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दूरसंचार क्षेत्र की बदलती कहानी

Narayan Krishnamurthyनारायण कृष्णमूर्ति Updated Tue, 10 Dec 2019 05:25 AM IST
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मोबाइल - फोटो : a
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लगभग दो दशक से भारतीय दूरसंचार क्षेत्र की कहानी बताते हुए कहा जाता रहा है कि किस तरह सरकार और निजी क्षेत्र ने संचार को किफायती बनाने के लिए पहल की।  रोजगार सृजन के मामले में भी यह क्षेत्र दोगुना हो गया। वर्षों से दुनिया ने भारतीय दूरसंचार की कहानी बहुत करीब से देखी है। कई विदेशी टेलीकॉम कंपनियों ने इसमें हिस्सा लिया। पर इन वर्षों में दूरसंचार क्षेत्र में शीर्ष पर दो-तीन खिलाड़ियों का ही वर्चस्व रहा, अन्य खिलाड़ी धीरे-धीरे इस क्षेत्र से बाहर निकल गए।
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बड़ी कंपनियों द्वारा खरीदे जाने या स्पेक्ट्रम की भारी कीमत के चलते परिदृश्य से बाहर जाने से पहले दूरसंचार क्षेत्र में टाटा, बीपीएल, एस्कोटेल, एस्सार, एयरसेल, मोडीटेल और विभिन्न राज्यों में कई अन्य ऑपरेटर थे। पर हाल के वर्षों में मात्र तीन खिलाड़ियों-एयरटेल, आइडिया-वोडाफोन और रिलायंस जियो का वर्चस्व रह गया। रिलायंस कम्यूनिकेशंस के दिवालिया होने के बाद भी सरकार द्वारा संचालित बीएसएनएल और एमटीएनएल हैं। आज यह क्षेत्र स्पेक्ट्रम के भारी मूल्य निर्धारण के साथ-साथ भारी कर्ज और नीतिगत बदलावों से भी प्रभावित हो रहा है, जिससे राजस्व को नुकसान पहुंचा है। आइडिया-वोडाफोन द्वारा बताए गए नुकसान के बाद किसी को भी हैरानी हो सकती है कि इसके बाद भी ये कंपनियां क्यों टिकी हुई हैं!

दुनिया में सबसे तेजी से बढ़ते मोबाइल नेटवर्क की स्थापना के बाद, जिसे सबसे किफायती भी कहा जाता था, रिलायंस जियो ने हाल ही में शुल्क में वृद्धि का संकेत दिया है। समय-समय पर पोस्ट-पेड कनेक्शन की तुलना में टेलीकॉम ऑपरेटरों ने प्री-पेड प्लान की कीमत बढ़ाई है, पर अब पोस्ट-पेड कनेक्शन की कीमत भी अधिक होने जा रही है। शुल्क युद्ध का सामना कर रहे दूरसंचार क्षेत्र द्वारा पांच वर्षों में यह पहली बढ़ोतरी है। उल्लेखनीय है कि 2016 में वॉयस कॉल लगभग मुफ्त हो गई थी। और प्रति जीबी डाटा की जो कीमत 2014 में 269 रुपये थी, वह अब 95 फीसदी गिरावट के साथ 11.78 रुपये है।

पिछले 25 वर्षों से दूरसंचार क्षेत्र में सरकार की नीति बेहद गड़बड़ रही है। न केवल गलतियां दोहराई गईं, बल्कि दूरसंचार क्षेत्र को नीतिगत बदलाव का सामना करना पड़ा। वर्ष 1999 में सरकार ने नई दूरसंचार नीति के माध्यम से इस क्षेत्र के लिए एक राहत पैकेज की घोषणा की थी। मौजूदा सरकार इसके लिए एक और राहत पैकेज पर विचार कर रही है। इसे एक खुला क्षेत्र बनाने के लिए फिक्स्ड लाइन, मोबाइल और इंटरनेट लाइसेंस मॉडल से अलग हटकर एकीकृत लाइसेंस मॉडल की नीति तैयार की गई।

दूरसंचार कंपनियों के लिए माइग्रेशन पैकेज की पेशकश भी की गई, जिसमें उन्हें 1999 तक के लाइसेंस शुल्क की बकाया राशि चुका देने और लाइसेंस की शेष अवधि के लिए सरकार के साथ राजस्व साझा करने का मॉडल अपनाने की अनुमति दी गई थी। नतीजतन सरकार इस व्यवसाय में एक हितधारक बन गई, जबकि ऑपरेटर एक प्राइवेट कंपनी थी। इस मॉडल ने ऑपरेटरों की मदद की, क्योंकि उन्हें लाभ होने लगा। पर वर्ष 2008 में 2 जी स्पेक्ट्रम की नीलामी के बाद चीजें बदल गईं, जब सात साल पहले के मूल्य पर ऑपरेटरों को 'पहले आओ-पहले पाओ' के आधार पर लाइसेंस दिए गए। इस विवादास्पद नीति परिवर्तन ने रातोंरात दूरसंचार नीति को सीमित से असीमित प्रतिस्पर्धा में बदल दिया। कई अनजाने ऑपरेटर भी मैदान में आ गए। नतीजतन ऐतिहासिक 2 जी स्पेक्ट्रम मामले में यह देखते हुए, कि आवंटन की प्रक्रिया दोषपूर्ण थी, सुप्रीम कोर्ट ने 2012 में 122 टेलीकॉम लाइसेंस और 2008 में आवंटित संबद्ध स्पेक्ट्रम रद्द कर दिए। अदालत ने आगे निर्देश दिया कि स्पेक्ट्रम या किसी भी प्राकृतिक संसाधन को नीलाम किया जाना चाहिए, जिसके परिणामस्वरूप एयरटेल और यहां तक कि आइडिया-वोडाफोन का फिर से उदय हुआ, जिनका तब तक विलय नहीं हुआ था।

नीति बदल जाने के कारण 2012 में सरकार ने स्पेक्ट्रम की कीमतों में दस गुना वृद्धि की सिफारिश की। महंगे स्पेक्ट्रम के लिए बोली लगाने की स्थिति में बहुत कम कंपनियां थी, साथ ही, इस क्षेत्र में छोटी कंपनियों की संख्या भी तेजी से घटी। टाटा टेलीसर्विसेज और रिलायंस कम्युनिकेशंस जैसी कंपनियां छोटी नहीं थीं, पर वे भी उच्च पूंजी निवेश की जरूरतों के दबाव का सामना नहीं कर सकीं। अब हम इस नीति परिवर्तन के दुष्परिणाम का सामना कर रहे हैं, जिसने कंपनियों को अपना व्यवसाय चलाने के लिए भारी कर्ज लेने पर मजबूर किया है।

एक महीने पहले वोडाफोन-आइडिया ने सितंबर तिमाही में 50,921 करोड़ रुपये के कुल  नुकसान की सूचना दी, जो किसी भी भारतीय कॉरपोरेट द्वारा बताए गए नुकसान से ज्यादा है। यह सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद इस कंपनी पर देनदारी के दबाव का नतीजा था। इसने दूरसंचार क्षेत्र की गतिशीलता को बाधित किया, जो अब सरकार से कुछ राहत की अपेक्षा कर रहा है। सरकार का कोई भी कदम एक अस्थायी राहत होगा। सच्चाई यह है कि ग्राहकों को अब फोन कॉल और डाटा के लिए ज्यादा पैसे चुकाने होंगे। भारती एयरटेल और आइडिया-वोडाफोन ने पहले ही 'अनलिमिटेड' उपयोग श्रेणी की प्रीपेड योजनाओं में 15 से 50 प्रतिशत वृद्धि की घोषणा की है। नई योजनाएं तीन दिसंबर से लागू हो गई हैं और इनके ग्राहकों को अपनी मौजूदा योजना के छह महीने पूरे करने के बाद नई दरों का भुगतान करना होगा। हालांकि जियो ने भले कोई घोषणा नहीं की है, पर यह भी शुल्क बढ़ाएगी।

यह उन उपभोक्ताओं के लिए चिंता का विषय है, जो कम मोबाइल बिल का भुगतान करते हैं। वहीं डाटा प्लान खरीदने वालों को कम चिंता होगी, क्योंकि स्मार्ट उपभोक्ता व्हाट्सऐप पर वॉयस कॉल करने के लिए अपने डाटा का उपयोग करते हैं। कई राज्य सरकारें सार्वजनिक जगहों पर मुफ्त वाई-फाई देने पर विचार कर रही हैं, जिसका उपयोग समझदार लोग कॉल करने के लिए कर सकते हैं। हालांकि उद्योग, नियामक और सरकार स्थिति पर काबू पाने के लिए योजनाएं तैयार कर रही हैं, पर फिलहाल स्थिति कठिन है। उपभोक्ताओं के लिए सेवाओं की उच्च कीमत एक वास्तविकता है, जिसे स्थिर होने में कुछ समय लगेगा।
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