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असम का दर्द समझिए

आनंद कुमार Updated Fri, 17 Jan 2020 06:47 PM IST
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एनआरसी
एनआरसी - फोटो : a
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हाल ही में असम के लोगों को बांग्लादेश से आने वाले अवैध प्रवासियों से राहत दिलाने के लिए भारतीय नागरिकता कानून में बदलाव किया गया। लेकिन विडंबना यह है कि समाज के एक तबके ने इसके खिलाफ नया आंदोलन शुरू कर दिया। ये लोग नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) का विरोध कर रहे हैं, क्योंकि उन्हें आशंका है कि इससे सीमा पार से आने वाले आप्रवासियों द्वारा असम की संस्कृति को नष्ट कर दिया जाएगा। वे चाहते हैं कि 24 मार्च, 1971 के बाद असम आए सभी प्रवासियों को राज्य से बाहर निकाला जाए। ऐसा करना लगभग असंभव काम है, क्योंकि 1985 में केंद्र सरकार और प्रदर्शनकारियों के बीच हुए असम समझौते के बाद राज्य की स्थिति नाटकीय ढंग से बदल गई है।
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असम समझौते पर हस्ताक्षर के बाद बांग्लादेश के अवैध अप्रवासियों के खिलाफ आंदोलन करने वाले राज्य में शांति स्थापित हुई। लेकिन दुर्भाग्य से समझौता होते ही बांग्लादेशी घुसपैठियों को रोकने के लिए बहुत कुछ नहीं किया गया। स्थिति तब और बदतर हुई, जब 1990 में बांग्लादेश में बांग्लादेश राष्ट्रवादी पार्टी (बीएनपी) सत्ता में आई। यह पार्टी बांग्लादेश के अल्पसंख्यकों के प्रति काफी शत्रुतापूर्ण व्यहार करती थी। इस दौरान बांग्लादेश में इस्लामिक चरमपंथ का उभार भी देखा गया। इसने बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों के जीवन को दूभर बना दिया और भारी संख्या में वहां के लोग भारत आ गए। इस स्थिति में तब कुछ सुधार हुआ, जब 1996 में शेख हसीना के नेतृत्व में अवामी लीग सत्ता में आई। हालांकि अपने पहले कार्यकाल में हसीना ने अल्पसंख्यकों के लिए बहुत कुछ नहीं किया। भारत की कमजोर केंद्र सरकारों ने भी इस मुद्दे को प्रभावी ढंग से नहीं उठाया। बल्कि यह कहना गलत नहीं होगा कि अतीत में भारत की केंद्र सरकारों के एजेंडे में अल्पसंख्यकों पर अत्याचार और बांग्लादेश से अवैध प्रवास का मुद्दा कभी प्राथमिकता में नहीं रहा। इससे बांग्लादेश से पलायन बढ़ा और इसके चलते असम में बांग्लादेश से आए हिंदू प्रवासियों की संख्या भी बढ़ी।

सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (एनआरसी) केवल असम में ही तैयार किया गया। 31 अगस्त, 2019 को एनआरसी अपडेट किए जाने से इसकी अपनी चुनौतियां खत्म हो गईं। लेकिन करीब 19 लाख नागरिक इस नागरिकता रजिस्टर में स्थान पाने से वंचित रह गए, जिसमें दस लाख से ज्यादा हिंदू हैं। ये ऐसे लोग हैं, जो बांग्लादेश में धार्मिक उत्पीड़न से परेशान होकर कठिन परिस्थितियों में असम आए। अगर केंद्र सरकार उन्हें वापस भेजने की कोशिश करती है या उन्हें भारत में देशविहीन बनाकर छोड़ देती है, तो उससे नई समस्याएं पैदा होंगी। इन्हीं चुनौतियों से निपटने के लिए नागरिकता कानून में संशोधन किया गया है। इसके अलावा, यह उन गैर-मुस्लिम अल्पसंख्यकों की भी मदद करेगा, जो पाकिस्तान और अफगानिस्तान जैसे मुस्लिम बहुल देशों से भागकर आए हैं।

यह तर्क देना बेकार है कि सीएए भारतीय संविधान और धर्मनिरपेक्षता की भावना के खिलाफ है। जो लोग ऐसा कह रहे हैं, उन्हें दक्षिण एशिया के इतिहास पर नजर डालनी चाहिए और देखना चाहिए कि इस क्षेत्र में कैसे राष्ट्रों का गठन हुआ है। पाकिस्तान का गठन मुस्लिमों की मातृभूमि के रूप में हुआ, क्योंकि जिन्ना और उनकी पार्टी मुस्लिम लीग ने तर्क दिया था कि मुस्लिम और हिंदू दो राष्ट्र हैं। उन्होंने यह भी कहा था कि हिंदू बहुल भारत में मुसलमान सुरक्षित नहीं रहेंगे। अगर ऐसा है, तो किसी मुस्लिम को उसकी मातृभमि पाकिस्तान या बांग्लादेश में कैसे सताया जा सकता है! और अगर वे वहां प्रताड़ित होते हैं, तो क्यों उन्होंने पाकिस्तान को अपनी मातृभूमि के रूप में चुना। सीएए के कुछ आलोचक कहते हैं कि अहमदिया मुसलमानों पर पाकिस्तान में अत्याचार होता है। पर दिलचस्प बात यह है कि अहमदिया मुसलमानों ने पाकिस्तान के निर्माण में जिन्ना का समर्थन किया था। अब अगर वे वहां सताए जाते हैं, तो उन्हें अपने फैसले का नतीजा भुगतना चाहिए।
पूर्व की केंद्र सरकारों की लापरवाही के कारण बांग्लादेश से आने वाले अवैध प्रवासियों का मुद्दा जटिल हो गया है। इससे घुसपैठियों की संख्या में भारी वृद्धि हुई, जो अब पूरे भारत में फैल गए हैं। असम, मेघालय, त्रिपुरा और पश्चिम बंगाल को बांग्लादेश का सीमावर्ती राज्य होने के कारण खामियाजा भुगतना पड़ रहा है। यह बेहद हैरान करने वाली बात है कि असम, मेघालय और त्रिपुरा के लोग इन राज्यों की बदलती जनसांख्यिकी से चिंतित हैं।

हालांकि उन्हें समझना चाहिए कि भारत की अदालतें (सुप्रीम कोर्ट भी) और केंद्र सरकार गंभीर है और अवैध प्रवास के मुद्दे से निपटने के लिए मिलकर काम कर रहे हैं। जो लोग अवैध प्रवास की समस्या को हल नहीं होने देना चाहते, वे झूठ फैला रहे हैं कि सीएए से बड़े पैमाने पर बांग्लादेश से घुसपैठ बढ़ेगा और असमी लोगों को उखाड़ फेंका जाएगा। आजादी के बाद से जिन राजनीतिक पार्टियों ने अवैध प्रवास को रोकने के लिए कुछ नहीं किया, वे अब असमी भाषा और संस्कृति को बचाने की बातें कर रही हैं। जाहिर है, उनका इरादा कुछ और है। वे सिर्फ राजनीतिक और चुनावी लाभ के लिए इस पूरी प्रक्रिया को अधर में लटकाना चाहते हैं। उनका यह भी तर्क है कि वे नहीं चाहते कि असम को नागपुर से चलाया जाए। लेकिन अगर बांग्लादेश से अवैध प्रवास जारी रहा, तो यह असम में इस्लामिक शासन के लिए एक नुस्खा होगा।

 अवैध प्रवास का मुद्दा अतीत में राजनीतिक फुटबॉल बनकर रहा है। यह ऐसा महत्वपूर्ण समय है, जब भारत की राजनीतिक पार्टियां अपने अल्पकालिक राजनीतिक व चुनावी लाभ के आधार पर काम करना बंद कर दें। केंद्र सरकार ने पहले ही हिंदू प्रवासियों के लिए भी कटऑफ तिथि 31 दिसंबर, 2014 घोषित कर दी है। ऐसे में अधिकारियों के साथ सहयोग करना ही प्रभावित पूर्वोत्तर के राज्यों के हित में है। अगर किसी भी कारण इस समय एनआरसी और एनपीआर की कवायद को रोका गया, तो भविष्य में अवैध प्रवास के मुद्दे का कोई समाधान नहीं होगा।

 -लेखक आईडीएसए में एसोसिएट फेलो हैं।
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