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राजनीतिक वितंडा और हिंदी विरोध, हावी न हों जाएं विदेशी भाषाएं

Umesh Chaturvediउमेश चतुर्वेदी Updated Wed, 18 Sep 2019 02:48 AM IST
हिंदी दिवस
हिंदी दिवस - फोटो : सोशल मीडिया
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दलगत सोच और प्रभावी इलाके की स्थानीय भावनाओं के नाम पर व्यापक राष्ट्रीय हित और स्वाभिमान को नकारना आज की राजनीति का प्रिय शगल बन गया है। गणतांत्रिक संविधान के लागू होने के महज पंद्रह साल बाद से हिंदी का जो वितंडा खड़ा किया गया, वह मौजूदा राजनीति के लिए जैसे जरूरी कर्म बन गया है। अगर ऐसा नहीं होता, तो हिंदी दिवस पर राजभाषा मंत्री के नाते जाहिर किए गए गृह मंत्री अमित शाह के विचार को राजनीति के खुर्दबीन से नहीं देखा जाता।
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अमित शाह ने ट्वीट में लिखा है, 'हिंदी दिवस पर मैं सभी नागरिकों से अपील करता हूं कि हम अपनी मातृभाषा का प्रयोग बढ़ाएं। हिंदी भाषा का भी प्रयोग कर  पूज्य बापू और लौह पुरुष सरदार पटेल के एक भाषा के स्वप्न को साकार करने में योगदान दें।' क्षेत्रीय अस्मिता केंद्रित राजनीतिक दलों को आपत्ति दरअसल हिंदी को राष्ट्र की एक भाषा बनाने की बात पर ज्यादा होती है। जिन तृणमूल पार्टी और द्रविड़ मुनेत्र कषगम् ने शाह के इस विचार पर आपत्ति जताई है, उन्हें दरअसल हिंदी की व्यापकता से ज्यादा अंग्रेजी के किनारे होने की चिंता ज्यादा सता रही है। उन्हें शाह के ट्वीट के अगले भाग को भी देख लेना चाहिए, जिसमें उन्होंने कहा है, 'भारत की अनेक भाषाएं और बोलियां हमारी सबसे बड़ी ताकत हैं। लेकिन देश की एक भाषा ऐसी हो, जिससे विदेशी भाषाएं हमारे देश पर हावी न हों। इसलिए हमारे संविधान निर्माताओं ने एकमत से हिंदी को राजभाषा के रूप में स्वीकार किया।'

हिंदी जैसे द्रविड़ मुनेत्र कषगम् की दुखती रग है। ऐसा माना जाता है कि चूंकि तमिलनाडु में हिंदी विरोध के नाम पर अंग्रेजी में ज्यादा निवेश हुआ है, इसलिए द्रविड़ दल हिंदी विरोध की राजनीति को धार देने लगते हैं। इस बार भी द्रमुक प्रमुख स्टालिन के हिंदी के खिलाफ राज्यव्यापी प्रदर्शन करने की चेतावनी को इन्हीं संदर्भों में देखा जाना चाहिए। वैसे तो आज जैसी राजनीति हो रही है, उसमें केंद्र की मौजूदा सरकार के सभी कदमों की आलोचना जैसे राजनीतिक दायित्व बन गया है। ऐसे माहौल में कांग्रेस और कम्युनिस्ट पार्टी का उतरना अस्वाभाविक नहीं है।

चाहे द्रविड़ दल हों या फिर पश्चिम बंगाल की ममता बनर्जी की पार्टी, हिंदी विरोध के बहाने अमित शाह और मोदी का विरोध उनकी प्रासंगिक राजनीतिक मजबूरी भी है। तमिलनाडु में अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं। ममता बनर्जी को नहीं भूलना चाहिए कि हिंदी भले ही 1860 में पहली बार दरभंगा राज्य की राजकाज की भाषा बन गई थी, उसे राष्ट्र भाषा का सर्वोच्च स्थान दिलाने का विचार ममता की ही धरती के विद्वत्त पुरुष केशवचंद्र सेन ने 1875 में दिया था। कलकत्ता के धर्मतला मैदान में सेन से मुलाकात के बाद ही दयानंद सरस्वती को सत्यार्थ प्रकाश को संस्कृत के बजाय हिंदी में लिखने की प्रेरणा दी थी। ममता को यह भी याद करना चाहिए कि पश्चिम बंगाल की ही विभूति रामानंद चट्टोपाध्याय ने अपनी अंग्रेजी पत्रिका ‘मॉडर्न रिव्यू’ के समानांतर हिंदी में ‘प्रवासी’ नामक पत्रिका निकाली।

हिंदी को आजाद भारत की राजभाषा बनाने वाले सांविधानिक प्रस्ताव को मंजूरी देते वक्त संविधान सभा ने शायद ही सोचा होगा कि भविष्य में हिंदी को हिंदुत्ववादी राजनीति के चश्मे से देखा जाएगा। लेकिन हैदराबाद के सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने अमित शाह के विचार को इसी नजरिये से देखने और अपने समर्थकों को दिखाने की कोशिश की है।
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