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छत्तीसगढ़ का गणित: टैक्सी चालक, चुनाव और नतीजे

विजय विद्रोही Updated Fri, 09 Nov 2018 07:05 PM IST
Raman Singh
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किसी राज्य के विधानसभा चुनाव के नतीजों का क्या एयरपोर्ट के बाहर मिले टैक्सी वाले से कोई संबंध हो सकता है? अप्रैल, 2016 में हुए असम विधानसभा चुनाव की बात है। एयरपोर्ट से बाहर मिली टैक्सी के ड्राइवर का नाम देव बर्मन था। पैंतीस वर्षों से टैक्सी चला रहे देव का कहना था कि मेरी तो जिंदगी जैसे-तैसे गुजर गई, लेकिन बेरोजगार बेटे के भविष्य को लेकर चिंतित हूं। उसका कहना था कि सारी नौकरियों पर बांग्लादेश से आए मुसलमानों का कब्जा होता जा रहा है। कहने लगा कि इस बार कांग्रेस के साथ सिर्फ मुस्लिम जाएगा, बाकी सारे लोग चाहे स्थानीय हों या बिहारी, नेपाली-सब के सब भाजपा के साथ जाएंगे। नतीजे आए, तो देव की बात सही साबित हुई। भाजपा की भारी जीत हुई। बात बिहार में हुए पिछले विधानसभा चुनाव की है, जब लालू और नीतीश कुमार ने मिलकर चुनाव लड़ा था। पटना एयरपोर्ट के बाहर टैक्सी ली। वैसे बहुत साल पहले यहां रिक्शे भी मिल जाते थे। तब एस पी सिंह कहा करते थे कि पटना देश का एकमात्र एयरपोर्ट है, जहां आदमी हवाई जहाज से उतरता है और रिक्शे पर सवार हो जाता है! खैर, यहां मिला टैक्सी चालक रामहित यादव कहने लगा कि इस बार नीतीश-लालू की जोड़ी को कोई तोड़ ही नहीं सकता। अगले दस दिनों तक उसी टैक्सी चालक के साथ विभिन्न इलाकों में घूमते हुए समझ में आ गया था कि इस बार लालू-नीतीश जोड़ी की जीत तय है।
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पिछले साल गुजरात के विधानसभा चुनाव के दौरान मिले टैक्सी चालक का नाम शंकर वाघेला था। कहने लगा कि यों तो इस बार भाजपा को हारना चाहिए, लेकिन मोदी और अमित शाह यहां से जीतने के लिए सब कुछ दांव पर लगा देंगे। साबरमती नदी का घाट पार करते हुए उसका कहना था कि भाजपा नेताओं को बहुत गुरूर हो गया है, लेकिन इस बार वह हारें भले नहीं, बल्कि उनकी चमड़ी जरूर उतार देनी है। इसका मतलब पूछा, तो कहने लगा कि भाजपा की सौ से कम सीटें आएंगी और फिर इनके नेता तमीज से पेश आएंगे!

अभी छत्तीसगढ़ में रायपुर के एयरपोर्ट के बाहर जो टैक्सी ली, वह मोहम्मद नाम के युवक की थी। आठ सालों से टैक्सी चला रहा मोहम्मद मुख्यमंत्री रमन सिंह के विकास के कामों से कमोबेश खुश है। कहने लगा कि शहर में सफाई रहती है, सड़कें भी अच्छी हो गई हैं, बारिश में यहां वहां अब उतना पानी नहीं भरता। लेकिन जैसे ही पूछा गया कि सरकार किसकी बनेगी, तो उसका कहना था, 'सब कुछ ठीक ही है, लेकिन बहुत हो गए 15 साल। अबकी बार बदलाव चाहिए।'

हर हाल में बस्तर पर करना होगा कब्जा

डॉ रमन सिंह के साथ दक्षिण के चार जिलों बस्तर, दंतेवाड़ा, सुकमा और नारायणपुर जाने का मौका मिला। रास्ते में हेलिकॉप्टर में उनसे बात हुई, तो कहने लगे कि बदलाव की बात करने वाले मतदान वाले दिन बदल जाएंगे और विकास कार्यों को याद करके भाजपा के पक्ष में ही वोट करेंगे। दरअसल रमन सिंह को अगर चौथी बार छत्तीसगढ़ जीतना है, तो हर हाल में बस्तर पर कब्जा करना है। पहले दौर की जिन 18 सीटों पर चुनाव हो रहे हैं, उनमें से 12 सीटें अकेले बस्तर से आती हैं। पिछली बार कांग्रेस ने इनमें से आठ और भाजपा ने सिर्फ चार जीती थी। इस बार रमन सिंह पूरा जोर लगा रहे हैं। एक दो जगह अजीत जोगी-मायावती–सीपीआई मोर्चे के गठबंधन पर उन्हें भरोसा है, जो कांग्रेस की एक-दो सीटें हथिया सकता है। इसका लाभ भाजपा को ही मिलना है।

छत्तीसगढ़ में करीब 32 फीसदी आदिवासी आबादी है। छह लाख से ज्यादा लोग तेंदुपत्ता तोड़ने का काम करते हैं। रमन सिंह ने अर्जुन सिंह की अस्सी के दशक की पहल को आगे बढ़ाते हुए तेंदुपत्ता वालों को बोनस देना शुरू किया है। रमन सिंह दावा करते हैं कि कुल मिलाकर छह सौ करोड़ से ज्यादा का बोनस इस तरह आदिवासियों और किसानों को दिया जा रहा है।

पहले दौर में राजनांदगांव में भी चुनाव 

पहले दौर में ही राजनांदगांव में भी चुनाव है, जहां से रमन सिंह खुद भी चुनाव लड़ रहे हैं। पहले दौर की 18 सीटों में से भाजपा को पिछली बार सिर्फ छह मिली थीं। राजनांदगांव में कांग्रेस ने अटल बिहारी वाजपेयी की भतीजी करुणा शुक्ला को उतार कर रमन सिंह की घेरेबंदी की कोशिश की है। रमन सिंह चाहकर भी करुणा शुक्ला के खिलाफ कुछ बोल नहीं पा रहे। वह उन्हें बहन बताते हैं, तो करुणा शुक्ला पूछती हैं कि यह रिश्ता चुनाव के समय ही क्यों याद आ रहा है।

राजनांदगांव हिंदी के विद्रोही कवि गजानन माधव मुक्तिबोध का कर्मक्षेत्र भी रहा है। मुक्तिबोध का तकियाकलाम था, पार्टनर तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है? उनके संग्रहालय परिसर में उनकी मूर्ति के आगे खड़े होकर सोचा कि वह आज की पॉलिटिक्स को देखकर क्या कहते। आज तो पॉलिटिक्स ही पॉलिटिक्स है। राजनांदगांव में रमन सिंह के खिलाफ बोलने वाले विरले ही मिलते हैं, लेकिन उनके मंत्रियों और विधायकों के खिलाफ लोग खुलकर बोलते हैं। उनका कहना है कि पैदल चलने वाले नेता आज इनोवा गाड़ियों में घूमते हैं, जबकि आम जनता सरकारी बस के लिए भी तरस जाती है।
 
85 लाख वोटर लेंगे हिस्सा

छत्तीसगढ़ में इस बार एक करोड़ 85 लाख वोटर हिस्सा लेंगे। इसमें से करीब 24 लाख पहली बार वोट देंगे। ऐसे युवा मतदाताओं ने कांग्रेस का शासन देखा ही नहीं है। कुछ से बात हुई, तो कहने लगे कि एक मौका कांग्रेस को देना बनता है। रमन सरकार ने पचास लाख स्मार्ट फोन बांटे हैं। महिलाओं का कहना है कि स्मार्ट फोन तो ठीक है, पर गैस चूल्हे के 1,100 रुपये देने पड़ रहे हैं, जो उनके बस की बात नहीं। कांग्रेस प्रवक्ता आर पी सिंह आंकड़े दिखाते हैं कि केवल 14 फीसदी लोग ही सिलेंडर की रिफिलिंग करवा रहे हैं, जिन्हें उज्ज्वला योजना के तहत गैस कनेक्शन मिला है। इन सब बयानबाजी के बीच सब कुछ अजीत जोगी पर आकर टिक गया है। पिछले चुनावों में भाजपा को कांग्रेस से 0.72 फीसदी वोट ही ज्यादा मिले थे। इस बार भी भाजपा को उम्मीद है कि जोगी और मायावती कांग्रेस को हरवा देंगे। हालांकि रमन सिंह कहते हैं कि नतीजे ही बताएंगे कि अजीत जोगी किसको नुकसान पहुंचाएंगे।

अंत में क्या गुवाहाटी, पटना और अहमदाबाद के टैक्सी चालकों की तरह रायपुर का टैक्सी चालक भी सही साबित होगा?

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