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दर्द भरा यथार्थ

तवलीन सिंह Updated Sun, 23 Jun 2019 06:34 PM IST
तवलीन सिंह
तवलीन सिंह - फोटो : a
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बीता सप्ताह अजीब-सा रहा। एक तरफ राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद का संसद में भाषण था, जिसमें नए भारत का सुनहरा चित्र उन्होंने अपने शब्दों से खींचा। समृद्ध, सुरक्षित, स्वच्छ, सुंदर और शक्तिशाली नया भारत,  सितारों से आगे जाकर अंतरिक्ष में कदम रखने वाला नया भारत। दूसरी तरफ वर्तमान भारत का दर्द भरा यथार्थ देखने को मिला। मैं उस यथार्थ की बात कर रही हूं,  जो हमें बिहार के एक सरकारी अस्पताल में देखने को मिला। छोटे बच्चों का तड़प-तड़प कर मर जाने वाला यथार्थ। मुजफ्फरपुर के उस बेहाल अस्पताल श्री कृष्णा मेडिकल कॉलेज ऐंड हॉस्पिटल का यथार्थ। इतना बेहाल था वह सरकारी अस्पताल कि पीने का पानी तक उपलब्ध नहीं था। न पर्याप्त बिस्तर थे, न डॉक्टर, न बीमार बच्चों के लिए आईसीयू की सुविधाएं। बुनियादी सुविधाओं का इतना अभाव अगर न होता, तो शायद इतने बच्चे न मरते।
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केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जब उस अस्पताल में अपनी संवेदना दिखाने पहुंचे, तो मृत बच्चों के मां-बाप ने उन पर अपना रोष निकाला। क्यों न निकालते? जब चार साल पहले उसी अस्पताल में इसी मंत्री ने जाकर आधुनिकीकरण के बड़े-बड़े वादे किए थे? उसके बाद न केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री ने कभी वापस लौटकर देखने का प्रयास किया कि उनके वादे पूरे हुए हैं या नहीं और न ही बिहार के मुख्यमंत्री ने, जिन्हें न जाने क्यों, सुशासन बाबू होने का खिताब दिया गया है।

मुजफ्फरपुर की उस दुखद घटना के कारण सिर्फ बिहार के मुख्यमंत्री बदनाम नहीं हुए हैं, बदनाम नरेंद्र मोदी भी हुए हैं, बदनाम भारत भी हुआ है। इस तरह की घटनाएं हमेशा विदेशी अखबारों की सुर्खियों में रहती हैं। इसलिए रहती हैं, क्योंकि विकसित देशों में अगर किसी बीमारी में इतनी बड़ी संख्या में बच्चे मरते, जो लाइलाज नहीं है, तो सरकारें गिर जाती हैं। हमारे देश में ऐसा नहीं होता, क्योंकि अभी तक गरीबों के बच्चे ही मरते आए हैं। लेकिन अब गरीब माता-पिता भी जान गए हैं कि पिछले करीब सत्तर साल से  उनके साथ अन्याय होता आया है। अब इस अन्याय को वे बर्दाश्त करने को तैयार नहीं हैं।

प्रधानमंत्री नए भारत के सपने को साकार करना चाहते हैं, तो स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार उनकी प्राथमिकताओं की सूची में होना चाहिए। कई किस्म के सुधार जरूरी हैं। पहला सुधार यही होना चाहिए कि सरकारी अधिकारियों और राजनेताओं के लिए सरकारी अस्पतालों में इलाज अनिवार्य कर दिया जाए। जिस दिन राजनेताओं और आला अधिकारियों के बच्चों का इलाज सरकारी अस्पतालों में होने लगेगा, उस दिन से सुधार अपने आप होने लग जाएगा। उस दिन से इन अस्पतालों में डॉक्टर भी पूरी संख्या में दिखने लगेंगे, उस दिन से स्वच्छता भी दिखने लगेगी और इसका लाभ उन गरीबों को मिलेगा, जिनके पास निजी अस्पतालों में इलाज करवाने की क्षमता नहीं है।

विशेषज्ञ बताते हैं कि भारत में अपने या किसी रिश्तेदार के इलाज के खर्च के कारण हर वर्ष छह करोड़ लोग गरीबी रेखा के नीचे धकेल दिए जाते हैं। सरकारी अस्पताल इतने बेकार हैं कि लगभग 80 प्रतिशत भारतीय निजी अस्पतालों में इलाज करवाने के लिए मजबूर हैं। नरेंद्र मोदी ने अपने पहले कार्यकाल में अगर स्वास्थ्य सेवाओं पर भी उतना ही ध्यान दिया होता, जितना उन्होंने स्वच्छ भारत आंदोलन पर दिया, तो अभी तक कम से कम भाजपा शासित राज्यों में अस्पतालों और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में सुधार दिखने लग गया होता। नए भारत का निर्माण कभी नहीं होगा, जब तक उसमें पुराने भारत की आम सेवाएं कायम रहेंगी।

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