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राजनीतिक स्वतंत्रता तो काफी पहले मिल गई, लेकिन वैचारिक स्वतंत्रता भी जरूरी है

गिरीश्वर मिश्र Updated Sun, 25 Aug 2019 02:12 AM IST
प्रतीकात्मक तस्वीर
प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला
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यह सिर्फ संयोग नहीं है कि 1929 में लाहौर में जब कांग्रेस द्वारा ‘पूर्ण स्वराज्य’  का प्रस्ताव पारित किया जा रहा था, उसी समय कोलकाता के हुगली कॉलेज में प्रसिद्ध दार्शनिक प्रोफेसर कृष्ण चंद्र भट्टाचार्य भारत में 'विचारों में स्वराज' लाने की जरूरत का प्रतिपादन कर रहे थे। वह अंग्रेजों द्वारा स्थापित शिक्षा के अंतर्गत तेजी से पनप रही भारत की सांस्कृतिक गुलामी से मुक्ति के लिए आवाहन कर रहे थे। उनके अनुसार विचारों और भावों की दुनिया में एक नई और कदाचित असंगत सोच भारतीयों पर लादी जा रही थी। 
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उन्हें लग रहा था कि राजनीतिक स्वतंत्रता तो स्पष्ट दिखाई पड़ती है,  पर जिस तरह भिन्न विदेशी विचारों का प्रभुत्व विचारों के स्तर पर हावी होता है, वह छिपा होता है, पर अचेतन में पहुंच कर गहरे असर करता है। नियति की विडंबना यह कि भारत के तत्कालीन भद्रलोक ने शायद स्वयं के पिछड़े होने की चिंता में इस आयातित सोच को  चाहा और अच्छा भी माना। भट्टाचार्य का मानना था कि आधुनिक शिक्षा के अंतर्गत अपने विगत प्राचीन इतिहास, वर्तमान के यथार्थ और भविष्य के लक्ष्य के लिए कोई सृजनात्मक दृष्टि नहीं मिलती। 

परिणामत: भारत से या भारत के बारे में हमारा अज्ञान बढ़ता गया और विदेश के साथ परिचय की वृद्धि हुई। भारत इतना अनचीन्हा होता गया, कि उसकी प्रामाणिक जानकारी के लिए हम पश्चिम की ओर रुख करने लगे। ज्ञान चाहे जहां का हो, ज्ञान है, पर उसके साथ जुड़ा श्रेष्ठता का आग्रह था,  और अपनी पहचान की अनदेखी कर दी गई। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने भी कहा था कि विचारों की हवा आए-जाए, खिड़की तो खुले, पर खड़े रहने की जमीन अपनी ही रहे।

राजनीतिक स्वतंत्रता मिलने पर भी वैचारिक स्वतंत्रता की दृष्टि से हम पीछे हैं। 15 अगस्त, 1947 को प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने अपने प्रसिद्ध भाषण में ‘देश की आत्मा की मुक्ति’ की घोषणा की थी। वह कह रहे थे कि अब भारत स्वयं को खोज पा रहा है। वह देश से निर्धनता, अज्ञानता और अवसर की असमानता को मिटाना चाहते थे। बीते समय में हमने बहुत सारी उपलब्धियां हासिल की हैं, जिन पर हमें गर्व है।

हमारा दम-खम बढ़ा है और ज्ञान-विज्ञान और तकनीकी प्रगति की दृष्टि से हम कई कदम आगे चले हैं। इस बीच परिस्थितियां भी बदली हैं और लोकतंत्र सुरक्षित है। तथापि सृजनात्मकता और वैचारिक सांस्कृतिक दृष्टि से हम कुछ संकुचित से हुए हैं और  अपने नैसर्गिक परंपरागत स्वभाव के साथ अपने रिश्ते को लेकर एक हद तक अस्पष्ट भी हैं। राष्ट्र, देश, संस्कार और संस्कृति जैसे शब्दों में पिछड़ेपन की बू आती लगती है और बहुतेरे शिक्षित इनसे परहेज करना चाहते हैं। 
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