चीन को चुनौती देता ताइवान

क्रिस हॉर्टन Updated Mon, 07 Jan 2019 07:11 PM IST
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चीन के सामने ताइवान
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शी जिनपिंग की इस चेतावनी के बाद, कि ताइवान का चीन में विलय अपरिहार्य है, ताइवान की राष्ट्रपति जाइ इंग वेन ने ताइवान की वास्तविक आजादी के लिए घरेलू और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सहयोग मांगा है। राजधानी ताइपेई में विदेशी पत्रकारों से बात करते हुए जाइ इंग वेन ने कहा, 'मेरा मानना है कि मैं या कोई दूसरा व्यक्ति जिनपिंग की हालिया टिप्पणी को तभी स्वीकार कर सकता है, जब वह ताइवान की जनता के भरोसे और उसकी इच्छा के साथ धोखाधड़ी करे। मैं उम्मीद करती हूं कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय इस पर ध्यान देगा और एकजुट होकर हमारी तरफ से ये बातें कहेगा।'
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ताइवान पर जिनपिंग के इस पहले भाषण पर जाइ इंग वेन की प्रतिक्रिया ने उन्हें दुनिया भर में इस युवा लोकतंत्र की सच्ची रक्षक तो बना ही दिया है, अगले साल वहां होने वाले चुनाव में भी वेन की यह छवि उनकी जीत सुनिश्चित कर सकती है। उल्लेखनीय है कि विगत नवंबर में हुए स्थानीय चुनाव में वेन की पार्टी को करारा झटका लगा था, लेकिन जिनपिंग के भाषण की प्रतिक्रिया में उभरे वेन के रुख ने सोशल मीडिया में उन्हें बेहद लोकप्रिय तो बना ही दिया है, आश्चर्यजनक रूप से वे पत्र-पत्रिकाएं भी अब उनके पक्ष में हो गई हैं, जो थोड़े दिनों पहले तक उनके खिलाफ थीं।
चीन और ताइवान के बीच पैदा विवाद पर इन दिनों पूरी दुनिया का ध्यान है। इस विवाद की वजह यह है कि चीन ताइवान को अपना हिस्सा मानता है, जबकि ताइवान इसे नहीं स्वीकारता। माओ के बाद सबसे ताकतवर चीनी नेता के तौर पर उभरे जिनपिंग ने अपने भाषण में इस पर जोर दिया है कि अगर जरूरी हुआ, तो ताइवान को आजाद होने से रोकने के लिए बीजिंग ताकत का इस्तेमाल करेगा। दरअसल वेन ने 1992 की उस तथाकथित आम सहमति को, जो कि वास्तव में एक अस्पष्ट दस्तावेज है, स्वीकारने से इनकार कर दिया है, जिसे उनके पूर्ववर्ती ने स्वीकार कर लिया था, और जिसमें ताइवान को चीन का हिस्सा बताया गया था। 
अपने भाषण में जिनपिंग ने ताइवान से अनुरोध किया कि वह इस मामले को बेवजह तूल न दें और 'एक देश दो प्रणाली' की व्यवस्था स्वीकार कर लें। वर्ष 1997 में ब्रिटेन द्वारा ताइवान को चीनी शासन के तहत लौटा देने के बाद से इस द्वीप में इसी तरह से शासन हो रहा है। ऐसे लोगों की संख्या कम नहीं है, जो यह मानते हैं कि ताइवान को आजादी देने का जो वायदा किया गया था, जिनपिंग के दौर में वह वायदा खतरे में है।

वेन ने कहा कि मैं उम्मीद करता हूं कि ताइवान की सभी राजनीतिक पार्टियां साफ शब्दों में यह कहेंगी कि हम एक देश दो प्रणाली को खारिज करते हैं। और 1992 की उस कथित आम सहमति के बारे में भी अब कुछ कहने की जरूरत नहीं है, क्योंकि एक देश दो प्रणाली को बीजिंग ने अपने हित में शुरू किया था। विश्लेषक मान रहे हैं कि वेन ने अपने हाल के भाषणों में चीन के खिलाफ कठोर रुख का परिचय दिया है। यह उनके शुरुआती रुख के विपरीत है, जिसमें वह बीजिंग के बारे में बेहद सावधानी से टिप्पणी करती थीं, ताकि अनावश्यक विवाद पैदा न हो जाए। यूनिवर्सिटी ऑफ नेवाडा, लास वेगास राजनीति विज्ञान के असिस्टेंट प्रोफेसर ऑस्टिन वेंग कहते हैं, 'इसमें कोई संदेह नहीं कि वेन के रुख में व्यापक बदलाव आया है। 1992 की कथित आम सहमति को सीधे-सीधे खारिज करना उनमें आए बड़े परिवर्तन का सूचक है।'

ताइवान की विपक्षी कुआमिन्तंग पार्टी, जिसका पहले चीन में शासन था, 1949 के गृहयुद्ध में माओ के नेतृत्व वाले कम्युनिस्टों से पराजित होने के बाद अपनी सरकार को इस द्वीप में ले आई थी। ताइवान आज भी औपचारिक तौर पर रिपब्लिक ऑफ चाइना के नाम से जाना जाता है-कुआमिन्तंग के दौर में चीन इसी नाम से जाना जाता था। कुआमिन्तंग पार्टी अब तक ताइवान की आजादी का विरोध करती थी। वह वेन की प्रोग्रेसिव डेमोक्रेटिक पार्टी की तुलना में बीजिंग के प्रति ज्यादा नजदीकी रखने की इच्छुक मानी जाती है।

लेकिन जिनपिंग के भाषण के बाद उसने भी कहा कि चीन द्वारा थोपी गई हांगकांग जैसी शासन प्रणाली का ताइवान के बहुसंख्यक लोग समर्थन नहीं करेंगे। पिछले दिनों कुआमिन्तंग पार्टी के समर्थक माने जाने वाले यूनाइटेड डेली न्यूज में ताइवान की मौजदा स्थिति पर एक लेख छपा, जिसमें कहा गया कि बीजिंग के प्रति अपने हालिया रुख के जरिये वेन ने अपने समर्थकों की संख्या में भारी वृद्धि कर ली है। एक लेख में, जो सोशल मीडिया में खूब घूम रहा है, वेन को एक ऐसी मां के रूप में दिखाया गया है, जो अपने बच्चे के हित में एक ताकतवर से टकराने में नहीं हिचकतीं।

वेन की इस ताकतवर छवि पर वाशिंगटन का भी ध्यान जाएगा। गौरतलब है कि बीजिंग से रिश्ता सुधारने के लिए अमेरिका ने 1979 में ताइवान से अपने रिश्ते तोड़ लिए थे। लेकिन तब ताइवान में मार्शल लॉ लागू था, जो दशकों तक रहा। पर 1990 के दशक में लोकतंत्र बनने के बाद वाशिंगटन में बहुत लोग ताइवान के प्रति झुकाव रखने लगे हैं। वे ताइवान को न सिर्फ अपने जैसा मानते हैं, बल्कि चीन पर दबाव बनाने के लिए भी वे ताइवान के नजदीक होना चाहते हैं। ताइवान में लोकतंत्र को बचाने की आवाजें वाशिंगटन में भी पहुंचने लगी हैं।

पिछले महीने छह अमेरिकी सीनेटरों ने , जिनमें तीन डेमोक्रेटिक थे और तीन रिपब्लिकन, विदेश मंत्री माइक पोम्पियो, समेत कई लोगों को, जिनमें नेशनल इंटेलिजेंस और एफबीआई के निदेशक भी थे, चिट्ठी लिखकर यह पता करने की मांग की कि क्या बीजिंग ने विगत नवंबर में ताइवान में हुए चुनाव को प्रभावित करने की कोशिश की, जैसा कि वेन का आरोप है।

विश्लेषक यह आशंका भी जता रहे हैं कि ताइवान में लोकतंत्र को बाधित करने की चीनी कोशिश कहीं और भी दोहराई जा सकती है। ताइपेई में काम कर रहे एक राजनीतिक विश्लेषक रॉस डेरेल कहते हैं कि बीजिंग के खिलाफ वेन के सख्त रुख से अमेरिका जल्दी ही ताइवान का समर्थन करने लगेगा।
©The New York Times 2019    
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