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सामाजिक सुरक्षा के नाम पर : हम किस परिवार में पैदा होते हैं, वह एक लॉटरी के समान है

ritika khedaरीतिका खेड़ा Updated Tue, 23 Jul 2019 05:52 AM IST
मनरेगा
मनरेगा - फोटो : a
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दुनिया भर में सरकारें सामाजिक सुरक्षा के कार्यक्रम चलाती हैं। इसका उद्देश्य है पुनर्वितरण के माध्यम से समाज में असमानताओं को कम करना। इनके पीछे यह सोच है कि समाज में गरीबी ऐसे कारणों से उत्पन्न होती है, जिन पर काफी हद तक व्यक्ति का नियंत्रण नहीं है। हम किस परिवार में पैदा होते हैं, वह एक लॉटरी के समान है। और हमारा जन्म जिंदगी में हमारी नियति तय कर देता है। इसे इस तरह से समझा जा सकता है : जिंदगी की दौड़ में हम सबके लिए स्टार्टिंग लाइन या शुरुआती रेखा एक ही जगह नहीं है।
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कुछ लोग पैदाइश से ही आगे शुरुआत करते हैं; यदि आप ग्रामीण परिवार में पैदा होंगे, तो शहरी लोगों से पिछड़ने की आशंका ज्यादा हो जाएगी। यदि आप लड़की के रूप में पैदा होंगी, तो स्वाभाविक ही लड़कों की तुलना में कम तरक्की कर पाएंगी। क्षेत्र, लिंग, वर्ग, जाति-ये वस्तुतः ऐसे लक्षण हैं, जो हम नहीं चुनते, लेकिन सच्चाई यह है कि इन्हीं से हमारी जिंदगी का सफर काफी हद तक तय हो जाता है। इसका असर हमारे स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार आदि यानी जिंदगी के हर पहलू पर पड़ता है। ऐसी स्थिति में   सरकारों की ओर से सामाजिक सुरक्षा और कल्याणकारी योजनाएं इस उद्देश्य से चलाई जाती हैं कि जन्म से जुड़ी प्रतिकूल परिस्थितियों पर कुछ हद तक विजय पाई जा सके।

अफसोस की बात यह है कि हमारे यहां अभिजात वर्ग के बीच सामाजिक सुरक्षा पर सहमति और समर्थन कमजोर है। हम यह भूल जाते हैं कि खुद की सफलता में सौभाग्य या लॉटरी का उतना ही हाथ है, जितना खुद के जतन या मेहनत का है। इस वजह से बजट में जब भी सामाजिक सुरक्षा के कार्यक्रमों के लिए आवंटन बढ़ाया जाता है, तब मीडिया में काफी लोग इस तरह के खर्च की आलोचना करते हैं, इसे फिजूलखर्ची, गैर जिम्मेदार खर्च या लोकलुभावन कदम करार देते हैं। इस तरह की भी धारणा बन गई है कि (जिसे मीडिया का एक वर्ग तूल देता है) अपने देश में जनहित के कार्यक्रमों पर पैसा पानी की तरह बहाया जा रहा है। ऐसे कार्यक्रमों के बारे में यह भी छवि बन गई है कि इनमें भ्रष्टाचार बहुत होता है।

वास्तविक स्थिति इससे कुछ हटकर है। मौजूदा बजट की ही बात करें, तो सामाजिक सुरक्षा की पांच मुख्य योजनाओं पर सरकार ने जीडीपी का मात्र 0.53 प्रतिशत खर्च करने का वादा किया है। इन पांच योजनाओं में महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा), मध्याह्न भोजन, आंगनवाड़ी, मातृत्व लाभ और सामाजिक सुरक्षा पेंशन शामिल हैं। अगर खाद्य सब्सिडी जोड़ दी जाए, तब भी सामाजिक सुरक्षा पर खर्च जीडीपी का 1.5 प्रतिशत होगा।
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