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हमारी शिक्षा में उपेक्षित कहानी

मनीषा सिंह Updated Wed, 13 Feb 2019 07:41 PM IST
मनीषा सिंह
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प्राचीन भारत में शिक्षण की सारी पद्धतियों में कहानी ही शीर्ष पर रही है। कथा की वाचिक परंपरा ही ज्ञान को आगे बढ़ाने का जरिया थी। पर उसी भारत का नया तथ्य यह है कि तीसरी कक्षा में पढ़ने वाले एक चौथाई बच्चे ही सामान्य वाक्यों वाली छोटी कहानी पढ़ या सुनकर समझ पाते हैं। बिल ऐंड मिलिंडा गेट्स फाउंडेशन के मुताबिक, भारत सरकार के एक राष्ट्रीय आकलन में कहा गया है कि बच्चों में कहानी की समझ की बात इस तथ्य से भी रेखांकित होती है कि सामान्य वाक्यों वाली छोटी कहानी को पढ़ने और समझने में मुश्किलों का सामना करने वाले बच्चे एक या दो अंकों के जोड़-घटाव के सवालों में भी उलझ जाते हैं।
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यह आकलन वार्षिक शिक्षा स्थिति रिपोर्ट, 2017 के आंकड़ों के आधार पर किया गया और इसे एक गंभीर समस्या के तौर पर देखा जा रहा है। जाहिर है, यह परेशान करने वाला तथ्य है, क्योंकि कहानियों के जरिये ही शुरुआती शिक्षण का सिलसिला शुरू होता है।

पंचतंत्र की कहानियां, बेताल पच्चीसी आदि हमारे ज्ञानबोध की प्रक्रिया में संभवतः सदियों से शामिल रही हैं। पहले ये श्रवण परंपरा से एक से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचती थीं, बाद में लिखित पाठ्यपुस्तकों के जरिये आगे बढ़ीं। कहानी के इसी महत्व को समझते हुए हर राज्य और उसके विभिन्न हिस्सों में अनेक लोककथाओं और कहानियों का प्रचलन रहा है। साथ ही, उन्हें कहने और सुनाने के कई तरीके भी प्रचलित रहे हैं। जैसे, लोरी, कांवड़ विधा, कठपुतली, पंडवानी और कहानी को लय में गाकर सुनाने वाले तरीके आदि। कथावस्तु, पात्र अथवा चरित्र-चित्रण, कथोपकथन अथवा संवाद, देशकाल अथवा वातावरण, भाषा-शैली तथा उद्देश्य आदि तत्वों के आधार पर कहानी हमें जीवन और उसकी वास्तविकताओं से जोड़ती है।

इन्हीं वजहों से एनसीईआरटी के रीडिंग डेवेलपमेंट सेल ने इस बारे में एक पुस्तक पढ़ना सिखाने की शुरुआत प्रकाशित की है, जिसमें कहानी के महत्व को रेखांकित किया गया है। छोटे बच्चे कहानी के माध्यम से सिर्फ अपना पाठ्यक्रम नहीं, तमाम जीवनोपयोगी बातें सीखते हैं। लेकिन इधर तीसरी कक्षा के बच्चों में कहानी को लेकर समझ का जो संकट पैदा हुआ है, वह गंभीर विमर्श की जरूरत पैदा करता है।

आंकड़े बताते हैं कि बच्चों में कहानी के प्रति दिलचस्पी कम हो गई है। पर क्या इसके लिए बच्चों को सीधे तौर पर कठघरे में खड़ा किया जा सकता है? इसका एक दोष हमारे समाज और शिक्षण व्यवस्था पर भी जाता है। आम तौर पर स्कूलों में शिक्षक अब कहानी सुनाने और पाठ्यक्रम पूरा कराने को दो अलग-अलग मामला मानते हैं। इसके लिए ज्यादा दोष उस शिक्षण व्यवस्था का है, जो पूरी तरह कोर्स और परीक्षा आधारित है। उसमें भी ज्यादा जोर किसी विषय को गहराई व विस्तार से समझने के बजाय सिर्फ परीक्षा पास करने में रहता है। इस तरह कहानी के शैक्षिक महत्व को झुठलाया जा रहा है।
 
एक दोष हमारे कथित आधुनिक होते समाज का भी है, जिसमें अभिभावकों ने बच्चों के हाथों में मोबाइल फोन देकर उनके सामाजिक शिक्षण की परंपरा से हाथ खींच लिया है। ऐसे कम ही अभिभावक होंगे, जो रात में सोने से पहले अपने बच्चों को कहानियां सुनाते हैं। ऐसे में, थोड़ी-बहुत गुंजाइश स्कूली पठन-पाठन के साथ ही कहानियों से बच्चों को जोड़े रखने के रूप में ही बचती है। अगर उसे भी बनाए रखने का जतन नहीं किया गया, तो बच्चों के सर्वांगीण विकास की कल्पना करना बेमानी हो जाएगा। 

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