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क्या ईरान से अमेरिका का बढ़ता तनाव युद्ध में बदलेगा, उकसाने की हो रही कोशिश

निकोलस क्रिस्टॉफ Updated Tue, 21 May 2019 05:37 AM IST
सांकेतिक तस्वीर
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : सोशल मीडिया
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अमेरिका क्या ईरान के साथ युद्ध की ओर बढ़ रहा है? वास्तव में अमेरिका पहले ही एक दलदल में फंसा हुआ है। यमन के निरर्थक युद्ध में अमेरिका अब तक लगभग ढाई लाख मौतों में उलझ गया है, जिनमें से अनेक बच्चे हैं, जो भूख के कारण मर गए। कुछ ही दिनों पहले बम धमाके (संभवतः अमेरिका निर्मित) में चार यमनी बच्चे मारे गए। वहां हर बारह मिनट में एक बच्चा मर जाता है। कई बुरे खिलाड़ियों की वजह से यमन एक जटिल जगह है, लेकिन मूल बात यह है कि चूंकि अमेरिका की दुश्मनी ईरान के प्रति है और सऊदी अरब के साथ उसके अच्छे रिश्ते हैं, इसलिए वह यमनी बच्चों को भूख और बम धमाकों में मरने में मदद कर रहा है।
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क्षेत्र में तनाव बढ़ने के साथ सऊदी अरब अब अमेरिका को दुश्मनी बढ़ाने और ईरान पर सैन्य हमले करने के लिए उकसा रहा है। बृहस्पतिवार को सऊदी सरकार से संबद्ध अरब न्यूज ने लिखा-'अमेरिका को ईरान पर कड़ा हमला करना चाहिए।'

यह 2015 में सऊदी अरब की नीति थी, जब वहां के उन्मत्त युवराज मोहम्मद बिन सलमान ने यमन में हस्तक्षेप किया था। वह अपनी कठोरता दिखाना चाहते थे और यह मानते थे कि उनके सशस्त्र बल ईरान समर्थित गुट हूती विद्रोहियों को कुचल देंगे। इसके बजाय सऊदी अरब के हस्तक्षेप के परिणामस्वरूप यमन में ईरान का प्रभाव बढ़ गया। जिसे संयुक्त राष्ट्र दुनिया का बदतर मानवीय संकट कहता है, सऊदी अरब ने उसे बढ़ाने में मदद की है। अब जब फिर से ईरान के साथ अमेरिकी संघर्ष की बात हवा में तैर रही है, यमन यह याद दिलाता है कि युद्ध में शामिल होना आसान है, जबकि उससे निकलना मुश्किल।

वे सउदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात ही हैं, जिन्होंनेे यमन पर बम गिराए, लेकिन वाशिंगटन हथियारों और खुफिया सूचनाओं की आपूर्ति करता है, जो इस युद्ध को अनिश्चितकाल तक खींचने की अनुमति देता है। अमेरिकी नीति यमनी बच्चों को भुख से मरने देने का समर्थन करती है, क्योंकि वे ईरान से संबद्ध एक गुट से शासित हैं।

यह पक्षपातपूर्ण मुद्दा नहीं होना चाहिए। यमन में पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा ने सऊदी अरब का समर्थन किया था, और ट्रंप ने उस समर्थन को दोगुना कर दिया। ज्यादातर राष्ट्रपति उम्मीदवारों ने ( बर्नी सैंडर्स को छोड़कर, जो यमन युद्ध के सख्त विरोधी थे) यमन का ज्यादा जिक्र नहीं किया और जनता ने भी उस पर कोई ध्यान नहीं दिया। मैं इसके बारे में आंशिक रूप से लिख रहा हूं, क्योंकि मैं पिछले वर्ष सऊदी नाकाबंदी के दौरान छिपते-छिपाते यमन चला गया था, जहां अपने द्वारा चुकाए गए कर को वहां बच्चों को भूखे मारने में मददगार होते देख स्तब्ध था।

अमेरिकी संसद ने युद्ध में अमेरिकी भागीदारी खत्म करने के लिए एक द्विदलीय प्रस्ताव पारित किया, लेकिन पिछले महीने राष्ट्रपति ट्रंप ने इस पर वीटो कर दिया। संयुक्त राष्ट्र का एक हालिया अध्ययन बताता है कि यदि युद्ध इस वर्ष समाप्त होता है, तो इसमें 2,33,000 लोग मारे जाएंगे और अगर यह 2022 तक जारी रहता है, तो कुल 4,82,000 लोगों के मारे जाने की आशंका है। संयुक्त राष्ट्र का अनुमान है कि अगर यह युद्ध 2030 तक जारी रहता है, तो 18 लाख लोग मारे जाएंगे। संयुक्त राष्ट्र के यमन स्थित मानवीय समन्वयक लिसे ग्रैंडे ने इसी महीने मुझे बताया, 'हर महीने चीजें और बुरी होती जा रही हैं। आज यमन में कोई भी ऐसा व्यक्ति काम नहीं कर रहा, जो यह न मानता हो कि इस भयानक, संवेदनहीन संकट का एकमात्र समाधान संघर्ष को समाप्त करना है। हमें इस तथ्य का सामना करना होगा कि यदि युद्ध खिंचता है, तो यमन विफल राज्य हो जाएगा और पीढ़ियों तक अस्थिर रहेगा। लगभग हर परिवार ने किसी न किसी को खोया है, हर परिवार भूखा है, बच्चे स्कूल से बाहर हैं या हैजे से संघर्ष कर रहे हैं। यह समझना बहुत मुश्किल है कि क्यों इतने मासूम लोगों की जान इतनी कम लगती है।'

सऊदी अरब के उन्मत्त युवराज द्वारा यमन में जल्दबाजी में किया गया हस्तक्षेप न केवल उल्टा पड़ गया, बल्कि उसने ईरान की मदद की। लेकिन सीएनएन की जांच में यह भी पाया गया कि इसने अल कायदा से जुड़े लड़ाकों को अमेरिकी हथियार देने के लिए सऊदी अरब को प्रेरित किया। अराजकता के कारण हैजा फैल गया, जो हाल में और बिगड़ गया, वर्ष 2019 में अब तक 3,00,000 से अधिक संदिग्ध मामले सामने आए।

ईरान और हूती विद्रोहियों ने भी बुरा व्यवहार किया है, लेकिन यमनी बच्चों के खिलाफ युद्ध अपराध का समर्थन अमेरिकियों का सबसे खराब बहाना है। सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात अब यमन युद्ध के प्रति उतने उत्साही नहीं हैं, लेकिन वे युद्ध छोड़ना और ईरान व हूतियों को नहीं जीतने देना चाहते। ऐसे में, मानना मु्श्किल है कि इस मुद्दे पर अमेरिका के बल प्रयोग के बगैर यह युद्ध खत्म हो सकता है।

ट्रंप ने कहा है कि अगर अमेरिका सऊदी अरब को हथियार नहीं बेचता है, तो रूस या चीन उसे हथियार देगा। लेकिन सऊदी अरब को अमेरिकी स्पेयर्स पार्ट्स की जरूरत है, और यह आंशिक रूप से अंतर्निहित सुरक्षा गारंटी के लिए भी अमेरिकी हथियार खरीदता है, जो उनके साथ आता है। कोई भी अन्य देश ऐसी सुरक्षा उपलब्ध नहीं कराता है।

ब्रूकिंग इंस्टीट्यूशन में पश्चिम एशिया के विशेषज्ञ ब्रूस रिडेल का कहना है कि सऊदी सेना अमेरिकी स्पेयर्स पार्ट्स, लॉजिस्टिक और गोला-बारूद पर निर्भर है। अगर वाशिंगटन अपनी विशाल ताकत का इस्तेमाल करता है, तो सऊदी अरब के पास युद्ध को खत्म करने के सिवा और कोई चारा नहीं है। अमेरिका ईरान के साथ टकराव के बढ़ते जोखिम की ओर बढ़ रहा है और अमेरिकी नौसेना विशेष रूप से फारस की खाड़ी में एक दुर्घटना के बारे में चिंतित है, जो युद्ध के समय बढ़ती है। वर्ष 1988 में ऐसे ही तनाव के दौरान अमेरिका ने गलती से एक ईरानी यात्री विमान को मार गिराया था, जिसमें सवार 290 लोग मारे गए थे।

इसलिए ईरान के साथ सीधे युद्ध के जोखिम को कम करने के लिए अमेरिका को काम करना चाहिए। लेकिन ईरान की सीमा के बाहर इस पुराने और शर्मनाक युद्ध को भी नहीं भूलना चाहिए : यमन में बच्चों को भूख से मरने और उनके ऊपर बमबारी के लिए अमेरिकी समर्थन खत्म कर देने का वक्त आ गया है।
 

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