेज से पूछताछ शुरू कर दी गई। हालांकि अभी तक रोडवेज की ओर से किसी प्रकार का जवाब नहीं दिया गया है।
उत्तराखंड परिवहन निगम (रोडवेज) की बसें कैसे चल रही हैं, किस स्थिति में हैं, परमिट जारी करने के बाद चल भी रही हैं या नहीं, कितनी बसों की मीयाद पूरी हो चुकी है आदि बातों की पड़ताल परिवहन विभाग की ओर से कभी की ही नहीं गई। इसका खामियाजा आम आदमी को भुगतना पड़ रहा है। त्यूनी हादसे के बाद ऐसी ही तस्वीर निकलकर सामने आई। हादसे से पहले परिवहन विभाग के किसी भी अधिकारी ने रोडवेज की बसों की स्थिति जानने की कोशिश नहीं की। जबकि हादसे के तत्काल बाद चकराता के लिए जारी किए गए 13 परमिट के बारे में पूछताछ शुरू की गई।

क्या कहते हैं अधिकारी
रोडवेज एक सरकारी एजेंसी है। इसके कारण परिवहन विभाग के अधिकारी रोडवेज की बसों को चेक नहीं करते। क्योंकि, रोडवेज का भी उतना ही सामाजिक दायित्व है, जितना की परिवहन विभाग का।
- सुधांशु गर्ग, संभागीय परिवहन अधिकारी

केवल परमिट मिल जाने भर से रोडवेज की बसें नहीं चलाई जातीं। उसके और भी कई फैक्टर देखने पड़ते हैं।
- सीपी कपूर, परिवहन निगम के मंडलीय प्रबंधक परिचालन

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मूल खबर:
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परमिट देकर भूल जाता है परिवहन विभाग
- न जांच, न पड़ताल, सब हो जाते मालामाल
- पर्वतीय मार्गों पर नहीं चढ़ पा रही है रोडवेज बसें
अमर उजाला ब्यूरो
देहरादून। संभागीय परिवहन अधिकारी कार्यालय की ओर से 2009 में चकराता और आसपास के क्षेत्रों के लोगों को बेहतर परिवहन सुविधाएं मुहैया कराने के लिए 13 परमिट जारी किये गए थे। परमिट जारी करने के बाद से लेकर त्यूनी हादसे तक परिवहन विभाग की ओर से किसी प्रकार की जांच पड़ताल करने की जहमत नहीं उठाई गई। त्यूनी हादसे के तत्काल बाद ही रोडवेज से पूछताछ शुरू कर दी गई। हालांकि अभी तक रोडवेज की ओर से किसी प्रकार का जवाब नहीं दिया गया है।
उत्तराखंड परिवहन निगम (रोडवेज) की बसें कैसे चल रही है। किस कंडीशन में है। परमिट जारी करने के बाद भी चल रही है या नहीं। कितनी बसों की मीयाद पूरी हो चुकी है। इसके बावजूद सड़कों पर दौड़ाई जा रही है। इसको लेकर परिवहन विभाग को कोई खास सरोकार नहीं होता। परिवहन विभाग के अधिकारियों की ओर से कभी भी रोडवेज की बसों की चेकिंग नहीं की जाती है। रोडवेज के अधिकारी अपनी मर्जी से परमिट लेते है और अपनी मर्जी से सड़कों पर बसों को दौड़ाते हैं। बसें खराब हो या अच्छी। इससे उनका कोई खास सरोकार नहीं होता। इसका खामियाजा आम आदमी को भुगतना पड़ रहा है। त्यूनी हादसे के बाद ऐसी ही तसवीर निकलकर सामने आई। हादसे के पहले किसी भी परिवहन विभाग का कोई भी अधिकारी रोडवेज की बसों के बारे में जांच करना गवारा नहीं समझा। हादसे के तत्काल बाद चकराता के लिए जारी किये गए 13 परमिट के बारे में पूछताछ शुरू की गई। रोडवेज और परिवहन विभाग में आपस में तालमेल न होने के कारण पहाड़ों पर बसें नहीं चढ़ पा रहीं है। संभागीय परिवहन अधिकारी सुधांशु गर्ग का कहना है कि रोडवेज एक सरकारी एजेंसी है। इसके कारण परिवहन विभाग के अधिकारी रोडवेज की बसों को चेक नहीं करते। क्योंकि, रोडवेज का भी उतना ही सामाजिक दायित्व है, जितना की परिवहन विभाग का। दूसरी ओर परिवहन निगम के मंडलीय प्रबंधक परिचालन सीपी कपूर का कहना है कि केवल परमिट मिल जाने भर से रोडवेज की बसें नहीं चलाई जाती। उसके और भी कई फैक्टर देखने पड़ते हैं।

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