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कमी पानी की नहीं, उसे सहेजने की तरकीब की है : नदियां अब साल भर नहीं बहतीं

विवेकानंद मथाने Updated Sun, 21 Jul 2019 03:00 AM IST
सांकेतिक तस्वीर
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : demo
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देश भर में पानी का संकट लगातार बढ़ रहा है। जल संकट के लिए जनसंख्या में बढ़ोतरी, आम लोगों द्वारा पानी के दुरुपयोग और सिंचाई के जरिये पानी की कथित बर्बादी करने वाले किसानों को जिम्मेदार ठहराने की कोशिशें भी हो रही हैं। पर क्या सचमुच जल संकट केवल इन्हीं वजह से हुआ है? प्रकृति से छेड़छाड़ के कारण बारिश का मिजाज बदला जरूर है, पर देश में सौ साल की वर्षा की गणना बताती है कि बारिश की मात्रा लगभग समान है। 
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देश के अलग-अलग भौगोलिक क्षेत्र में औसत बारिश हर साल जितनी होनी चाहिए, उतनी ही हो रही है। चार साल में एक बार बारिश का कम या अधिक होना भी प्रकृति-चक्र के अनुरूप ही है। नदी घाटी के हिसाब से अलग-अलग घाटियों में प्रतिवर्ष जल उपलब्धता 300 घनमीटर से 13,393 घनमीटर तक है।

केंद्रीय जल आयोग (सीडब्ल्यूसी) की रिपोर्ट के अनुसार, देश में औसत 1,105 मिलीमीटर की दर से सालाना औसतन 4,000 अरब घनमीटर (बीसीएम) वर्षा होती है। प्राकृतिक वाष्पीकरण, वाष्पोत्सर्जन के बाद नदियों एवं जलस्रोतों के माध्यम से औसतन वार्षिक जल उपलब्धता 1,869 बीसीएम है, जिनमें से 690 बीसीएम सतही जल और 433 बीसीएम भूजल, यानी कुल मिलाकर 1,123 बीसीएम जल उपयोग योग्य होता है। 

इनमें से सिंचाई के लिए 688 बीसीएम, पेयजल के लिए 56 बीसीएम तथा उद्योग, ऊर्जा व अन्य क्षेत्रों के लिए 69 बीसीएम यानी कुल मिलाकर 813 बीसीएम पानी का उपयोग किया जा रहा है। वर्ष 2010 में पानी की मांग 710 बीसीएम थी, जो बढ़कर 2025 में 843 बीसीएम और 2050 में 1,180 बीसीएम होने का अनुमान है।
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