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फैज को बख्श दें

Hemant Sharmaहेमंत शर्मा Updated Thu, 09 Jan 2020 03:07 AM IST
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फैज अहमद फैज
फैज अहमद फैज - फोटो : a
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फैज अहमद फैज अदब की दुनिया में क्रांति का प्रतीक हैं। फैज की कलम जब भी चली, मजलूमों के लिए चली। गुरबत में रहने वालों के लिए चली। अगर कोई उसका गलत इस्तेमाल कर रहा है, तो यह उसकी गलती है। फैज को बख्श दें। साहित्य, संगीत, अदब को नफरत और वोट की सियासत से बाहर रखा जाना चाहिए।
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सरकारों और व्यवस्था के खिलाफ लिखना कवियों का पुण्य मकसद होता आया है। इसमें नफरत और धर्म नहीं खोजना चाहिए। जो लोग साहित्य के बिंब-प्रतीकों को नहीं समझते, वही इस तरह की कटुता की बात करते हैं। सो झगड़ा अपने वोट बैंक तक ही रखिए, साहित्य को इस दलदल में न घसीटिए तो बेहतर। फैज और उनकी मशहूर नज्म के साथ आज जो हो रहा है, अगर यही सोच  छह सौ साल पहले कबीर के वक्त होती, तो कबीर को भी थाने में बंद कर दिया जाता, क्योंकि वह भी, जो घर फूंके आपना चले हमारे साथ का एलान कर रहे थे।

इस धार्मिक-जातीय उन्माद में तो तुलसीदास भी नहीं बचते। इस हिसाब से उन पर दलित ऐक्ट के तहत मुकदमा चलता। वह जेल में होते। उन पर स्त्रियों के प्रति अभद्र टिप्पणी का भी मुकदमा चलता, क्योंकि रामचरित मानस के सुंदरकांड में उन्होंने ढोल, गंवार, शूद्र, पशु, नारी सकल ताड़ना के अधिकारी लिखा है। दलितों और स्त्रियों के संगठन तुलसीदास को कहीं का न छोड़ते। हालांकि अवधी बोलने-समझने वाले 'ताड़ना' शब्द का असली अर्थ समझते हैं। पर शब्दों की बाजीगरी के जरिये समाज तोड़ने वाला उन्मादी वर्ग अपने फायदे के लिए यहां भी तिल का ताड़ बना देता। हालांकि यह कोशिश कुछ वक्त तक वामपंथी आलोचकों ने की भी थी, पर उस वक्त साहित्य समाज में इतनी संकीर्णता और  कटुता नहीं थी। फैज अहमद फैज की नज्म न तो हिंदू विरोधी है और न इस्लाम विरोधी। वह फासिज्म विरोधी है, और फासिज्म की न कोई जाति होती है, न धर्म। अगर आप फासिज्म के पाले में खड़े होंगे, तो फैज, दुष्यंत, नागार्जुन और दिनकर आप को अंगारे की तरह दिखेंगे। कविता की यही ताकत है।

आईआईटी, कानपुर से फैज की एक नज्म पर उठा विवाद इसलिए भी चिंताजनक है, क्योंकि आईआईटी देश के सबसे उत्कृष्ट शैक्षिक संस्थानों में से एक माना जाता है। अफसोस इस बात का भी है कि फैज की जिस नज्म लाजिम है कि हम भी देखेंगे पर विवाद उठा है, वह किसी एक धर्म के विरुद्ध नहीं लिखी गई थी, उसमें पाकिस्तान के भीतर चल रहे जोर-जुल्म और सैनिक तानाशाही के खिलाफ इंसाफ और क्रांति का शंखनाद था।

यह नज्म फैज अहमद फैज ने 1979 में लिखी थी। इसकी प्रासांगिकता को समझने के लिए दो साल और पीछे लौटना होगा। यह बात 1977 की है। भारत में इमरजेंसी का खात्मा हुआ था। मोरारजी देसाई के नेतृत्व में लोकतंत्र की बहाली हुई थी और पाकिस्तान आर्मी ने लोकतंत्र का गला घोंट फौजी हुकूमत बनवाई थी। सेना प्रमुख जिया उल हक ने पाकिस्तान में प्रधानमंत्री भुट्टो का तख्ता पलट दिया था। जम्हूरियत और इंसानियत के हिमायती फैज अहमद फैज इससे काफी दुखी हुए। विरोध में उन्होंने हम देखेंगे नज्म लिखी, जो जिया उल हक की तानाशाही के खिलाफ विद्रोह और क्रांति का परचम थी।

1984 में फैज नहीं रहे। 1985 में पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल जियाउल हक ने देश में मार्शल लॉ लगा दिया। पाकिस्तान में इस्लामी कानून का पूरी तरह राज हो गया। महिलाओं के साड़ी पहनने पर भी पाबंदी लग गई। ऐसे में फैज की नज्म एक बार फिर से गूंज उठी। लाहौर में पाकिस्तान की मशहूर गजल गायिका इकबाल बानो ने जब एक लाख लोगों की मौजूदगी में साड़ी पहनकर इसे गाया, तो सब झूम उठे। उनकी नज्म फैज की नामौजूदगी में भी पाकिस्तान की हुकूमत की चूलें हिला रही थी। ऐसी नज्म को कुछ लोग अगर किसी धर्म का विरोधी समझ रहे हैं, तो वे करुणा के पात्र हैं।

फैज इस नज्म में लिखते हैं कि जब अर्ज-ए-खुदा के काबे से सब बुत उठवाये जाएंगे, हम अहल-ए-सफा-मरदूद-ए-हरम, मसनद पे बिठाए जाएंगे। इसका अर्थ समझना बेहद जरूरी है। फैज यहां कह रहे हैं कि जब ताकतवर तानाशाह की सत्ता के सब प्रतीक गिरा दिए जाएंगे, उस वक्त वे कमजोर, पीड़ित, प्रताड़ित लोग जो दिल के साफ हैं, पर अधिकारों से वंचित हैं, उन्हें हम सत्ता के मसनद पर बिठाएंगे। फैज आगे लिखते हैं कि सब ताज उछाले जाएंगे, सब तख्त गिराए जाएंगे। इसका अर्थ समझाने की जरूरत ही नहीं है। हम देखेंगे नज्म में आखिरी हिस्से में वह लिखते हैं, बस नाम रहेगा अल्लाह का। यही विवाद की जड़ है। उठेगा अन-अल-हक का नारा इसी पर नासमझी भरा एतराज उठाया गया। अनलहक का मतलब है मैं खुदा हूं। यानी हमारी परंपरा में यही तो अहं ब्रह्मास्मि है। यही आचार्य शंकर का अद्वैत है। ईरान के मंसूर अल हल्लाज 900 ई. के मशहूर सूफी थे, जिन्होंने अनल-हक का नारा दिया था।

फैज को समझने के लिए उनके जीवन के बारे में भी जानना बेहद जरूरी है। पंजाब के नरोवल में जन्मे फैज अहमद फैज पत्रकार भी रहे, शायर भी थे और उन्होंने ब्रिटिश आर्मी में बतौर फौजी सेवाएं भी दीं। उन्होंने जब शायरी लिखना शुरू किया, तो उनकी कोशिश दबे-कुचलों की आवाज को उठाना ही था। यही कारण रहा कि उनकी लेखनी में बगावती सुर की भरमार दिखी। आजादी मिलने के वक्त उन्होंने बंटवारे का जो दर्द देखा, उस पर सुबह-ए-आजादी नाम की अपनी नज्म में लिखा- ये दाग दाग-उजाला, ये शब-गजीदा सहर/वो इंतजार था जिसका, ये वो सहर तो नहीं...।

यानी उनकी आजादी के सपने में बंटवारा नहीं था। उनकी यह नज्म सच्ची आजादी का अधूरा दस्तावेज बन गई है। फैज के प्रशंसकों में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी भी थे। 1977-78 में वह विदेश मंत्री थे। उस दौरान वह पाकिस्तान के आधिकारिक दौरे पर गए थे और प्रोटोकॉल तोड़कर फैज से मिलने उनके घर गए। अटल जी ने वहां फैज की रचनाएं सुनीं। उन्हें भारत आने का न्योता दिया। फैज भारत आए भी और दिल्ली, इलाहाबाद, सहित कई शहरों में गए।

उनकी नज्म पर सवाल उठाने वाले लोगों के लिए फैज का ही एक शेर बड़ा मौजूं है-

वो बात सारे फसाने में जिसका जिक्र ही न था, वो बात उनको बहुत नागवार गुजरी है।
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