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ओबीसी आरक्षण और ‘क्रीमी लेयर’, सभी वर्गों के विकास की चिंता

महीपाल Updated Thu, 19 Sep 2019 05:15 AM IST
महीपाल
महीपाल - फोटो : अमर उजाला
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देश आजाद हुआ, तो सबके विकास के लिए संविधान में अनुसूचित जातियों एवं  जनजातियों के लिए सरकारी नौकरियों में प्रावधान किया गया। पर यह प्रावधान स्पष्ट न होकर अनुच्छेद 340 में किया गया था। उसी के तहत जनवरी, 1953 में काका कालेलकर की अध्यक्षता में प्रथम पिछड़ा वर्ग आयोग गठित हुआ।
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आयोग ने सामाजिक और शैक्षिक आधार पर पिछड़े वर्गों की पहचान के लिए चार मानक बनाए थे। आयोग द्वारा 2,399 पिछड़ी जातियों की सूची बनाई गई, जिनमें 837 जातियां अति पिछड़ी थीं। आयोग की कुछ सिफारिशें गौरतलब हैं- 1961 की जनगणना में जातिवार गणना, सभी महिलाओं को पिछड़ी श्रेणी में रखना, पिछड़े वर्गों के योग्य छात्रों के लिए ‘टेक्निकल’ एवं ‘प्रोफेशनल’ संस्थाओं में 70 प्रतिशत आरक्षण, सरकारी एवं स्थानीय निकायों की नौकरियों में पिछड़े वर्गों के लिए श्रेणी ‘एक’ में 25 प्रतिशत, श्रेणी ‘दो’ में 33 प्रतिशत एवं श्रेणी ‘तीन’ व ‘चार’ में 40 प्रतिशत आरक्षण देना।

आयोग के ग्यारह में से पांच सदस्यों ने सिफारिशों के खिलाफ असहमति ‘नोट’ पेश किया। आयोग के अध्यक्ष ने पिछड़ेपन का आधार जाति हो, इस पर एतराज जताते हुए राष्ट्रपति को पत्र लिखा। इस पर गृह मंत्रालय ने कहा कि पिछड़ी जातियों का चयन राज्य सरकारों की मर्जी है, पर केंद्र की राय में उचित यह होगा कि जाति के बजाय आर्थिक आधार को माना जाए। जबकि अनुच्छेद 340 कहता है कि सामाजिक एवं शैक्षिक दृष्टि से पिछड़े चुने जाएंगे।

जनता पार्टी की सरकार आने पर पिछड़ों को आरक्षण देने के मुद्दे पर बात बढ़ी और मंडल आयोग की कार्रवाई शुरू हुई। आयोग का मानना था कि पिछड़ों की 52 फीसदी आबादी को देख 52 फीसदी आरक्षण की सिफारिश कहीं कानूनी दांव-पेच में न फंस जाए, अतः उसने 27 फीसदी आरक्षण की सिफारिश की। वी.पी.सिंह की सरकार सत्ता में आई, तो उसने मंडल कमीशन की रिपोर्ट लागू की। मामला सर्वोच्च न्यायालय में गया, तो अदालत ने कहा कि केंद्र सरकार द्वारा जारी पत्र मान्य है, पर इसका लाभ वे नहीं ले पाएंगे, जो सामाजिक दृष्टि से अगड़े हैं। यही सिफारिश आगे चलकर क्रीमी लेयर का आधार बनी। अगड़ों को चिह्नित करने के लिए एक कमेटी बनी। पर उसके बाद से क्रीमी लेयर की परिभाषा में कई बदलाव आए हैं। अभी क्रीमी लेयर वे हैं, जिनकी वार्षिक आय आठ लाख से अधिक है या वे केंद्र सरकार की नौकरियों में ग्रुप ‘ए’ में प्रत्यक्ष रूप से आए हों या वे 40 वर्ष से पूर्व ग्रुप ‘ए’ में आ गए हो। राज्य स्तर पर पैमाना अलग-अलग है। लोकसभा सचिवालय द्वारा फरवरी 2019 को जारी रिपोर्ट के मुताबिक, ग्रुप ए में ओबीसी का प्रतिनिधित्व 13.01 प्रतिशत, ग्रुप बी में 14.78 प्रतिशत, ग्रुप ‘सी’ में (सफाई कर्मचारियों को छोड़कर) 22.65 प्रतिशत व इसी श्रेणी में सफाई कर्मचारी 14.46 प्रतिशत है।

साफ है कि पिछले करीब तीन दशक से आरक्षण लागू होने पर भी क्रीमी लेयर के कारण पिछड़े वर्गों को 27 प्रतिशत नौकरियों में प्रतिनिधित्व नहीं मिला है। क्रीमी लेयर या अन्य मापदंड तब उचित हैं, जब 27 प्रतिशत आरक्षण मिल गया हो। जब न्यूनतम ही हासिल नहीं हुआ, तो पिछड़े वर्गों को लाभ लेने से वंचित करते अन्य मापदंड उचित नहीं। अतः माननीय पूर्व चीफ जस्टिस जी. रोहिणी की अध्यक्षता में गठित पैनल उपरोक्त तथ्य को अपनी सिफारिश देते समय ध्यान में रखे, तो यह पिछड़े समाज के लिए उचित रहेगा।  

 
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