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स्वयंसेवक की बाजी : असंभव समझे जाने वाले इस क्षण को, संभव कर दिया गया

यशवंत व्यास Updated Tue, 06 Aug 2019 12:07 AM IST
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इच्छाशक्ति और अनिर्णय के बीच बहुत ज्यादा दूरी नहीं होती। राजनीति में तो कई बार यह बात दिलचस्प शक्ल ले लेती है। कुछ चीजें इच्छापूर्वक अनिर्णीत छोड़ दी जाती हैं या अनिच्छापूर्वक निर्णीत हो जाती हैं। इसमें बहुत-सी आसानियों, समीकरणों और दुश्वारियों का हिसाब रखा जाता है। यदि अनिर्णय के माहिर केंद्र में हों, तो एक उपयोगी धुंध बना ली जाती है। 
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हो जाए या न हो, दोस्तों और दुश्मनों - दोनों के बीच सहज, धुंधला संबंध जीवित रहता है और सारे जोखिम टाल दिए जाते हैं। जनप्रिय बने रहने के, कई नुस्खों में से एक यह भी है। एक दूसरा रास्ता जोखिम लेने का है। इसके लिए आर या पार का ईमानदार साहस एकत्र करना होता है और भविष्य के खतरों का भय भी लिख लेना होता है।

यह पहली बार है, जब बहुत से यथास्थितिवादी सदमे में आ गए हैं। क्योंकि खुद नरेंद्र मोदी के पार्टी के सदस्य जो अपनी आंखों में 370 जाने का सपना देखते-देखते बूढ़े हो गए, कल्पना नहीं कर पा रहे थे कि उनका एक 'स्वयंसेवक' इस आसानी से किसी दिन ऐसी बाजी खेल जाएगा। कश्मीर की गांठ क्या है, यह कौन नहीं जानता। लेकिन, इसका सीधा सामना नहीं किया जाता। वे तथ्य जो बार-बार दोहराए और विवाद के केंद्र में लाए जाते हैं, अंततः वहीं जाकर और बड़े सवाल के तौर पर खड़े हो जाते हैं। 

पाकिस्तान के साथ एक साझा अतीत और सांप्रदायिकता का तड़का एक स्थायी रेसिपी है। आतंकवाद को कमर्शियल एंटरप्राइज बना देने वाले कई तत्व इसे अपने-अपने दृष्टिकोण से पेश करते रहे हैं। लद्दाख के अपने दुख थे और वह सालों से अलग प्रदेश के रूप में दर्जा दिए जाने की मांग करता रहा है। जम्मू की स्थिति अपने आप में स्पष्ट है। वह घाटी ही है, जो पूरी 'कश्मीरियत' के नाम पर की जा रही सियासत के शीर्ष पर खड़ी होती रही है। 
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