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दक्षिण के नतीजे होंगे निर्णायक, गठबंधन को स्पष्ट बहुमत न मिलने पर केंद्र की सत्ता पर होगा फैसला

नारायण कृष्णमूर्ति Updated Wed, 24 Apr 2019 08:21 AM IST
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voting - फोटो : PTI
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बड़े राजनीतिक कटआउट, रंगीन मालाएं, पार्टी कार्यकर्ताओं की मजबूत फौज और नेताओं व उम्मीदवारों के चुनावी भाषणों का उन्माद हमेशा से दक्षिण भारत की सियासत में हावी रहा है। हालांकि इस बार अतीत के कुछ अवसरों की तरह पांच राज्यों और तीन केंद्र शासित प्रदेश की 132 लोकसभा सीटों का नतीजा यह तय करेगा कि 23 मई को कौन-सी पार्टी सत्ता में आएगी। इस क्षेत्र में किसी एक भाषा का प्रतिनिधित्व नहीं है और कई वर्षों से यह क्षेत्र क्षेत्रीय पार्टियों के किसी राष्ट्रीय पार्टी के गठजोड़ के माध्यम से केंद्र में अपने प्रतिनिधि भेजता रहा है या अपने हितों के लिए चुनाव बाद गठबंधन में यहां की क्षेत्रीय पार्टियां शामिल होती रही हैं।
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इन 132 सीटों की भूमिका तब महत्वपूर्ण हो जाएगी, जब किसी पार्टी या गठबंधन को स्पष्ट बहुमत न मिलने पर यह फैसला करने का अवसर आएगा कि कौन-सी पार्टी केंद्र में शासन करेगी। वर्ष 2004 और 2009 के चुनावों के बाद जब यूपीए सत्ता में आई थी, तब दक्षिण भारत ने ही उनकी मदद की थी। यहां तक कि जब अटल बिहारी वाजपेयी ने 1999 में पूर्ण कालिक शासन के लिए राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए)  बनाया, तो सहयोगी चंद्रबाबू नायडू की तेलुगू देशम पार्टी ने 29 सीटें और उस समय एनडीए में शामिल द्रमुक ने 26 सीटें जीती थी।

लेकिन इस बार इन पांच राज्यों में काफी कुछ बदल गया है। राज्य विभाजन के बाद तेलंगाना और आंध्र प्रदेश ने क्षेत्रीय दलों की गतिशीलता को बदल दिया है। तमिलनाडु में दशकों बाद पहली बार अन्नाद्रमुक और द्रमुक अपने पूर्ववर्ती शीर्ष नेताओं-जे. जयललिता और एम. करुणानिधि के बगैर चुनाव में उतरी है। तमिलनाडु में भाजपा अन्नाद्रमुक के नेतृत्व में हुए आठ दलों के गठबंधन में शामिल है। जमीनी स्तर पर इस गठबंधन के लिए बहुत कम आकर्षण है।

सत्ता में होने के बावजूद अन्नाद्रमुक राज्य में पहचान के संकट से गुजर रही है, क्योंकि पार्टी में बिखराव और कई सदस्यों के पार्टी लाइन से अलग चलने के कारण उसके पास कमजोर बहुमत है। राज्य में उसकी सरकार इसलिए बची हुई है, क्योंकि उसने केंद्र में सत्तारूढ़ भाजपा के साथ गठजोड़ किया हुआ है, वर्ना राज्य में विधानसभा भंग होने या राष्ट्रपति शासन लगने की आशंका ज्यादा है। दो बड़े फिल्म अभिनेताओं के राजनीति में प्रवेश ने भी राज्य की प्रमुख पार्टियों के लिए राह उतनी आसान नहीं रहने दी है।

आंध्र प्रदेश में चंद्रबाबू नायडू की तेदेपा, जगन मोहन रेड्डी की वाईआरएस कांग्रेस, टीआरएस और भाजपा के अलावा कुछ अन्य क्षेत्रीय दल चुनावी मैदान में हैं। वास्तव में एनडीए की पूर्व सहयोगी तेदेपा को एक से अधिक पार्टियों से प्रतिस्पर्धा के कारण चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। तथ्य यह है कि नायडू उन लोगों में शामिल हैं, जिन्होंने मोदी विरोधी विचार पैदा किया, जो चुनाव के बाद की स्थितियों में उनके लिए फायदेमंद होगा, अगर वह विजेता बनकर उभरे, अन्यथा यह उनके राजनीतिक वर्चस्व का अंत साबित हो सकता है, क्योंकि विभाजन के बाद राज्य की सीटों में कमी आई है।

इन राज्यों में से तेलंगाना में स्पष्ट नतीजा आ सकता है, जहां विधानसभा चुनाव में जीत के बाद टीआरएस के के. चंद्रशेखर राव सत्ता में हैं। यही नहीं, वह अन्य पार्टियों के लिए भी अकेली चुनौती बनकर उभरे हैं। वह केंद्र में गैर-कांग्रेस, गैर-भाजपा सरकार के लिए भी मुखर रहे हैं और उन्होंने ममता बनर्जी से भी इस संबंध में बात की थी। वाईएसआर कांग्रेस, तेदेपा और कांग्रेस द्वारा कड़ी टक्कर देने के बावजूद राज्य विधानसभा चुनाव में केसीआर ने अपनी पकड़ बनाए रखी।

वायनाड में राहुल गांधी द्वारा नामांकन भरने से केरल के प्रति राष्ट्रीय दिलचस्पी बढ़ गई है। केरल इस क्षेत्र में सबसे छोटा राज्य है, पर राजनीतिक रूप से यह विविधतापूर्ण है। इसे समझने के लिए आपको यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (यूडीएफ) और लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (एलडीएफ) में शामिल पार्टियों की संख्या देखने की जरूरत है। जहां यूडीएफ छह पार्टियों का गठबंधन है, वहीं एलडीएफ 14 पार्टियों का गठबंधन है। हालांकि दोनों गठबंधनों के बीच ज्यादातर सीटों पर आमने-सामने का मुकाबला है।

कर्नाटक दक्षिण भारत का अकेला राज्य है, जहां भाजपा का महत्वपूर्ण दखल है। राज्य की 28 लोकसभा सीटों में से भाजपा को 2014 में 17 सीटें मिली थीं। कॉस्मोपोलिटन प्रकृति के बावजूद कर्नाटक वास्तव में लिंगायत और वोक्कालिगा की जातिगत पहचान पर निर्भर है। लिंगायत का प्रतिनिधित्व भाजपा के वरिष्ठ नेता बीएस येदियुरप्पा करते रहे हैं, जबकि वोक्कालिगा का गौड़ा।

कुरुबाओं, पिछड़ी जातियों और मुसलमानों के कारण समीकरण काफी बदल जाते हैं। फिर भी यह अकेला दक्षिणी राज्य है, जहां भाजपा का कुछ दखल है और वह सरकार चलाने में भी कामयाब रही है। हालांकि हाल ही में दिवंगत हुए अनंत कुमार की अनुपस्थिति में राज्य में भाजपा की उतनी पकड़ नहीं है, जितनी वह चाहती है। अगर राज्य के हालिया चुनावों को देखें, तो भाजपा बढ़त में नहीं है। प्रताप सिम्हा और तेजस्वी सूर्या जैसे युवा नेताओं को शामिल करने से भाजपा को बड़ी सफलता मिलने की संभावना नहीं है।

अगर अंडमान, लक्षद्वीप और पुड्डुचेरी की एक-एक सीटों को भी जोड़ लें, तो कोई भी सहयोगी दल शासन करने या विपक्ष में रहने के लिए नहीं है। दक्षिण के राज्यों में से प्रत्येक में एक राज्य विशेष की पार्टी मैदान में है। उनमें से कुछ गठबंधन में शामिल हैं और कुछ नतीजों के बाद सरकार गठन में अपनी भूमिका निभाएंगे।

भाजपा को 2014 में उत्तर प्रदेश में मिली भारी सफलता के कारण सबकी नजर वहां की 80 सीटों पर रहेगी, पर दक्षिणी राज्यों पर भी उसी तरह नजर रहेगी, जिन्होंने दिखाया है कि राष्ट्रीय राजनीति में क्षेत्रीय दलों का मजबूत दखल होता है, खासकर तब, जब ये नीतियों से अपनी अर्थव्यवस्था को प्रभावित करते हैं। तमिलनाडु औद्योगिक उत्पादन केंद्र, कर्नाटक आईटी केंद्र और अविभाजित आंध्र प्रदेश विनिर्माण और आईटी के केंद्र के रूप में उभरा, जो उसके पिछले प्रदर्शन का सुबूत है। हिंदी और हिंदुत्व के प्रति भाजपा का जुनून सांस्कृतिक एवं राजनीतिक रूप से विविधतापूर्ण दक्षिण में बहुत कारगर नहीं हो सकता है।

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