Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   Metro is not a panacea

मेट्रो रामबाण नहीं है

मीनाक्षी सिन्हा Updated Sun, 04 Nov 2018 05:28 PM IST
मेट्रो
मेट्रो
विज्ञापन
ख़बर सुनें

कोलकाता में पहली मेट्रो परियोजना के बाद भारत को दिल्ली में दूसरी मेट्रो रेल परियोजना को 2002 में लागू करने में दो दशक लगे। लेकिन उसके बाद भारतीय शहरों में मेट्रो रेल परियोजनाओं में तेजी से वृद्धि हुई। पिछले एक दशक में देश के तेरह से ज्यादा शहरों में मेट्रो रेल को मंजूरी मिली है और कई अन्य राज्य मेट्रो रेल के लिए केंद्र सरकार से मंजूरी लेने के इच्छुक हैं। राज्य सरकारें और यहां तक कि केंद्र सरकार के नेता भी मेट्रो रेल को यातायात की भीड़ और पर्यावरण समस्याओं से निपटने का रामबाण मान रहे हैं, लेकिन जमीनी सच्चाई यह है कि मेट्रो रेल के अंतरराष्ट्रीय अनुभव और भारत में उससे होने वाली आय, दोनों उसे असंगत बता रहे हैं।

विज्ञापन


विकासशील देशों में सार्वजनिक परिवहन की जरूरतों को प्रभावी ढंग से पूरा करने में मेट्रो रेल के योगदान के समर्थन में कोई सबूत न होने के बावजूद भारतीय राज्यों में अपने शहरों के लिए मेट्रो रेल को अपनाने की होड़ लगी है। राजनीतिक अर्थशास्त्रियों ने इसे अर्थव्यवस्था के उदारीकरण के बाद निवेश के लिए भारतीय राज्यों के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्धा के रूप में वर्णित किया है, जिसके चलते राज्य बुनियादी ढांचे के विकास के जरिये अपने राज्य में निवेश आकर्षित करने का अवसर तलाशते हैं। मेट्रो रेल परिवहन के साधन के रूप में शहरी अभिजात वर्ग और राजनीतिक वर्ग के दृष्टिकोण को भी पूरा करता है, जो अत्याधुनिक होने के साथ वातानुकूलित यात्रा का अवसर प्रदान करता है और जो 'अनुशासन' एवं 'स्वच्छता' के मूल्यों से भी जुड़ा हुआ है।


हालांकि मेट्रो रेल परियोजनाओं को लागू करने की लागत बहुत ज्यादा होती है। ये परियोजनाएं तीव्र सार्वजनिक परिवहन व्यवस्थाओं में शामिल हैं और इसके कार्यान्वयन के लिए जमीन का व्यापक इस्तेमाल होता है। नतीजतन मेट्रो परियोजनाओं को लागू करने के लिए भारी वित्तीय कर्ज और प्रशासनिक प्रबंधन की आवश्यकता होती है। कर्नाटक और केरल मेट्रो परियोजनाओं पर अपने शोध अध्ययन के साक्ष्य और विकासशील देशों में शहरी परिवहन पर पूर्व अध्ययनों से प्राप्त निष्कर्ष के आधार पर मेरा मानना है कि मेट्रो परियोजनाओं को अपनाने से पहले उसके औचित्य के बारे में गंभीर विचार करना चाहिए। विभिन्न भारतीय शहरों में शहर के आकार और आबादी से निरपेक्ष रहकर मेट्रो के कार्यान्वयन का मौजूदा रुझान शहरी नियोजन के जल्दबाजी भरे प्रयास की ओर इशारा करता है, जिसमें सार्वजनिक परिवहन जरूरतों पर विचार और ईमानदार मूल्यांकन की कमी दिखती है।

विकसित और विकासशील, दोनों देशों की परिवहन परियोजनाओं पर अध्ययन ने सार्वजनिक परिवहन साधन के रूप में मेट्रो परियोजनाओं की सार्वभौमिक प्रासंगिकता पर प्रश्न उठाए हैं। ज्यादातर अध्ययनों से पता चलता है कि मेट्रो रेल परियोजनाएं केवल तभी फायदेमंद हो सकती हैं, जब अन्य सार्वजनिक परिहन उपायों के साथ इसे सावधानीपूर्वक जोड़ा जाए। इसके अलावा मेट्रो सिस्टम का प्रभावी उपयोग व्यावसायिक जनपदों की एकाग्रता, आबादी का आकार और घनत्व जैसे स्थानीय गुणों पर निर्भर करता है। भारत के सबसे व्यापक और घनी नेटवर्किंग वाली मेट्रो, दिल्ली मेट्रो ने भी अंतर-परिवहन एकीकरण उपायों को पूरी तरह से लागू नहीं किया है। नतीजतन इसका क्षमता से बीस फीसदी कम उपयोग होता है। चेन्नई मेट्रो भी अपनी क्षमता से कम लोगों को ढोती है। उसके कुछ स्टेशन ऐसे हैं, जो लगभग निर्जन रहते हैं। अन्य शहरों में ज्यादातर मेट्रो रेल अपेक्षित सवारी से कम लोगों को ढोती है।
 
उच्च निवेश के कारण आर्थिक व्यवहार्यता के मामले में दुनिया भर में मेट्रो सिस्टम को राज्यों से आम तौर पर सब्सिडी मिलती है। यह भारत के लिए भी सच है, जहां सरकार सब्सिडी और शेयर के जरिये मेट्रो परियोजनाओं में योगदान करती है। राजस्व का इंतजाम भी अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों से कर्ज के रूप में किया जाता है। मसलन, बंगलूरू और कोच्चि मेट्रो सिस्टम में शेयर और कर्ज के जरिये सरकार ने योगदान किया है, इसके अलावा जापानी सहयोग एजेंसी से अतिरिक्त वित्तीय सहायता मांगी गई है। जब तक सार्वजनिक परिवहन की जरूरतें इन परियोजनाओं से पूरी होती हैं, तब तक ये सब्सिडी और कर्ज उचित हैं। पर भारत के अनेक शहरी गरीब महंगी मेट्रो में यात्रा नहीं कर सकते। यहां तक कि निजी वाहनों का उपयोग करने वाले मध्यवर्गीय लोग भी मेट्रो सिस्टम के उपयोग को लेकर बहुत उत्साहित नहीं हैं। इसके अलावा व्यावहारिक रूप से विकासशील देशों में मेट्रो परियोजनाओं का निर्माण बस जैसे सार्वजनिक परिवहन के अन्य सस्ते माध्यमों से निवेश को बाहर करना है, जो निम्न मध्यवर्ग और शहरी गरीबों की बड़ी आबादी की जरूरतों को पूरा करती है। इतनी ही राशि खर्च करने पर बसों के जरिये एक व्यापक क्षेत्र को कवर किया जा सकता है।

मेट्रो परियोजनाओं को भारी सब्सिडी देने का असर अन्य कल्याणकारी योजनाओं पर भी पड़ता है। बाहरी एजेंसियों से लिया गया कर्ज बढ़ता ही जाता है, क्योंकि भूमि अधिग्रहण और अन्य कानूनी मुद्दों के कारण परियोजनाओं में देरी होती है। भूमि जैसे महत्वपूर्ण संसाधनों का विचलन किफायती आवास, शिक्षा या स्वास्थ्य सेवा जैसी अन्य कल्याणकारी योजनाओं की लागत पर होता है। इसके अलावा इन परियोजनाओं को विनियमित करने में राज्यों की अक्षमता के कारण मैंने भारत में मेट्रो परियोजनाओं में सार्वजनिक-निजी भागीदारी में भ्रष्टाचार का भी संकेत किया है।
 
एक बार लागू करने के बाद मेट्रो रेल सिस्टम को भंग करना मुश्किल होता है। इसकी परिचालन लागत ज्यादा होती है और व्यावहारिक रूप में यह असाध्य है। हालांकि केंद्र सरकार ने मेट्रो सिस्टम के परिचालन के लिए दिशा-निर्देश जारी किए हैं, लेकिन जिस तेजी से मेट्रो परियोजनाओं को मंजूरी दी जा रही है, ऐसा लगता है कि इन दिशा-निर्देशों का उल्लंघन हो रहा है। शहरी नियोजन योजनाओं को विकसित करने के लिए समग्र दृष्टिकोण वाली रणनीति बनानी चाहिए, जो शहरों के भीतर विभिन्न परिवहन तरीकों को अपनाने और उनके एकीकरण के जरिये परिवहन आवश्यकताएं पूरी कर सके।

-लेखिका किंग्स कॉलेज, लंदन से पीएच.डी हैं और शहरी भारत में परिवहन योजनाओं पर शोध कर रही हैं।

आपकी राय हमारे लिए महत्वपूर्ण है। खबरों को बेहतर बनाने में हमारी मदद करें।

खबर में दी गई जानकारी और सूचना से आप संतुष्ट हैं?
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
  • Downloads
    News Stand

Follow Us

  • Facebook Page
  • Twitter Page
  • Youtube Page
  • Instagram Page
  • Telegram
एप में पढ़ें

प्रिय पाठक

कृपया अमर उजाला प्लस के अनुभव को बेहतर बनाने में हमारी मदद करें।
डेली पॉडकास्ट सुनने के लिए सब्सक्राइब करें

क्लिप सुनें

00:00
00:00