सरकार ने किया निराश, छोड़ी सुगम की आस

Dehradun Updated Tue, 07 Aug 2012 12:00 PM IST
देहरादून। प्राथमिक विद्यालय कालसी जंगलात जनपद देहरादून की सहायक अध्यापिका भारती पिछले 12 वर्ष से इस दुर्गम विद्यालय में कार्यरत है। पिछले कई वर्षों से यह आस लगाए थी कि दुर्गम स्कूल में इतनी लंबी सेवा के बाद कभी तो उसे सुगम स्कूल में आने का अवसर मिलेगा और वे घर परिवार के नजदीक आ सकेगी। लेकिन इसे विकास कहें या भारती का दुर्भाग्य, उसका दुर्गम स्कूल इस वर्ष सुगम हो गया और उसकी अब तक की दुर्गम स्कूल में की गई सेवाओं को सुगम मान लिया गया। यह केवल भारती का मामला नहीं है बल्कि उसके जैसे सैकड़ों शिक्षकों की परेशानी है, जो सरकारी नीति और रवैये से क्षुब्ध होकर सुगम में आने की आस छोड़ चुके हैं।
शिक्षकों के तबादलों के लिए जो नियमावली तैयार की गई है उसमें शिक्षकों की दुर्गम और अति दुर्गम की सेवाओं को भी सुगम में जोड़ दिया गया है। भारती रतूड़ी बताती हैं कि दुर्गम स्कूल में इतनी लंबी सेवा के बाद अब उनके घर के नजदीक के स्कूल में आने के सभी रास्ते बंद हो गए हैं। दुर्गम स्कूल में सेवा के बाद उसे आज नहीं तो कल फिर से दुर्गम स्कूल में ही जाना पड़ेगा। प्राथमिक विद्यालय कुड़कावाला की निकिता बताती हैं कि पौड़ी गढ़वाल में सात वर्ष की सेवा दुर्गम में की और नौ वर्ष की सेवा सुगम में, लेकिन उनकी दुर्गम में की गई सेवा को नहीं जोड़ा गया है। इसमें संशोधन के लिए अधिकारियों के चक्कर लगा रही हूं, लेकिन कोई सुनने को तैयार नहीं है। जीजीआईसी ज्वालापुर हरिद्वार की शकुंतला के मुताबिक उनकी 22 वर्ष की सेवा पौड़ी गढ़वाल के दुर्गम स्कूल की है, लेकिन इतनी लंबी सेवा दुर्गम में करने के बावजूद उनकी सेवा सुगम में जोड़ दी गई है। पूर्व माध्यमिक विद्यालय कैलाऊ नैनीडांडा के सुरेश चंद देवरानी की 23 वर्ष की सेवा दुर्गम की है, इसके बाद भी उनका अनिवार्य तबादला पात्रता सूची से नाम गायब है।
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केस नंबर एक
न तो मेरी ऊंची पहुंच है और न ही मेरे पास मंत्री एवं अधिकारियों को देने के लिए पैसा है। मैं किसके पास जाऊं, पिछले 12 वर्ष से दुर्गम स्कूल में हूं। आज स्थानांतरण शुरू हुए तो स्कूल सुगम हो गया है। यह कहना है राजकीय कन्या उच्चतर माध्यमिक विद्यालय मथाली रुद्रप्रयाग की प्रभा कुंवर सजवाण का। प्रभा बताती हैं कि पति नहीं हैं, सास भी वृद्ध है, दुर्गम में विपरीत परिस्थितियों में नौकरी की, सोचा सुगम में आने का अवसर मिलेगा, लेकिन कोई एप्रोच नहीं होने से निराश हूं।
केस नंबर दो
जीआईसी चंपेश्वर पौड़ी गढ़वाल के ओमवीर सिंह की 21 वर्ष से अधिक की सेवा दुर्गम और अति दुर्गम स्कूलों में हो चुकी है, लेकिन अनिवार्य तबादलों के लिए पात्रों की सूची से नाम गायब है।
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अब दुर्गम में नहीं जाएंगी 50 वर्ष से अधिक उम्र की शिक्षिकाएं
शिक्षिकाओं के लिए राहत की बात यह है कि 50 वर्ष से अधिक उम्र की शिक्षिकाओं को अब दुर्गम स्कूलों में नहीं भेजा जाएगा। मंगलवार को इसका शासनादेश जारी कर दिया जाएगा। रही बात स्कूलों के सुगम-दुर्गम के निर्धारण की, प्रत्येक जिलों में पर्यवेक्षक नियुक्त कर दिए गए हैं, इसके अलावा संबंधित जिलों के जिलाधिकारी इस तरह की समस्याओं का निस्तारण करेंगे।-मनीषा पंवार, शिक्षा सचिव

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