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नरेंद्र मोदी ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के 'राष्ट्रीय' शब्द को खत्म कर दिया

शंकर अय्यर Updated Tue, 28 May 2019 05:31 AM IST
यूपीए अध्यक्षा सोनिया गांधी और कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी
यूपीए अध्यक्षा सोनिया गांधी और कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी - फोटो : PTI
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विपक्ष का थीम गीत आनंद बख्शी के अमर शब्द हो सकते हैं-ये क्या हुआ, कैसे हुआ। नरेंद्र मोदी ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के 'राष्ट्रीय' शब्द को खत्म कर दिया। देश की सबसे पुरानी पार्टी को नौ राज्यों में एक भी सीट नहीं मिली और नौ अन्य राज्यों में मात्र एक-एक सीट मिली। यानी 18 राज्यों में कांग्रेस एक छोटी खिलाड़ी बनकर रह गई है। सपा-बसपा के अंकगणित को लेकर उत्तर प्रदेश को चुनाव में एक महत्वपूर्ण राज्य माना जा रहा था। लेकिन मतदाताओं ने अवसरवादी गठबंधन और कांग्रेस के खिलाफ वीटो कर दिया।
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पूरे देश में कांग्रेस को जितनी सीटें मिलीं, वह अकेले उत्तर प्रदेश में भाजपा को मिली सीटों से कम हैं। पिछली सर्दियों में जिन तीन राज्यों में कांग्रेस ने जीत हासिल की थी, उनमें से छत्तीसगढ़ में उसे दो, मध्य प्रदेश में एक और राजस्थान में एक भी सीट नहीं मिली। शहरी भारत में वह दिल्ली की सात में से सातों, मुंबई की छह में छहों और बंगलूरू की चार में से तीन सीटों पर हार गई।

18 मई, 1936 को जवाहर लाल नेहरू ने कांग्रेस पार्टी को संबोधित करते हुए कहा था, 'हम बड़े पैमाने पर जनता के साथ संपर्क खो चुके हैं और जनता से जो जीवनदायी ऊर्जा मिलती है, उससे वंचित हो गए हैं, हम सूखकर कमजोर हो गए हैं और हमारा संगठन सिकुड़कर अपनी शक्ति खो चुका है।' 28 दिसंबर, 1985 को राजीव गांधी ने पूछा था, 'हमारा महान संगठन क्या बन गया है? ' सत्ता के दलालों और उनके असर का जिक्र करते हुए राजीव गांधी ने उन्हें कांग्रेस के लिए अभिशाप बताया था।

ये टिप्पणियां 23 मई, 2019 को पूरी तरह सच साबित हुईं, जब कांग्रेस के कद्दावर नौ पूर्व मुख्यमंत्री-शीला दीक्षित, बीएस हुड्डा, हरीश रावत, अशोक चव्हाण, सुशील कुमार शिंदे, एम वीरप्पा मोइली, नबान टुकी, मुकुल संगमा और दिग्विजय सिंह लोकसभा चुनाव हार गए। अगर तमिलनाडु में द्रमुक की सहायता से जीत नहीं मिलती, तो कांग्रेस की सीटें 2014 के आंकड़ों से भी कम होतीं।

कांग्रेस की हार की व्यापकता भाजपा की जीत के आकार में परिलक्षित होती है। चौदह राज्यों में भाजपा ने 50 फीसदी से अधिक वोट प्राप्त किया, जबकि उत्तर प्रदेश तथा त्रिपुरा में 49 फीसदी और पश्चिम बंगाल में 40 फीसदी वोट हासिल किया। कांग्रेस ने सामरिक और रणनीतिक गलतियां कीं। कांग्रेस के प्रचार अभियान की सबसे बड़ी गड़बड़ी विवादास्पद राफेल खरीद सौदे से उपजे नारे-’चौकीदार चोर है’ का इस्तेमाल थी। एक टीवी स्टुडियो के लाउंज में प्रतीक्षा कर रहे एक कांग्रेस समर्थक को एक सिख व्यवसायी ने फटकार लगाते हुए कहा कि मोदी ने अपने खिलाफ लगाए गए हर नारे को भुनाया और उसे वोट में बदला, क्योंकि कोई भी यह नहीं मानता था कि व्यक्तिगत रूप से मोदी भ्रष्ट हैं। कांग्रेस प्रवक्ताओं को छोड़कर कोई भी वरिष्ठ नेता या महागठबंधन के नेता उस नारे का समर्थन करना नहीं चाहते थे।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कभी मौका नहीं खोया और इसका फायदा उठाते हुए अपने अनुयायियों के लिए एक साझा पहचान बनाई-मैं भी चौकीदार। चार शब्दों के इस नारे ने उनके लिए जनता की सार्वजनिक संबद्धता को विस्तार दिया। इस संबद्धता ने राजनीतिक परिदृश्य को परिभाषित करने वाले हर तरह के आक्रोश एवं संकट को दबा दिया। कांग्रेस के बड़े नेताओं को यह बेहतर पता होना चाहिए था। कैश फॉर वोट घोटाले के बाद वर्ष 2008 में मनमोहन सिंह को भ्रष्ट बताने के विपक्ष के प्रयास भी विफल हो गए थे। पर चौकीदार चोर है का नारा पिटने के बाद भी राहुल गांधी इसके साथ बने रहे।

युद्ध में जीत के लिए चपलता जरूरी है। भाजपा द्वारा राष्ट्रवाद को मुद्दा बनाने के बाद कांग्रेस राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे पर जूझ रही थी। कांग्रेस ने सर्जिकल स्ट्राइक के लिए वायुसेना की प्रशंसा की, पर उसके नेता साजिश की बात कहने से खुद को नहीं रोक सके। अपने कार्यकाल के दौरान किए गए सर्जिकल स्ट्राइक पर पांच साल तक चुप रहने के बाद अचानक कांग्रेस सर्जिकल स्ट्राइक के बारे में कहने लगी।

कांग्रेस ने चाहे-अनचाहे बेरोजगारी और कृषि संकट के मुद्दे उठाए। इसका फायदा उसे राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनावों में मिला। पर मोदी को भ्रष्ट बताने की सनक ने कांग्रेस के प्रचार अभियान को पटरी से उतार दिया। पार्टी का सबसे भव्य आइडिया आय सहायता योजना था, जिसे न्याय कहा गया। कांग्रेस के घोषणापत्र में कुछ शानदार विचार थे-महिलाओं को केंद्र में रोजगार के लिए 33 फीसदी आरक्षण, सीएसआर फंड द्वारा वित्त पोषित कौशल प्रशिक्षण योजना का विचार, शिक्षा और स्वास्थ्य के लिए उच्च आवंटन और बेहतर जीएसटी। पर चौकीदार चोर है के शोर में ये गुम हो गए। चुनावी सफलता अंतिम व्यक्ति तक पहुंच की मांग करती है। कांग्रेस तमिलनाडु में 1967 से, पश्चिम बंगाल में 1977 से, उत्तर प्रदेश और गुजरात में 1989 से, बिहार में 1990 से, त्रिपुरा में 1992 से और ओडिशा में 2000 से सत्ता में नहीं है और 1999 से महाराष्ट्र में राकांपा पर निर्भर है। मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में भी वह पंद्रह वर्षों से सत्ता से बाहर थी।

इन राज्यों में लोकसभा की 325 सीटें आती हैं। फिर पार्टी ने संगठन के पुनर्निर्माण पर भी बहुत कम ध्यान दिया है। अपनी मार्केटिंग और लॉजिस्टिक के प्रबंधन के लिहाज से मोदी का अभियान गर्व करने लायक है। विकास के गोंद से राष्ट्रवाद और हिंदुत्व के कट्टरपंथियों की आकांक्षाओं को जोड़कर मोदी ने राजनीतिक परिदृश्य को फिर से परिभाषित किया है।

भारत साम्राज्यवाद, उपनिवेशवाद, साम्यवाद, पूंजीवाद और समाजवाद को पहले से जानता था, मोदी ने उसमें एक और वाद जोड़ दिया-मोदीवाद। 2014 में कांग्रेस नेता संजय निरुपम ने पार्टी की स्थिति बयान करते हुए कहा था कि अगर नरेंद्र मोदी कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ते, तो हार जाते। वर्ष 2019 में मुंबई में एक वाट्सऐप संदेश घूम रहा है कि अगर राहुल भाजपा से चुनाव लड़ते, तो जीत जाते। यह कांग्रेस के पतन को दर्शाता है। सवाल यह है कि क्या राहुल गांधी 1936 और 1985 की अस्तित्वगत दुविधाओं का जवाब पा सकते हैं, जो कांग्रेस को नई सहस्राब्दी में बनाए रखे?

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