अब दशहरे पर भी नहीं होंगे नीलकंठ के दर्शन

शिवचरण चौहान Updated Sun, 25 Oct 2020 07:14 AM IST
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नीलकंठ पक्षी
नीलकंठ पक्षी - फोटो : सोशल मीडिया

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मान्यता यह है कि भगवान श्रीराम ने सुबह नीलकंठ पक्षी के दर्शन करने के बाद युद्धभूमि में रावण का वध किया था। इस कारण नीलकंठ को पूज्य पक्षी माना जाता है और आज भी लोग दशहरे के दिन सुबह-सुबह नीलकंठ पंछी के दर्शन कर यह त्योहार मनाते हैं। विजयादशमी के इस दिन पर क्षत्रिय शस्त्र पूजा करते हैं, तो ब्राह्मण शमी वृक्ष की पूजा करते हैं। उल्लेखनीय है कि रावण का वध करने से पहले राम ने शक्ति और शिव की आराधना कर उन्हें प्रसन्न किया था।
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मान्यता यह भी है कि नीलकंठ पक्षी को देखने से भगवान शिव के दर्शन हो जाते हैं और दिन शुभ होता है। नीलकंठ पक्षी को भगवान शिव का स्वरूप मानने का कारण भी है। भगवान शिव का कंठ नीला है, क्योंकि उन्होंने समुद्र से निकला हलाहल विष पान कर उसे अपने कंठ में धारण किया था। इसी तरह नीलकंठ पक्षी का भी कंठ नीला है। इसी कारण तो इसे यह नाम मिला है।
नीलकंठ से जुड़ी कई कहावतें भी हैं, जैसे-नीलकंठ का दर्शन होय। मनवांछित फल पाए सोय। या नीलकंठ तुम नीले रहियो, हम पर कृपा बनाए रहियो। हालांकि नीलकंठ की प्रसिद्धि को देखते हुए लोकमत में इसके खिलाफ भी कहा गया है, जो अस्वाभाविक भी नहीं है, जैसे-नीलकंठ कीड़ा भखे, करे अधम के काम। ताके दर्शन से भला होय कौन-सा काम। लेकिन इससे नीलकंठ की लोकप्रियता पर कोई फर्क नहीं पड़ा। मुगल जब भारत में आए, तो नीलकंठ की महिमा सुनकर फारसी के एक शायर ने इस पक्षी पर कई शेर लिखे, जिनमें से एक यह है, बहीदे नीलकंठी हिंदू आरा। तमाथे बाग बोस्ता दिल पसंद अस्त।

अपने खूबसूरत नीले पंखों के कारण सभी को अपनी ओर आकर्षित कर लेने वाला यह भारतीय पक्षी बिहार, ओडिशा, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश का राज्य पक्षी है। नीलकंठ एक कीड़ा भक्षी चिड़िया है, जो छोटे सांप, गिरगिट छोटे मेंढक, कीड़े-मकोड़े, छिपकली और छोटे चूहों को मारकर खा जाता है। हिमालय से नीचे के मैदानों में इसे सर्वत्र देखा जा सकता है। हालांकि दशहरा और दीपावली के बाद यह कम दिखाई देता है।

यह अकेला रहता है और दिन भर खाने की तलाश में घात लगाए बैठा रहता है। फरवरी का महीना इसका प्रजनन काल होता है, जब मादा नीलकंठ को रिझाने के लिए नर नीलकंठ हवा में कलाबाजी खाता है और तेज-तेज आवाज निकालता है। मार्च से अप्रैल तक मादा नीलकंठ किसी पेड़ के कोटर या मकान के खंडहर में चार या पांच अंडे देती है। हालांकि अंडे सफेद रंग के होते हैं। लेकिन इसके सभी अंडों से बच्चे नहीं निकलते। पांच अंडों में से दो या तीन अंडे से ही बच्चे निकलते हैं। भारत के अलावा नीलकंठ श्रीलंका, जावा, सुमात्रा, बांग्लादेश आदि देशों में पाया जाता है। दक्षिण अफ्रीका में भी इसकी कुछ प्रजातियां पाई जाती हैं। जोड़ा बांधते समय नीलकंठ कौए और बाज से भी लड़ पड़ता है। इसकी लंबाई 15 सेंटीमीटर तक होती है। इसके पंख नीले और सफेद रंग के तथा मजबूत होते हैं। यह किसानों का सहायक पक्षी है और खेतों में कीड़े मकोड़ों को खाकर किसानों की सहायता ही करता है।

लेकिन सभी का प्यारा यह नीलकंठ पक्षी आज संकट में है। शिकारियों के अंधाधुंध शिकार करने और खेतों में कीटनाशकों के प्रयोग के कारण नीलकंठ पक्षी लुप्त होता जा रहा है। सरकार ने इसके संरक्षण के लिए इसे रेड जोन में घोषित कर रखा है। जिन चार राज्यों में यह राज्य पक्षी है, वहां इसके शिकार पर रोक लगी है। दरअसल किसानों द्वारा अपने खेतों में कीटनाशकों का अंधाधुंध इस्तेमाल करने और मोबाइल टावरों से निकलने वाली तरंगों के कारण नीलकंठ पक्षी का अब प्रजनन नहीं हो पा रहा है।

उनके अंडों से बच्चे ही नहीं निकलते। नीलकंठ को किसानों का सहयोगी पंछी माना जाता है, क्योंकि यह फसल नहीं खाता, बल्कि फसल में लगे कीड़े-मकोड़े खाकर ही अपना गुजारा करता है। किसान कीड़े-मकोड़ों को खत्म करने के लिए कीटनाशकों का इस्तेमाल करते हैं। इससे कीड़े-मकोड़े तो मर जाते हैं, लेकिन कटु सच्चाई यह है कि उन्हीं कीड़े मकोड़ों को खाकर आज बड़ी संख्या में नीलकंठ भी मर रहे हैं। नतीजतन दूसरे अनेक जीवों की तरह नीलकंठ भी आज देश से लुप्त होता जा रहा है और संकटग्रस्त प्रजाति में गिना जाने लगा है।

विडंबना यह है कि किसानों का सहयोगी पक्षी होने के बावजूद किसान इसकी तनिक परवाह नहीं करते। यह प्रसंग खेती में रासायनिक कीटनाशकों के अंधाधुंध इस्तेमाल के खतरे के बारे में भी बताता है, जिससे हमारी प्राकृतिक विविधता लगातार खत्म होती जा रही है। विशेषज्ञों और कृषि वैज्ञानिकों का यह कहना है कि अगर ऐसा ही चलता रहा, तो कुछ साल बाद नीलकंठ पक्षी सिर्फ हमारी किताबों और डिस्कवरी चैनल में ही सिमटकर रह जाएंगे। ऐसे में, बेहतर यही होगा कि नीलकंठ के संरक्षण में भागीदार बना जाए। इससे हमारी धार्मिक आस्था की पूर्ति तो होगी ही, उससे भी महत्वपूर्ण यह कि हमारी खेती के लिए लाभदायक होने के साथ-साथ इससे प्रकृति की विविधता को भी बरकरार रखा जा सकेगा। 
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