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देश की आर्थिक गैरबराबरी दूर करने का अवसर

बीके चतुर्वेदी Updated Tue, 25 Jun 2019 02:35 PM IST
Opportunity to remove financial irrelevance
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नई सरकार को मिला भारी जनादेश इस बात का संकेत है कि भारत के लोगों को उससे काफी उम्मीदें हैं। बावजूद इसके कि उन्हें नोटबंदी, नई जीएसटी व्यवस्था के लागू होने और पेट्रोल तथा डीजल के दामों में बढ़ोतरी से काफी परेशानी का सामना करना पड़ा और लागत से कम वसूली के कारण ग्रामीण क्षेत्र में व्यापक रूप से हताशा व्याप्त है।
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सरकार द्वारा हाल ही में जारी रोजगार से संबंधित सर्वेक्षण दिखाता है कि चार दशक में आज बेरोजगारी की दर सर्वाधिक है। इनमें से कई मुद्दों से सब वाकिफ हैं और इन पर चर्चा भी होती है, जबकि बढ़ती आर्थिक गैरबराबरी को लेकर तो कोई बात भी नहीं होती। इन चुनौतियों से निपटने में आर्थिक विकास दर में बढ़ोतरी महत्वपूर्ण हो सकती है।

उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, मध्य प्रदेश और झारखंड जैसे अनेक उत्तरी राज्यों में प्रति व्यक्ति आय राष्ट्रीय औसत से कम है। यदि उत्तर प्रदेश विकास पर ध्यान दे और उसे केंद्र की मदद मिलती है, तो उसे देश में आय के राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचने में तीन दशक लगेंगे। वर्ष 1982 में राष्ट्रीय आय में शीर्ष एक फीसदी आबादी की हिस्सेदारी 6.1 फीसदी थी और 2015 में यह बढ़कर 21.3 फीसदी या तीन गुना हो गई।

उस समय नीचे से पचास फीसदी लोगों की हिस्सेदारी 23.6 फीसदी थी, जो तीन दशक के विकास के बाद गिरकर सिर्फ 14.7 फीसदी रह गई। पूरे देश में आर्थिक गैरबराबरी तेजी से बढ़ रही है। आगामी बजट में सरकार का एजेंडा इन मुद्दों के साथ ही अन्य संरचनागत मुद्दों का समाधान होना चाहिए और उसे आने वाले वर्षों का रोडमैप प्रस्तुत करना चाहिए।  

प्रधानमंत्री ने आने वाले वर्षों में देश की अर्थ व्यवस्था को पचास खरब डॉलर तक पहुंचाने की बात की है। पिछले पांच वर्षों के दौरान जीडीपी की औसत विकास दर सात से साढ़े सात फीसदी रही, जो कि पर्याप्त नहीं है। हाल ही में इस दर पर सरकार के एक पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार ने सवाल उठाए हैं। अगर लोगों की आय को उच्च मध्य आय वाले देशों के स्तर तक ले जाना है, तो हमें अगले दो दशकों के दौरान जीडीपी की विकास दर को नौ से दस फीसदी करने की योजना बनानी होगी।

बचत दर में गिरावट आई है और निवेश और उच्च विकास के स्तर तक पहुंचने और उसे उस स्तर पर बनाए रखने के लिए बचत दर को बढ़ाकर 37 से 40 फीसदी करना होगा। व्यापार और आर्थिक गतिविधियों के विस्तार के साथ ही निर्यात पर ध्यान देना होगा। विकास प्रक्रिया को फिर से परिभाषित करना होगा। इसे इस तरह का होना चाहिए, जिससे गरीबी में तेजी से गिरावट आए और उत्तर तथा दक्षिण के राज्यों में और विभिन्न आय समूहों में आय की असमानता घटे। आगामी बजट में नीतिगत घोषणा के साथ यह प्रक्रिया शुरू होनी चाहिए।

समावेशी विकास के लिए अच्छी गुणवत्तायुक्त शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा मुहैया कराना अहम है। जब तक लोग स्वस्थ न हों और विकास प्रक्रिया में भागीदार न बनें, हम उच्च विकास स्तर और व्यापक रूप से आय में समानता के स्तर को हासिल नहीं कर सकते। कुछ समय पूर्व भारत को ग्लोबल हंगर इंडेक्स (जीएचआई) में 109 देशों में 103 स्थान मिला था। हमारे देश में 19.6 करोड़ अल्पपोषित हैं और जीएचआई अंकमान 31.1 चीन से बदतर स्थिति में हैं, जहां जीएचआई अंकमान 7.6 है।

नाटेपन और अल्पपोषण का शिकार होने वाले बच्चों की संख्या उच्च बनी हुई है। शिक्षा की स्थिति भी ऐसी ही गंभीर बनी हुई है। स्कूल में पंजीयन तो बढ़ा है, लेकिन सीखने का खराब स्तर और कौशल के अभाव में हमारे बहुत से युवा रोजगार हासिल करने लायक नहीं रह जाते। हाल ही में प्रस्तुत किए गए शिक्षा नीति के मसौदे में कई उत्कृष्ट विचार हैं। हमें इसे आगे ले जाने की जरूरत है। आयुष्मान भारत एक शानदार पहल है, लेकिन चिकित्सा ढांचे का विस्तार अत्यंत महत्वपूर्ण है।

अस्पताल के बुनियादी ढांचे और मेडिकल कॉलेजों का विस्तार और स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच बेहतर स्वास्थ्य सूचकांक, दीर्घायु, कम शिशु मृत्यु दर और तेजी से कम होने वाली मातृ मृत्यु दर प्रदान करने के लिए महत्वपूर्ण होगी। सारी अर्थव्यवस्थाओं के विकास में आधारभूत संरचना महत्वपूर्ण होती है और हमें इस क्षेत्र में अगले दशक में बीस से तीस खरब डॉलर निवेश करने की जरूरत होगी।

संचार को बेहतर करने के लिए दूरसंचार, रेलवे और मेट्रो नेटवर्क का विस्तार करने, आधुनिकीकरण करने और इसमें भारी निवेश करने की जरूरत है। ऊर्जा की बढ़ती जरूरतों को देखते हुए हमें कार्बन उत्सर्जन को नियंत्रित करने की हमारी अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धता को पूरा करने के लिए ऊर्जा क्षमता को बढ़ाना होगा।

अगले तीन दशकों में शहरीकरण का स्तर तेजी से बढ़ेगा और अंदाजा है कि यह आज के स्तर से दोगुना हो जाएगा। ऐसे में हमें नई शहरों के समूहों के बारे में विचार करना चाहिए, जो हमारी अगले पांच दशकों की जरूरतों को पूरा कर सकें। इन नए शहरों में सड़क, सीवर, पीने के पानी की लाइन और बिजली वितरण प्रणाली को ध्यान में रखना होगा। इसमें तुरंत निवेश की जरूरत होगी।

भारत तब तक आधुनिक लोकतंत्र नहीं बन सकता, जब तक कि शासन की गुणवत्ता में उल्लेखनीय सुधार न हो। इससे भ्रष्टाचार को कम करने में और विकास को गति देने में मदद मिलेगी। इससे नागरिकों का जीवन बेहतर होगा। यह हमें शीर्ष वैश्विक लोकतंत्र की हमारी नियति की ओर ले जाएगा। इसके लिए हमें केंद्र और राज्यों में रिफॉर्म ग्रुप बनाने की जरूरत है, जो कि जन हितैषी कानून और प्रक्रिया बनाएं।

दो ऐसे क्षेत्र हैं जहां ध्यान देने की जरूरत है जहां लंबे समय से सुधारों की आवाजें आ रही हैं और ये हैं पुलिस और न्यायपालिका। लोगों द्वारा दिया गया भारी जनादेश वाकई सरकार के लिए एक अवसर है। वह इसका लाभ आम लोगों के जीवन की गुणवत्ता बढ़ाने और संपत्ति की असमानता को दूर करने और शासन से जुड़े कुछ बुनियादी मुद्दों को सुलझाने में कर सकती है। आगामी बजट से हमें पता चलेगा कि क्या हम उस दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।
- पूर्व कैबिनेट सचिव और पूर्व सदस्य योजना आयोग

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