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आरक्षणः अपवाद या अधिकार

विराग गुप्ता Updated Sun, 16 Feb 2020 05:40 PM IST
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सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट - फोटो : a
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दिल्ली के बाद अब बिहार और पश्चिम बंगाल में होने वाले चुनावों के लिए सियासी दांव-पेच शुरू हो गए हैं। भारत में वोट हासिल करने के लिए धर्म और जाति के आधार पर ध्रुवीकरण नेताओं का सबसे प्रिय शगल रहा है। इसलिए नागरिकता संशोधन कानून और राम मंदिर के जवाब में अब आरक्षण और जातिगत मुद्दों पर लामबंदी शुरू हो गई। उत्तराखंड की एक नौकरी में प्रमोशन में आरक्षण नहीं मिलने पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर हो-हल्ला मचा है, जबकि इससे आरक्षण की नीति में कोई बदलाव नहीं हुआ। व्हाट्सएप और सोशल मीडिया से झूठे प्रचार के दौर में तथ्यों को कानूनी नजरिये से समझा जाए, तो अधिकांश विवाद बेमानी साबित होंगे।
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विधानसभा और लोकसभा में वंचित वर्ग को आरक्षण देने के लिए संविधान में अल्पकालिक प्रावधान किए गए थे। लेकिन सरकारी नौकरियों में आरक्षण और प्रमोशन के लिए सांविधानिक व्यवस्था के बजाय सिर्फ अपवाद स्वरूप प्रावधान किए गए, जिसके अनुसार नौकरियों में आरक्षण की व्यवस्था की जा सकती है। अनुसूचित जाति यानी एससी वर्ग के लिए 15 फीसदी और अनुसूचित जनजाति यानी एसटी वर्ग के लिए 7.5 फीसदी आरक्षण का प्रावधान किया गया। राम मंदिर के कमंडल आंदोलन के जवाब में वीपी सिंह ने मंडल का दांव खेलकर अन्य पिछड़े वर्ग यानी ओबीसी के लिए 27 फीसदी आरक्षण की व्यवस्था कर दी। इन सबके अलावा महिला, दिव्यांग, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और आर्थिक तौर पर पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण से, यह मुद्दा, वोट बैंक की राजनीति का सबसे निर्णायक दांव बन गया है।

आरक्षण के लाभ को वंचित वर्ग तक पहुंचाने के लिए सुप्रीम कोर्ट के अनेक फैसलों से कई नियम बने हैं। जैसे, आरक्षण का लाभ जिन्हें मिल गया या आर्थिक तौर पर सशक्त लोगों को क्रीमी लेयर मानते हुए उन्हें आरक्षण की परिधि से बाहर रखना। आरक्षण के लाभ के मूल्यांकन के लिए सामाजिक-आर्थिक जनगणना और अध्ययन करना। आरक्षण से प्रशासनिक कार्य-कुशलता प्रभावित नहीं हो, इसे सुनिश्चित करना। इन तीन नियमों का सही तरीके से पालन नहीं होने से 21वीं सदी के युवाओं में खासा आक्रोश है।

सुप्रीम कोर्ट की बड़ी बेंच ने इंदिरा साहनी मामले में तीन दशक पहले आरक्षण की सीमा को 50 फीसदी तक निर्धारित करने की व्यवस्था दी थी। नौकरियों में भर्ती के साथ प्रमोशन में भी आरक्षण के लिए अनेक राज्यों ने कानून बनाए हैं। लेकिन तमिलनाडु समेत अनेक राज्यों ने मनमाने तरीके से 50 फीसदी से ज्यादा आरक्षण लागू कर दिया है। आंध्र प्रदेश में जनजातीय इलाकों में शिक्षकों की भर्ती में तो 100 फीसदी आरक्षण के नियम से पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट के जज भी दंग रह गए। सुप्रीम कोर्ट के 13 जजों की सबसे बड़ी बेंच ने केशवानंद भारती मामले में मौलिक अधिकारों को संविधान के मूल ढांचे का हिस्सा माना था। आरक्षण को यदि मूल अधिकार मान लिया गया, तो यह सांविधानिक व्यवस्था कभी खत्म ही नहीं होगी और आरक्षण वंचित वर्गों को सशक्त बनाने के बजाय उनकी बैशाखी वन जाएगा।

कॉलेजियम की दोषपूर्ण और अपारदर्शी प्रणाली से जजों की भर्ती के चलते हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में कुछ कुलीन परिवारों का ही वर्चस्व है। सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों ने कॉलेजियम की व्यवस्था को सुधारने के लिए वर्ष 2015 में पेरेस्त्रोइका और ग्लास्नोस्त जैसे क्रांतिकारी कदम उठाने की बात कही थी। पिछले पांच वर्षों से सैकड़ों जजों की भर्ती दोषपूर्ण व्यवस्था से होने के बावजूद सरकार, विपक्ष और सुप्रीम कोर्ट में सिस्टम को सुधारने के लिए कोई सुगबुगाहट नहीं है। जजों की भर्ती में पारदर्शिता और सभी वर्गों के प्रतिनिधित्व को ठीक करने के लिए तर्कसंगत व्यवस्था बनाने के बजाय, वहां भी आरक्षण की मांग बेतुकी है।

आरक्षण के साथ वंचित वर्ग को कानूनी संरक्षण देने के लिए वर्ष 1989 में एक विशेष कानून बनाया गया। इसके अनुसार एससी-एसटी वर्ग के खिलाफ हुए अपराधों के मामले में पुलिस द्वारा एफआईआर दर्ज करना जरूरी बन गया। दहेज और महिला सुरक्षा कानून की तर्ज पर एससी-एसटी कानून भी ब्लैकमेलिंग का बड़ा माध्यम बन गया। अग्रिम जमानत न मिलने के नियम से यह कानून संविधान में दिए गए जीवन और स्वतंत्रता के अधिकार के खिलाफ है। मध्य प्रदेश, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और बिहार जैसे राज्यों में इस कानून के दुरुपयोग से बड़े पैमाने पर सामाजिक असंतोष उभरने लगा। सुप्रीम कोर्ट ने दो साल पहले इस कानून के दुरुपयोग को रोकने के लिए नए नियम बनाए। इसके अनुसार, ऐसे मामलों में जांच के बाद ही गिरफ्तारी होने और अग्रिम जमानत के लिए भी व्यवस्था बनी।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ दलों के नेताओं ने लामबंदी करके, संसद से कानून बनाकर, सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलटते हुए, पुरानी व्यवस्था को फिर से बहाल कर दिया। संसद के नए कानून से लादी गई नई व्यवस्था को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई। वोट बैंक के नाम पर एकजुट नेताओं के सामने सुप्रीम कोर्ट ने हाथ खड़े करते हुए, विभेदकारी और दमनपूर्ण व्यवस्था पर अपने नए फैसले से मुहर लगा दी है। एससी-एसटी कानून के बहाने यदि गिरफ्तारी और पुलिस व्यवस्था में सुधार पर सार्थक बहस हो, तो समाज के वंचित वर्ग को ज्यादा फायदा होगा। पुराने नियमों को लागू करने से पुलिस और न्यायिक व्यवस्था की सड़ांध के साथ जातिगत दुराग्रह की खाई और भी बढ़ेगी।

नौकरी बढ़ाने में विफल सरकारें, आरक्षण के झुनझुने से जब तक वोट हासिल करती रहेंगी, तब तक विकास की राजनीति कैसे सफल और सार्थक होगी? जाति व्यवस्था पहले खत्म हो या फिर आरक्षण। यह बहस मुर्गी पहले आई या फिर अंडा की तर्ज पर दिलचस्प और अंतहीन है। जाति के आधार पर समाज को विभाजित करने की राजनीति वोटों के लिहाज से भले ही फायदेमंद हो। लेकिन यह समानता, भाईचारा और कानून के शासन की सांविधानिक व्यवस्था पर कुठाराघात है।
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