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स्थानांतरण कानून का विरोध क्यों, कहीं तेजी से फला-फूला उद्योग बंद न हो जाए

K S Tomarकेएस तोमर Updated Thu, 17 Oct 2019 07:56 AM IST
के एस तोमर, राजनीतिक विश्लेषक
के एस तोमर, राजनीतिक विश्लेषक - फोटो : a
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केंद्र और राज्य सरकारों के लाखों कर्मचारियों को देश के अनिच्छित स्थानों पर स्थानांतरण और पदस्थापन के जरिये परेशान किया जाता है, उनके स्थानांतरण भत्ते, यात्रा भत्ता, महंगाई भत्ता आदि पर करोड़ रुपये खर्च किए जाते हैं, और साथ ही, नेताओं और संबंधित अधिकारियों/कर्मचारियों को भ्रष्टाचार में लिप्त होने का मौका भी दिया जाता है। पिछले पचास साल में कर्मचारियों के स्थानांतरण और पदस्थापन से संबंधित उद्योग तेजी से फला-फूला है और लोगों के चुने हुए प्रतिनिधियों ने इसके माध्यम से काफी पैसे कमाए हैं, हालांकि ईमानदार राजनेताओं की भी देश में कमी नहीं है। पर उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और हरियाणा की भाजपा सरकारों ने ऐतिहासिक स्थानांतरण नीति अधिनियम लागू किया है, जिसने कर्मचारियों को मंत्रियों, सांसदों, विधायकों, सभी दलों के नेताओं, बिचौलियों आदि के चंगुल से मुक्त कराया है, क्योंकि कर्मचारियों को दंडित करने की उनकी शक्ति वापस ले ली गई है।
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दरअसल हर वर्ग के राजनेताओं के पास ऐसे कर्मचारियों को स्थानांतरण के जरिये दंडित करने का हथियार है, जो उनके कहे अनुसार काम नहीं करते। कर्मचारियों को तब भी अपमानित होना पड़ता है, जब वे गांवों, कस्बों और शहरों में सत्तारूढ़ पार्टी के नेताओं के इशारे पर नहीं नाचते। और अगर कर्मचारी मनपसंद जगह पर पदस्थापन चाहते हैं, तो इसमें पैसे का लेन-देन होता है और इस सूची को तैयार करने वाले जनप्रतिनिधि एवं अधिकारी की इसमें प्रमुख भूमिका होती है, जिसे अंततः मंत्रियों और मुख्यमंत्रियों द्वारा अनुमोदित किया जाता है।

तीन भाजपा सरकारों द्वारा लागू नए अधिनियम की मुख्य विशेषता यह है कि इसमें एक क्षेत्र में अधिकतम पांच साल रहने का प्रावधान किया गया है, और अगर कोई कर्मचारी या शिक्षक आदेश का पालन नहीं करता, तो उसके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई का प्रावधान है। पदोन्नति शिक्षण और अन्य मानदंडों के कौशल से संबंधित अंकों के आधार पर तय होगी। यों तो स्थानांतरण पूरे वर्ष होते हैं, पर नया कानून जनवरी से 15 मार्च तक ऐसे स्थानांतरण और समायोजन की अनुमति देता है। जब स्थानांतरण का आदेश सत्र के बीच में जारी होता है, तो छात्रों को परेशानी होती है। पारस्परिक आधार पर स्थानांतर की अनुमति नहीं है, जो शिक्षा विभाग में रैकेट का एक प्रकार है। जब भी कोई पदस्थापन की अवधि पूरी करता है, तो वे आपस में जगह बदल लेते हैं, जिससे पदस्थापन कार्यकाल के प्रावधान निरर्थक हो जाते हैं।

यह खुला रहस्य है कि उपरोक्त तीन राज्यों के मुख्यमंत्रियों को छोड़ अन्य किसी मुख्यमंत्री ने इस नए कानून के प्रति दिलचस्पी नहीं दिखाई है, क्योंकि वे कर्मचारियों द्वारा नाराज करने की स्थिति में उन्हें स्थानांतरण के जरिये प्रताड़ित करने के हथियार को बनाए रखना चाहते हैं। इस पृष्ठभूमि में हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर को दुविधा का सामना करना पड़ रहा है कि प्राथमिक और माध्यमिक कक्षाओं के 80,000 शिक्षकों के लिए नई स्थानांतरण नीति अधिनियम को लागू किया जाए या नहीं, क्योंकि उनके मंत्रियों, विधायकों एवं कांग्रेस समेत सभी पार्टी के निचले स्तर के नेताओं ने इसका विरोध किया है। इस कानून से न केवल समाज में उनका रुतबा घट जाएगा, बल्कि शिक्षक समुदाय को स्थानांतरण के जरिये प्रताड़ित करने का उनका विशेषाधिकार भी छिन जाएगा।  इस मुद्दे पर जयराम ठाकुर अकेले पड़ गए हैं, जो वोट की राजनीति से ऊपर उठकर इस कानून को लागू करना चाहते हैं, जो ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के लोगों के लिए एक वरदान होगा, जहां शिक्षण संस्थानों में शिक्षकों की कमी है और छात्र दशकों से पीड़ित हैं।

उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और हरियाणा ने इस कानून को लागू कर राजनीतिक हस्तक्षेप को खत्म कर दिया है। इससे शिक्षक समुदाय में राहत और संतोष की भावना है। लेकिन हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला और इसके आसपास के स्कूलों में शिक्षकों के टिके रहने की अवधि चौंकाने वाली है। करीब 47,000 शिक्षक ऐसे हैं, जो पिछले 25 साल से राजधानी में टिके हैं और 25,000 अन्य शिक्षकों ने दो किलोमीटर के दायरे में टिके रहने की व्यवस्था कर ली है। स्कूलों में पढ़ाने के बजाय 53 शिक्षक अपने पदस्थापन में हेरफेर कर शिक्षा निदेशक के कार्यालय में गैर-शिक्षण कार्य कर रहे हैं, जिससे नियमित लिपिक आदि की रिक्तियां बाधित हुई हैं।

हिमाचल उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश राजीव शर्मा ने पिछली कांग्रेस सरकार को इस मुद्दे को गंभीरता से निपटाने का आदेश देते हुए कहा था कि शिक्षकों के अनुचित एवं अतार्किक ठहराव की अनुमति देने का औचित्य बताने के साथ ऐसे शिक्षकों की सूची भी पेश करे। लेकिन उसका कोई सकारात्मक नतीजा नहीं निकला था। ये विशेषाधिकार प्राप्त शिक्षक कोई सामान्य व्यक्ति नहीं हैं, बल्कि वे मंत्रियों, विधायकों, यहां तक कि सभी पार्टियों के निचले स्तर के प्रभावी नेताओं, नौकरशाहों, मंत्रियों के निजी सचिव/ निजी सहायक आदि के रिश्तेदार हैं, जो सचिवालय में अपनी शक्ति का उपयोग करते हुए शिक्षकों के पदस्थापन में हेरफेर करने की पूर्ण क्षमता हासिल कर चुके हैं। स्वास्थ्य विभाग भी इस तरह की बीमारी का शिकार है, क्योंकि डॉक्टर, नर्स और पैरामेडिकल स्टाफ इस तरह के राजनीतिक हेरफेर में संलिप्त रहते हैं और ग्रामीण एवं दूर-दराज के इलाके कर्मचारीविहीन है, जो ऐसे अस्पतालों, स्वास्थ्य केंद्रों के उद्देश्यों को नकारते हैं।

राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि राजनेता इस नए कानून को कठोर मान सकते हैं, क्योंकि यह दोषी शिक्षकों को दंडित करने के उनके अधिकार को कमजोर करेगा। पर्यवेक्षकों का कहना है कि भले ही हिमाचल के मुख्यमंत्री इस कानून को लागू करने के मामले में प्रतिबद्ध हों, पर वोट बैंक की राजनीति के कारण मंत्री और सभी दलों के विधायक इसमें अड़चन डाल रहे हैं। ऐसे में यह ऐतिहासिक सुधार दूर की कौड़ी लगता है। देखना यह है कि मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर अपने मंत्रियों, विधायकों और पार्टी नेताओं को नाराज कर इतिहास रचते हैं या नहीं!
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