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संपूर्ण परिवार का नारा

क्षमा शर्मा Updated Wed, 12 Sep 2018 07:33 PM IST
क्षमा शर्मा
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हाल ही में अभिनेता शाहिद कपूर एक बेटे के पिता बने हैं। उनकी दो साल की एक बेटी मीशा पहले से है। शाहिद के बच्चे के जन्म पर उनकी मां नीलिमा अजीम ने, जो खुद एक अभिनेत्री और कुशल नर्तकी हैं, कहा कि शाहिद की फैमिली संपूर्ण हो गई। शाहिद के पिता पंकज कपूर ने भी यही कहा। यानी पहले से एक बच्ची थी ही, अब बेटा भी हो गया। तो क्या अगर शाहिद की दूसरी बेटी होती, तो परिवार पूर्ण न होकर अधूरा रह जाता!
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कंप्लीट फैमिली का यह नारा दरअसल हमारे देश में वर्षों पहले परिवार नियोजन को लोकप्रिय बनाने और परिवार को दो बच्चों तक समेटने के रूप में दिया गया था। अब परिवार नियोजन तो क्या लोकप्रिय होता, देश की आबादी कम होने के मुकाबले तेज गति से बढ़ती गई और एक अरब तीस करोड़ के पार जा पहुंची। फिर एक बेटी और एक बेटे के होने से यदि परिवार को पूरा होना माना जाता है, तो क्या जिनके दो बेटियां हैं या जिनके दो बेटे हैं, उनका परिवार संपूर्ण नहीं है? जिनके दो बेटे होते हैं, वे तो आज भी समाज में दो बेटियों के पिता के मुकाबले खुद को श्रेष्ठ समझते हैं।
 
इसके अलावा जिस परिवार में पहली बेटी होती है, वह अक्सर दूसरे बच्चे के रूप में बेटा ही चाहते हैं। नीलिमा अजीम या पंकज कपूर का कथन भी इस बात की पुष्टि करता है। इसीलिए एक बेटी के बाद जब दूसरे बच्चे की बारी आती है, तो अक्सर लोग यह पता करने की कोशिश करते हैं कि गर्भ में पल रहा शिशु लड़का है या लड़की। लड़कियों को मारने वाले लिंग परीक्षण आज भी अपने देश में खत्म नहीं हुए हैं, बेशक इसके खिलाफ कानून हो, क्लीनिक के आगे ये बोर्ड लगे हों कि यहां जन्म पूर्व लिंग जांच नहीं की जाती, यह कानूनी अपराध है और कभी-कभार लोग पकड़े भी जाते हों। इसलिए परिवार वालों को अगर यह पता चल जाए कि दूसरी बार भी बेटी होने वाली है, तो अक्सर उससे निजात पाने की कोशिशें की जाती हैं। भ्रूण हत्या का एक बड़ा कारण पहली संतान का लड़की होना भी है। जिनका पहला बेटा होता है, उन परिवारों में महिलाएं यह कहती पाई जाती हैं कि अब तो जान छूट गई। दूसरा बच्चा लड़की हो या लड़का कोई फर्क नहीं पड़ता।

कंप्लीट फैमिली का नारा देने वालों ने तो इसे यह सोचकर प्रचारित-प्रसारित किया था कि इससे समाज में लड़के-लड़की की बराबरी होगी। लड़कियों को भी परिवार का जरूरी हिस्सा माना जाने लगेगा। मगर हुआ उल्टा ही है। पहली लड़की होने पर एक तो परिवारों में खुशी कम ही मनाई जाती है, उस पर से अगर दूसरी भी लड़की हो गई, तो समझो मां की खैर नहीं। पुराने जमाने की तरह आज भी लड़के की चाहत में कई-कई लड़कियां हो जाने पर माता-पिता बिसूरते रहते हैं।

पर अब तो भ्रूण हत्या करके लड़की से छुटकारा पाने का आसान रास्ता उपलब्ध है, तो क्यों न इसका लाभ उठाया जाए? कई बार इस लेखिका से कहा भी गया कि दूसरी लड़की अगर हो गई, तो उसके दान-दहेज का इंतजाम कौन करेगा? बाहर वाले तो सिर्फ आदर्श पढ़ाकर चले जाएंगे।

सामान्य लोगों से जब ये बातें सुनाई देती हैं और समाज के साधन संपन्न लोग भी नीलिमा अजीम की तरह कंप्लीट फैमिली का नारा देते दिखते हैं, तो यही लगता है कि कब ऐसा होगा कि लड़के-लड़कियों को सिर्फ लिंग के आधार पर भेदभाव से मुक्ति मिलेगी?
 
कंप्लीट फैमिली का अर्थ यह नहीं है कि किसकी कितनी लड़कियां हैं और कितने लड़के। दो लड़कियों और दो लड़कों से भी परिवार पूरा हो ही सकता है।

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