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कैसे मिलेगी प्लास्टिक से मुक्ति: प्रतिबंध से पूरे औद्योगिक क्षेत्र को बड़ी चुनौती का सामना करना होगा

सृजन पाल सिंह Updated Sun, 22 Sep 2019 02:26 AM IST
प्लास्टिक से हो रहा प्रदूषण
प्लास्टिक से हो रहा प्रदूषण - फोटो : File
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बात 1907 की है। 43 वर्ष के लियो बैकलैंड ने फिनॉल और फॉर्मल डीहाइड नामक रसायनों पर प्रयोग करते करते एक नए पदार्थ की खोज कर डाली। उन्होंने दुनिया का पहला कम लागत का कृत्रिम रेसिन बनाया था, जो आगे चलकर विश्व भर के बाजार में सफलतापूर्वक अपनी जगह बनाने वाला प्लास्टिक बन गया। इसके अविष्कारक के नाम पर ही इसका नाम बैकलाइट रखा गया।
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इस कहानी को और भी अच्छे से समझने के लिए थोड़ा पीछे चलते हैं। लियो बैकलैंड बेल्जियम के नागरिक थे और उनका ताल्लुक एक गरीब परिवार से था। उनके पिताजी जूतों  की मरम्मत करते थे और उनकी मां आस-पास के घरों में काम करती थी। लियो की मां ने उन्हें रात्रिकालीन स्कूल में पढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया और आगे चल कर उन्हें घेंट यूनिवर्सिटी में 20 साल की उम्र में पीएच.डी. करने के लिए छात्रवृति मिली।

बीसवीं सदी के पहले 30 वर्षों में बैकलाइट प्लास्टिक पूरी दुनिया में मशहूर हो गया था, जिसने लियो के लिए धन और समृद्धि के द्वार खोल दिए। जब 1924 में मशहूर टाइम मैगजीन के पहले पृष्ठ पर लियो की तस्वीर छपी, तब उसके नीचे सिर्फ यह लिखा था- 'ये न जलेगा, न पिघलेगा।' और देखते ही देखते प्लास्टिक आधुनिक दुनिया के विकास और लोगों की दैनिक जिंदगी का एक अहम् हिस्सा बन गया।

वर्ष, 2011 में लेखिका सुजैन फ्रैंकल ने अपनी पुस्तक ए टॉक्सिक लव स्टोरी में लिखा कि हम अपने दैनिक जीवन में रोजाना कितनी वस्तुओं का सामना करते हैं। उनके सर्वे में यह उजागर हुआ कि हम रोजाना औसतन 196 ऐसी वस्तुओं का इस्तेमाल करते हैं, जो प्लास्टिक की बनी होती हैं। इसकी तुलना में केवल 102 ऐसी वस्तुओं का प्रयोग हम रोज करते हैं, जो प्लास्टिक की बनी हुई नहीं होतीं। यानी हम अपने जीवन में औसतन दो-तिहाई ऐसी वस्तुओं का इस्तेमाल करते हैं, जो प्लास्टिक की होती हैं।
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