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आर्थिक संकट में आलू उत्पादक

चौधरी पुष्पेन्द्र सिंह Updated Tue, 09 Jan 2018 07:16 PM IST
चौधरी पुष्पेन्द्र सिंह
चौधरी पुष्पेन्द्र सिंह
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बीते शुक्रवार की रात आलू उत्पादक किसानों ने सरकार को अपनी दुर्दशा से अवगत कराने के लिए गुपचुप तरीके से उत्तर प्रदेश विधानसभा के सामने अपने आलू फेंक दिए। इसकी किसी को कानोंकान खबर नहीं हुई, लेकिन अगली सुबह सड़क पर कुचले हुए आलू किसानों की बदहाली जरूर बयां कर रहे थे।
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आलू उत्पादक किसानों की समस्या समझने और उनकी आवाज उठाने के लिए मैं नोटबंदी के बाद से दक्षिण-पश्चिम उत्तर प्रदेश के आलू उत्पादक क्षेत्र-अलीगढ़, हाथरस, मथुरा, आगरा, फिरोजाबाद, एटा, इटावा, मैनपुरी, कन्नौज, फर्रुखाबाद का दौरा करता रहा हूं। यहां देश के आलू उत्पादन का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा पैदा किया जाता है। इन जिलों में लगभग 80 प्रतिशत किसानों की मुख्य फसल आलू ही है। यों तो आलू किसानों की हालत पहले से अच्छी नहीं थी, लेकिन आलू उत्पादक किसानों के मुताबिक, आलू की इतनी बुरी हालत कभी नहीं हुई, जितनी नोटबंदी के बाद हुई है। नोटबंदी से ठीक पहले तक जो आलू आठ से दस रुपये प्रति किलो बिक रहा था, वह नोटबंदी के बाद पांच से छह रुपये प्रति किलो की दर पर आ गया। फरवरी 2017 में जब नई फसल आई, तो दाम और गिरकर तीन से चार रुपये प्रति किलो ही रह गया। किसान इस बार लगभग 30 फीसदी फसल को कोल्ड स्टोरों से उठाने ही नहीं गए, क्योंकि उसकी कीमत कोल्ड स्टोर के किराये से भी कम है। नवंबर, 2017 में सबसे बढ़िया किस्म के आलू का 50 किलोग्राम का कट्टा 100 रुपये में बिका, जबकि कोल्ड स्टोर का किराया ही लगभग 120 रुपये प्रति कट्टा है।

सिर्फ उत्तर प्रदेश ही नहीं, पूरे देश भर में नोटबंदी के कारण आलू उत्पादक किसानों की कमर टूट गई है। आलू के उत्पादन में ही लगभग पांच रुपये प्रति किलो का खर्चा आता है। खुदाई, पैकिंग और कोल्ड स्टोर तक ले जाने में लगभग दो रुपये प्रति किलो का खर्चा और लग जाता है। कोल्ड स्टोर में रखने का खर्चा भी लगभग दो रुपये प्रति किलो आता है। फरवरी 2017 में खोदी गई सारी फसल केवल कोल्ड स्टोर के भाड़े में ही चली गई, किसान 10 रुपये की लागत में से दो रुपये ही बड़ी मुश्किल से निकाल पाए यानी किसानों को लगभग आठ रुपये प्रति किलो का नुकसान झेलना पड़ा। योगी सरकार ने आलू किसानों को राहत देने के लिए 487 रुपये प्रति क्विंटल आलू खरीदने का वायदा किया था, परंतु यह वायदा कागजों में ही दम तोड़ गया और आलू की कोई सरकारी खरीद नहीं हुई।

कोल्ड स्टोर के मालिकों का कहना है कि यहां से देश के बड़े शहरों में आलू की सप्लाई की जाती है, लेकिन नोटबंदी, जीएसटी, पिछले वर्षों में हुए घाटे और नकदी पर लगे प्रतिबंधों के चलते व्यापारियों ने इस बार अपने हाथ खींच लिए। नतीजतन बाहर के व्यापारियों के बहुत कम आर्डर आ रहे हैं। आलू की पिछली दोनों फसलों के भाव न मिलने के कारण किसान भारी आर्थिक संकट और कर्ज  में फंस गए हैं। इस बार जैसे-तैसे और कर्ज  लेकर किसानों ने फिर से आलू की खेती की। खेतों में फसल लहलहा रही है, लेकिन कर्ज  में फंसे किसानों को डर है कि इस बार अगर फिर आलू की अच्छी कीमत नहीं मिली, तो खेत बेचने या अतिवादी कदम उठाने के अलावा उनके पास कोई अन्य विकल्प नहीं होगा। अब आलू किसानों की मांग है कि सरकार लागत का डेढ़ गुना न्यूनतम समर्थन मूल्य देने के अपने वायदे को पूरा करते हुए इस बार आलू की फसल का दाम कम से कम 1,500 रुपये प्रति क्विंटल घोषित कर उसकी खरीद सुनिश्चित करे।

-लेखक किसान शक्ति संघ के अध्यक्ष हैं। 

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